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विदुरनीति Vidurniti
₹150.00
- Author: Swami Jagdishwaranand Sarswati
- Language: Hindi, Hindi-English
- Pages: 223
- Edition: 2025
- Cover: Paperback
- ISBN: 9788170770442
- Weight: 245 Gms.
विदुरनीति (Vidurniti)
भूमिका
नीतिशास्त्र और धर्मशास्त्र पर्यायवाची शब्द हैं। वैदिक परिभाषा में ‘धर्म’ शब्द का अर्थ कर्त्तव्य है, अतः धर्मशास्त्र या नीतिशास्त्र में चारों वर्णों के कर्त्तव्य और राजनीति का सविस्तर वर्णन किया गया है।
महाभारत भारतीय साहित्य में बेजोड़ ग्रन्थ है। महर्षि व्यास की घोषणा है-
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च पुरुषर्षभ ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ॥
– महा० आदि० ६२/५३
भरतश्रेष्ठ ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सम्बन्ध में जो बात इस ग्रन्थ में है, वही अन्यत्र भी है। जो बात इसमें नहीं है, वह अन्यत्र भी नहीं है।
महाभारत में प्रसंगवश अनेक नीतिशास्त्रकारों की नीतियों का संग्रह उपलब्ध होता है। इनमें तप और स्वाध्यायनिरत नारद, कूटनीतिज्ञ कणिक और महात्मा विदुर के नीतिशास्त्र प्रसिद्ध हैं।
इन सबमें महात्मा विदुर का धृतराष्ट्र के प्रति किया गया उपदेश अत्यन्त मार्मिक और अनूठा है। हो भी क्यों न ? स्वयं विदुरजी महाबुद्धिमान्, नीतिज्ञ विद्वान् और सदाचारी थे। वे निर्भीक और सत्यवादी भी थे। इसमें राजनीति के मूल तथा गहन तत्त्वों का वर्णन और विवेचन तो है ही, साथ ही चरित्र का उत्थान करनेवाले नैतिक उपदेशों का भी प्रवचन है। इसी दृष्टि से महान शिक्षाशास्त्री महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ‘विदुरनीतिः’ के पठन-पाठन का विशेष विधान किया है।
आज के भ्रष्ट राज्याधिकारियों और देश के भावी कर्णधार विद्यार्थियों का इस ग्रन्थ पर गहन चिन्तन और मनन करना चाहिए तथा काम, क्रोध, लोभमोह और अहंकाररूप पाँच शत्रुओं पर विजय पानी चाहिए। जब तक शासक वर्ग व्यसनों को नहीं त्यागेगा तब तक न भारत की उन्नति होगी और न प्रजा को सुख-शान्ति मिलेगी।
‘विदुरनीतिः’ के अनेक संस्करण निकले हैं। यह संस्करण अब तक प्रकाशित संस्करणों में सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि-
१. मूल संस्कृतपाठ को शुद्धतम रूप में छापा गया है।
२. विशद भावार्थ दिया गया है।
३. अनेक स्थानों पर जहाँ आवश्यक था, वहाँ ‘विशेष’ वक्तव्य लिखे गये हैं।
४. अनेक स्थानों पर पाठभेद दर्शाये गये हैं।
५. अंग्रेजी अनुवाद भी दिया गया है।
जहाँ तक हमें ज्ञात है, तीन भाषाओं में यह ग्रन्थ पहली बार छप रहा है।
हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि प्रबुद्ध पाठक इसका समादर करेगा।
विदुषामनुचरः
-जगदीश्वरानन्द सरस्वती
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