वैदिक विचारधारा का वैज्ञानिक आधार
Vedic Vichardhara ka Vaigyanik Aadhar

300.00

  • By :Dr. Satyavrat Siddhantalankar
  • Subject :Scientific basis of Vedic Thoughts
  • Category :Vedic Science
  • Edition :N/A
  • Publishing Year :2018
  • SKU# :N/A
  • ISBN# :9788170770190
  • Packing :N/A
  • Pages :420
  • Binding :Hard Cover
  • Dimentions :23cm X 15cm
  • Weight :535 GRMS
Book Details:
  • Author: Dr. Satyavrat Siddhantalankar
Description

Vedic Vichardhara ka Vaigyanik Aadhar

पुस्तक का नाम – वैदिक विचारधारा का वैज्ञानिक आधार

लेखक – डॉ.सत्यव्रत सिद्धान्तालन्कार

आज का व्यक्ति आँख बंदकर किसी बात को मानने को तैयार नही हैं। वो हर बात को विज्ञान की कसौटी पर कसकर परखना चाहता हैं, क्योंकि खरे-खोटे का सर्वोत्कृष्ट आधार वो विज्ञान को मानता है। धर्म-सम्मत, शास्त्र-सम्मत तथा तर्क-सम्मत से अधिक वह आधुनिक विज्ञान-सम्मत होने में विश्वास करता है।

निस्संदेह, यह स्वस्थ दृष्टिकोण है, स्वस्थ परम्परा है, हालांकि स्वयम् विज्ञान भी यह दावे से नहीं कह सकता है कि उसकी उपलब्धियाँ चिर नूतन हैं या उसकी स्थापनाएँ अंतिम हैं, जो विज्ञान स्वयम् अभी कसौटी पर है वो दुसरों के लिए क्या कसौटी होगा? तथापि इस विचारधारा को भी सम्मान देना होगा कि कोई विचारधारा तब तक सर्वमान्य नहीं जब तक विज्ञान सम्मत न हो।

आज का युवा वर्ग खुले शब्दों में पूछता हैं कि ईश्वर है तो कहाँ है?

वह दिखाई क्यों नहीं देता?

वह आत्मा, पुनर्जन्म, कर्मफल आदि पर संदेह करता है। जब उसे इनका समाधान नहीं मिलता है तो वह इन सबको निरर्थक मानकर आक्रोश से भर जाता है। ऐसे युवाओं के लिए यह ग्रन्थ सचमुच आलोक स्तम्भ का कार्य करेगा और वैज्ञानिक सिद्धांत से आत्मा, परमात्मा, मन, चेतनता, पुनर्जन्म, जन्म, मृत्यु, सृष्टि रचना आदि रहस्यों की गुत्थी को सुलझा देगा।

आशा है पाठक इस भारतीय दर्शन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि “वैदिक विचारधारा का वैज्ञानिक आधार” का स्वागत करेंगे तथा जिज्ञासुओं के लिए यह वैदिक दर्शन का प्रवेशद्वार सिद्ध होगा।

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About Dr. Satyavrat Siddhantalankar
प्रो० सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार (Dr. Satyavrat Siddhantalankar) ने लगभग 40 विशाल ग्रन्थों की रचना की। ये पुस्तकें शिक्षा, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, सामाजिक चिन्तन, उपनिषद, संस्कार, वैदिक विचार, गीता, होम्योपैथी आदि विविध विषयों पर आधारित हैं। कुछ ग्रन्थ हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध हैं। एक बार मोरारजी देसाई ने उनकी पुस्तकों को देखकर आश्चर्यपूर्वक कहा था-'क्या आपने एक पुस्तकालय ही लिख डाला है?' उनका जन्म 5 मार्च 1898 को लुधियाना में हुआ। मात्र 7 वर्ष की आयु में उनका प्रवेश गुरुकुल काङ्गड़ी में हुआ। उन्होंने वहीं से 'सिद्धान्तालंकार' की उपाधि विशिष्ट श्रेणी में प्राप्त की और आगे चलकर उसी संस्थान में प्राध्यापक तथा कुलपति बने। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती चंद्रावती भी एक शिक्षाविद थीं। दोनों ही स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय रहे और कारावास का कष्ट सहा। दोनों को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया तथा अपने लेखन कार्य के लिए अनेक सम्मानों से अलंकृत किया गया। उनका दीर्घ कार्यकाल उच्च उपलब्धियों से परिपूर्ण रहा।
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