निघण्टुकोष के पर्यायवाची नामो में अर्थ भिन्न्ता | Meaning difference in synonyms of Nighantu Kosh
₹1,200.00
- Author: Pro. Gyan Prakash
- Language: Sanskrit-Hindi
- Publication: Parimal Publication
- Pages: 864
- Edition: 764
- Cover: Hard Cover
- ISBN: 9788171102716
- Weight: 1630 Gms.
निघण्टुकार की शैली
भारतीय परम्परा में निघण्टु से प्राचीन कोई कोष उपलब्ध नहीं होता है। जिस प्रकार ऋग्वेद विश्व का प्राचीतम साहित्य माना जाता है, उसी प्रकार वेद का अध्ययन करने के लिये गठित निघण्टुकोष भी। इसकी प्राचीनता तथा महत्त्व के सम्बन्ध में यह कहना पर्याप्त होगा कि उक्तकोष की वृत्ति निरुक्त का वेदाङ्गों में परिगणन किया गया है। सम्भवतः, इस आधार हम निघण्टु को कोषविधा के क्षेत्र में विश्व का प्राचीनतम कोष मान सकते है।
मानव जाति का प्रथम कोष होने के कारण यह कोष विधा का आदर्श प्रतिरूप नहीं है। जैसी उत्कृष्ट प्राचीन भारतीय प्रतिभा का परिचय निरुक्त और व्याकरण के क्षेत्र में प्राप्त होता है, उस प्रकार की प्रतिभा निघण्टु के गठन में परिलक्षित नहीं होती है। इसका कारण यह है कि यास्कीय निरुक्त और पाणिनीय व्याकरण ये सब परम्परा की देन हैं। लेकिन कोषविधा की प्रथम कृति होने से निघण्टु में उस जैसी कुशलता का अभाव पाया जाना स्वाभाविक है।
यह अपने आप में कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि उस पुराकाल में निघण्टुकार ने कोषविधा की सङ्कल्पना की और कोष को साकार रूप प्रदान किया। इसके अतिरिक्त जिस युग में उक्तकोष का गठन किया गया था, उस युग में उक्तकोष की उपयोगिता निर्विवाद रूप से थी, लेकिन आज भी यह कोष अपनी उपयोगिता और प्रासङ्गिकता बनाये रखे हुए है।
यास्क सदृश प्राचीन, मध्यकालीन सायण एवं वेङ्कट सदृश वेद-भाष्याकार उक्त ग्रन्थ का अवलम्बन लेते ही हैं, लेकिन अर्वाचीन भाष्यकारों की भी इसके विना गति नहीं है। यदि आज निघण्टुकोष का लोप हो जाये तो वेद के अर्थ का समझना वैसे भी कोई सरल कार्य नहीं है, तब यह और भी अधिक दुरूह और जटिल हो जायेगा। इस प्रकार समय के प्रवाह के साथ न जाने कितने साहित्य अपनी प्रासङ्गिकता और उपयोगिता खो देते हैं, लेकिन निघण्टु के साथ ऐसा नहीं है। यह आज भी निर्विवादरूप से वेद व्याख्या की दृष्टि से उपयोगी है और भविष्य में भी इसकी उपयोगिता बनी रहने की पूर्ण सम्भावना है।
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