शङ्का समाधान डॉ. वेदपाल Shanka Samadhan by Dr. Vedpal
₹70.00
- Author: Dr. Vedpal
- Language: Hindi
- Publication: Vedic Pustakalaya Ajmer
- Pages: 138
- Edition: 2018
- Cover: Paperback
- Weight: 170 Gms.
प्राक्कथन
भारतवर्ष में शङ्का-समाधान – प्रश्नोत्तर द्वारा धर्म-प्रचार की, ज्ञान- प्रसार की परम्परा बहुत प्राचीन है। उपनिषदों का सृजन तथा उपनिषदों की लोकप्रियता का एक कारण शङ्का समाधान शैली भी है। बहुत गूढ़ विषयों को लेकर जिज्ञासु जन ऋषि-मुनियों के पास बैठकर शङ्का-समाधान किया करते थे। अपनी जिज्ञासा को लेकर विद्वानों से प्रश्न करना कोई बुरी बात नहीं। ज्ञानवर्धन के लिए, संशय-निवारण के लिए तथा सत्यासत्य के निर्णय के लिए आर्य जाति के विचारक, विद्वान्, ऋषि-मुनि, प्रश्नों का, शङ्काओं का सहर्ष स्वागत किया करते थे।
आर्य गौरव डॉ. वेदपाल जी आर्यसमाज के एक ऐसे विद्वान् हैं जिनकी आर्यसमाजेतर विचारशील विद्वानों में बहुत मान्यता और प्रतिष्ठा है। परोपकारी पाक्षिक में एक लम्बे समय से शङ्का समाधान शीर्षक से आप स्वाध्यायशील पाठकों तथा विद्वानों की शङ्काओं का समाधान अत्यन्त सुलझे ढंग से किया करते हैं। धर्मप्रेमी जनता की माँग पर आपकी लेखमाला को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। डॉ. वेदपाल जी की कोटि के गम्भीर विद्वान् की पुस्तक का प्राक्कथन लिखने का सौभाग्य प्राप्त कर विनीत अपने आपको धन्य मानता है।
ऋषि दयानन्द मेरठ, हरिद्वार, काशी, प्रयाग आदि नगरों में जहाँ कहीं भी गए, अपने व्याख्यान, प्रवचन के पश्चात् अथवा एक निश्चित दिन शङ्का समाधान के लिए अनिवार्य से समय दिया करते थे। पं. लेखराम और मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) जैसी विभूतियों के जीवन शङ्का समाधान से ही पलटे। महर्षि दयानन्द के पश्चात् पं. लेखराम जी, पं. आर्यमुनि जी, पं. गणपति शर्मा, स्वामी दर्शनानन्द जी, पं. रामचन्द्र देहलवी सरीखी विभूतियों ने इस शैली को परम्परा के रूप में आगे बढ़ाकर लाखों मानवों की शङ्काओं का समाधान करके उनके हृदयों को आलोकित किया। वर्तमान काल में वैदिक साहित्य, वैदिक सिद्धान्तों के मर्मज्ञ डॉ. वेदपाल जी इस विद्या के एक मूर्धन्य विद्वान् हैं।
सितंबर २०१८ के अंक में श्रीमान् वीरेन्द्रकुमार जी, मेरठ निवासी के सार्वदेशिक सभा द्वारा प्रकाशित ऋग्वेद में १०५५२ के स्थान पर १०५२२ मन्त्र क्यों हैं? आपकी और उनकी ऋग्वेद संहिता में ३० मन्त्रों का अन्तर क्यों है? आपने अपने जिज्ञासु की शङ्का का जो उत्तर दिया है उसने आपके विस्तृत स्वाध्याय तथा मनन चिन्तन की प्रबुद्ध पाठकों के हृदय पर अमिट और गहरी छाप लगती है। आप द्वारा दिया गया उत्तर स्थाई महत्व रखता है। आपने इसका समाधान करते हुए एक निर्णायक सूत्र दिया है कि संख्या भेद का कारण मन्त्रों का न्यूनाधिक होना नहीं है अपितु मन्त्र गणना प्रकार का वैभिन्न्य इसका कारण है।
वेद तथा वैदिक सिद्धान्तों पर की जाने वाली शङ्काओं का समाधान करने में तो आपको सिद्धि-प्रसिद्धि प्राप्त है ही। ऋषि जीवन तथा आर्यसमाज के इतिहास विषयक प्रश्नों का उत्तर देते हुए भी आप ठोस व प्रामाणिक जानकारी देते हैं। अनुमान प्रमाण से ही प्रश्नकर्त्ता को नहीं टाल देते। डॉ. वेदपाल जी मौखिक अथवा लिखित शङ्का समाधान करते समय अपने विषय से इधर-उधर कभी नहीं होते। नपे-तुले शब्दों में सारगर्भित उत्तर देते हैं। सृष्टि संवत् विषयक प्रश्न हो, अथवा ईश्वरीय ज्ञान व भाषा के आविर्भाव का प्रश्न हो, आप इनके समाधान को पढ़-सुनकर मानेंगे कि आप अपने विषय से तथा प्रश्नकर्त्ता से पूरा-पूरा न्याय करते हैं।
धौलपुर सत्याग्रह शताब्दी समारोह में धौलपुर के एक गुणी सज्जन ने अपने लम्बे भाषण में सत्याग्रह पर तो एक भी शब्द न कहा, प्रश्न कई खड़े करके शङ्काएँ और भ्रम उत्पन्न कर दिए। हमने आदरणीय डॉ. वेदपाल जी को भ्रम-निवारण के लिए खड़ा किया। आपने अपनी ज्ञानप्रसूता, मधुरवाणी से धौलपुर के आर्य सत्याग्रह पर दो-चार वाक्य बोलते हुए आर्यसमाज तथा सत्याग्रह की महिमा दिलों पर बिठा दी।
श्री रायबर्न नामक एक शिक्षाशास्त्री का कथन है कि teaching is to cause learning शिक्षा वह है जो जिज्ञासा की, सीखने की भूख को भड़काती है। मान्य डॉ. वेदपाल जी की यह कृति कई खण्डों में प्रकाशित-प्रसारित करके प्रकाशक संस्था भी यश व पुण्य की भागी बनेगी।
आशा है धर्मप्रेमी इसके प्रसार में सक्रिय सहयोगी बनेंगे।
आर्य जाति का सेवक
प्रा. राजेंद्र जिज्ञासु
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