वीर वैरागी बन्दा बहादुर Veer Vairagi Banda Bahadur
₹120.00
- Author: Dr. Vivek Arya, Parmanand
- Language: Hindi
- Publication: Bharatiya Hindu Shuddhi Sabha
- Pages: 137
- Edition: 2025
- Cover: Paperback
- ISBN: 9789334206159
- Weight: 160 Gms.
वीर वैरागी बन्दा बहादुर (Veer Vairagi Banda Bahadur)
दो शब्द
मैंने एक ऐसे महापुरुष का जीवन-चरित्र लिखने का विचार किया है जिसके जीवन की ओर बहुत कम ध्यान दिया गया है। मुझे भारत के इतिहास के अनुशीलन से यह निश्चय-सा हो गया है कि वह व्यक्ति, जिसे साधारण बोलचाल में ‘बन्दा वैरागी’ कहा जाता है, एक असाधारण पुरुष था। मुझे उसके जीवन में वह विचित्रता दिखाई देती है जो न केवल भारतवर्ष के प्रत्युत संसार-भर के किसी महापुरुष में नजर नहीं आती।
उच्च आत्माओं की परस्पर तुलना करना व्यर्थ है, फिर भी ‘वैरागी’ के जीवन में कुछ ऐसे गुण पाए जाते हैं, जो न राणा प्रताप में दिखाई देते थे, और न शिवाजी में। मुसलमानों के राज्यकाल में इस ‘वीर’ का आदर्श एक सच्चा जातीय आदर्श था। हिन्दू पदाक्रान्त और पराधीन अवस्था में थे। ‘वैरागी’ एक पक्का हिन्दू था। राजपूत और मराठे अपने-अपने प्रान्त को ही अपना देश समझे बैठे थे।
‘वैरागी’ न तो पंथ में सम्मिलित हुआ और न ही उसे किसी प्रान्त-विशेष का ध्यान था। उसकी आत्मा में हिन्दू-धर्म और हिन्दू जाति के लिए अनन्य भक्ति और अगाध प्रेम था। हिन्दुओं पर अत्याचार होते देख उसका खून खौल उठता था। इन अत्याचारों का बदला लेने के लिए उसने उन्हीं साधनों का उपयोग किया जिनसे मुसलमानों ने हिन्दुओं को दबाने की कोशिश की।
संसार में ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने देश और जाति के लिए काम करते हुए उन पर अपने प्राण न्यौछावर किए हैं। ऐसे भी हुए जिन्होंने अन्तरात्मा के स्वातन्त्र्य के लिए कष्ट सहे और धर्म पर बलि चढ़ाई। बड़े- बड़े सेना-नायक हुए हैं जिन्होंनें बीसियों युद्ध जीतकर अक्षर कीर्ति प्राप्त की।
दूसरी ओर ऐसे भी हुए जिन्होंने एक ही चोट से दुनिया छोड़ दी। परन्तु ऐसा विरला ही कोई देखने में आता है जिसमें इनमें से एक से अधिक गुण पाए जाते हों, किन्तु हमारे चरित्र-नायक के जीवन में इन सब गुणों का समावेश है। लक्ष्मण राजपूत को शिकार खेलते एक हिरणी पर दया आई, तत्काल उसने घर-बार, भाई-बन्धु सब त्याग, कड़ी तपस्या का व्रत धारण कर लिया। यह उसके जीवन का एक अंश था।
जब गुरु गोबिन्दसिंह पंजाब छोड़ दक्षिण में गए तो वहाँ उनकी भेंट ‘वैरागी’ से हुई। उन्होंने उसको हिन्दू-जाति की दुःखित अवस्था दिखाई।
‘वैरागी’ वैराग्य छोड़ सेना-नायक बना। अब उसने वह वीरता दिखाई जिससे भारत-भर में तहलका मच गया। ‘वैरागी’ ही पहला पुरुष था जिसने लाहौर छोड़ पंजाब का अधिकांश जीता और नये सिरे से हिन्दू राज्य की नींव रखी। यदि इस देश की पुरानी व्याधि फिर न आ उपस्थित होती तो ‘वैरागी’ ने गुरु गोबिन्दसिंह का अधूरा काम पूरा कर दिया था।
‘वैरागी’ के जीवन की दूसरी विचित्रता उसका बलिदान है। संसार में अनेक महानुभाव धर्म पर बलिदान हुए हैं; परन्तु ‘वैरागी’ ने जिन वेदनाओं को सहन करके अपने प्राण दिए और जिस वीरता के साथ इनको सहन किया, उन्होंने इस बलिदान को अद्वितीय और अभूतपूर्व बना दिया है। ‘वैरागी’ का बलिदान ईसा के बलिदान से भी अधिक करुणामय हुआ है।
ये सभी गुण हमारे सामने ‘वैरागी’ के जीवन को एक सच्चे जीवन के रुप में उपस्थित करते हैं। उस समय के हिन्दू ‘वैरागी’ को कल्की का अवतार मानते थे और मेरे विचार में आजकल भी इसे ऐसा मानना अनुचित न होगा। हिन्दूमात्र का कर्तव्य है कि वह ‘वैरागी’ के जीवन को सदा अपनी आंखों के सामने रखें।
चूंकि सिक्खों का पिछला इतिहास अधिकतया पंथ के साम्प्रदायिक रंग में रंग गया है, और चूंकि ‘वैरागी’ पंथ का अंग-विशेष न था इसलिए इसके जीवन को भुला दिया गया है। ‘वैरागी’ दीन भारत का परम स्नेही तथा परम उद्धारक था। परन्तु हिन्दू अपने सच्चे हितैषी के गुणज्ञ न बन सके, और न ही उसकी मृत्यु के पश्चात् उन्हें उसके काम को संभालने का अवसर मिला। मुझे आशा है कि यह छोटी-सी पुस्तक इस असावधानता को दूर करने का प्रयत्न करेगी।
– भाई परमानन्द
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