मैंने ईसाई मत क्यों छोड़ा ?
Why I Left Christianity ?

50.00

Book Details:
  • Author: Arun Aryaveer, Dr. Vivek Arya
  • Language: Hindi
  • Publication: Bharatiya Hindu Shuddhi Sabha
  • Pages: 64
  • Edition: 2023
  • Cover: Paperback
  • ISBN: 9788195016440
  • Weight: 85 Gms.
Description

भूमिका

मैंने ईसाई मत क्यों छोड़ा ? (Why I Left Christianity ?)

मेरा जन्म मुम्बई के ईसाई परिवार में 8 मई 1964 में हुआ था। मेरी माताजी का नाम श्रीमती रोझी डिसूजा और मेरे पिताजी का नाम श्री जॉन डिसूजा है। मेरा नाम माता-पिता ने माइकल जॉन डिसूजा रखा था। मैं अपने माता-पिता का ज्येष्ठ पुत्र हूँ। मेरे अतिरिक्त मेरी एक बहन श्रीमती हिल्डा और एक भाई श्री हेनरी है। बचपन से मैं अपने परिवार के साथ हर रविवार को चर्च जाता था। चर्च के पादरी के उपदेश आदि सुनता था। बाइबिल का उनके द्वारा निर्देशित स्वाध्याय भी करता था। एक सामान्य ईसाई के समान मेरा जीवन था। 12वीं तक पढ़ाई करके मैंने दो वर्ष आई टी आई से तकनीकी शिक्षा ग्रहण की।

ईसाई त्योहारों आदि में मैं सक्रिय रूप से भाग लेता था। पर धीरे-धीरे बाइबिल पढ़कर मैं असन्तुष्ट रहने लगा। बाइबिल में दिए अनेक उपदेशों पर मुझे शंका होने लगी। मैंने अपने चर्च के पादरी से उन शंकाओं का समाधान करना चाहा पर वो मुझे सन्तुष्ट नहीं कर सके। उनकी सलाह से मैंने स्थानीय पुस्तकालय से अन्य पुस्तकें लेकर पढ़ना आरम्भ किया। इसी प्रक्रिया में मुझे भारत और यूरोप में चर्च के इतिहास की जानकारी मिली। मैंने जब अनन्त पिरोलकर की ‘गोवा इन्कुइसिशन’ नामक पुस्तक को पढ़ा कि कैसे पुर्तगाल से आकर गोवा में सेंट फ्रांसिस जेवियर ने स्थानीय हिन्दुओं पर अनेक अत्याचार कर उन्हें जबरन ईसाई बनाया तो मुझे ईसाई होते हुए भी अच्छा नहीं लगा।

जब मैंने पढ़ा कि वास्कोडिगामा ने व्यापार की आड़ में कैसे भीषण कत्लेआम किया था तो मुझे विदेशियों के व्यवहार पर शंका होने लगी कि क्या एक मानव को दूसरे मानव के साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए ? छल-कपट से धर्म परिवर्तन करवाना मुझे महापाप जैसा लगा। दक्षिण भारत में रोबर्ट दी नोबेली ने पञ्चम वेद का स्वांग कर अपने आपको रोम से आया ब्राह्मण कहकर भोले-भाले ग्रामीण लोगों को जिस प्रकार से ईसाई बनाया। वो पढ़कर तो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि क्या ईसाइयत के सिद्धान्त अन्दर से इतने कमजोर हैं जो उसे सत्य मार्ग के स्थान पर छल, कपट, दबाव, हिंसा, झूठ, धोखा, ढोंग, धन, प्रलोभन आदि का सहारा लेना पड़ता है ?

मेरा ईसाइयत से विश्वास उठने लगा। मैं सत्य अन्वेषी बनकर गृह त्याग कर विभिन्न मतों में जाकर उनकी विचारधारा का विश्लेषण करने लगा पर मेरी मंजिल अभी दूर थी।

पवई, मुम्बई में मेरे पड़ोस में आर्यवीर दल का एक कैम्प लगा। उस कैम्प में छोटे-छोटे बच्चों को वैदिक विचारधारा और शारीरिक श्रम करने की ट्रेनिंग दी जा रही थी। मैं भी देखने चला गया। वहाँ मेरा परिचय शिक्षक ब्रह्मचारी सुरेन्द्र जी (वर्तमान स्वामी सुरेन्द्रानन्द) जी तथा श्री ओमप्रकाश आर्य जी से हुआ। उनके साथ मैंने परस्पर संवाद कर अपनी अनेक शंकाओं का समाधान किया जिससे मुझे अपूर्व संतोष मिला।

ऐसा लगा चिरकाल से बहती मेरी नाव को किनारा मिल गया। उनकी प्रेरणा से मैंने विधिपूर्वक यज्ञोपवीत धारण किया और आजीवन ब्रह्मचारी रहने का व्रत लिया। उन्होंने मेरा नया नामकरण ‘ब्रह्मचारी अरुण आर्यवीर’ के नाम से किया और मुझे स्वामी दयानन्द लिखित सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने की प्रेरणा दी। सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर मुझे मेरे जीवन का उद्देश्य मिल गया। स्वामी दयानन्द के ज्ञानरूपी सागर में डुबकी लगाकर मैं तृप्त हो गया।

आर्यसमाज के माध्यम से मेरा वैदिक धर्म में प्रवेश स्वेच्छा से हुआ। मैंने जब वैदिक धर्म के सार्वभौमिक सिद्धान्तों की तुलना ईसाई आदि मत-मतान्तर की मान्यताओं से की तो उन्हें सभी के लिए अनुकूल और ग्रहण करने योग्य पाया। हर मत-मतान्तर की धर्म पुस्तक में आपको कुछ अच्छी बातें मिलती हैं। परन्तु जो ज्ञान वैदिक धर्म की पुस्तकों में मिलता है, उसकी कोई तुलना नहीं है। सत्यार्थ प्रकाश के 13वें समुल्लास में ईसाई मत समीक्षा पढ़कर मेरे बाइबिल सम्बन्धित सभी संशयों की निवृति हो गई।

इस पुस्तक के प्रकाशन में डॉ० मदन मोहन जी, रिटायर्ड प्रोफेसर फिजियोलॉजी, मैडिकल कॉलेज, पांडिचेरी ने न केवल आर्थिक सहयोग प्रदान किया है, अपितु पुस्तक के प्रूफ करने में भी यथोचित सहयोग दिया है। मैं उनका करबद्ध आभारी हूँ।

मैं इस कृपा के लिए सर्वप्रथम परम पिता परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहूँगा जिनकी मुझ पर यह बड़ी कृपा हुई। अन्यथा जाने कितने जन्मों तक मैं अविद्यारूपी अंधकार में भटकता रहता। मैं भी सम्भवतः ईसाई पादरियों के समान भोले-भाले लोगों को ईसा मसीह की भेड़ बनाने के कार्य में लगा रहता।

मैंने इन वर्षों में अपने स्वाध्याय से जो बाइबिल का ज्ञान अर्जित किया था, उसे निष्पक्ष पाठकों के लिए इस पुस्तक के माध्यम से मैं संकलित कर प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस कार्य में मेरा सहयोग दिल्ली निवासी डॉ० विवेक आर्य ने दिया है जिनकी सहायता से यह कार्य मैं पूर्ण कर पाया। वर्तमान में मैं आर्यसमाज का प्रचारक हूँ और विभिन्न माध्यमों से वैदिक विचारधारा का प्रचार-प्रसार करता हूँ। इस पुस्तक को पढ़कर लोग ईसाइयत के जंजाल से मुक्त होकर वैदिक पथ के पथिक बने, यही ईश्वर से प्रार्थना है।

अरुण ‘आर्यवीर’
(पूर्वनाम माइकल जॉन डिसूजा)

Reviews (0)

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “मैंने ईसाई मत क्यों छोड़ा ?
Why I Left Christianity ?”

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Shipping & Delivery