महर्षि यास्ककृत निरुक्तम् आचार्य दुर्गकृत ऋज्वर्थाख्यावृत्तिसमेतम् | Nirukta of Yaska with Acharya Durg Commentary
₹950.00
- Author: Pro. Gyan Prakash
- Language: Sanskrit
- Pages: 715
- Edition: 2016
- Cover: Hard Cover
- ISBN: 9788171105557
- Weight: 1435 Gms.
निरुक्त के प्राचीन वृत्तिकार
निरुक्त निघण्टु की एक वृत्ति है। यास्क के कार्य का महत्त्व का अनुमान से इसी बात से लगाया जा सकता है कि मूल ग्रन्थ वेदाङ्ग की श्रेणी में परिगणित नहीं हो पाया, जबकि उसकी वृत्ति को वेदाङ्ङ्ग मान लिया गया है। जितने अन्य वेदाङ्ग हैं, वे सब मूल ग्रन्थ हैं, जैसे व्याकरण, ज्योतिष, कल्प, शिक्षा आदि, परन्तु निरुक्त अपने आप में वृत्ति है।
पाणिनि ने जब अष्टाध्यायी का गठन किया तभी से उसके विषय में वृत्ति, भाष्यादि की परम्परा देखने को मिलती है, लेकिन सम्भवतः यास्क के साथ ऐसा नहीं हो पाया, इसका भी वही कारण है, जो ऊपर दिया जा चुका है। पाणिनि ने अपना व्याकरण सूत्रशैली में लिखा, जबकि यास्क का ग्रन्थ निरुक्त सूत्ररूप न होकर स्वयं वृत्ति है। अतः यास्क का महत्त्व स्वीकार करते हुए भी विद्वानों ने कुछ विलम्ब से उस पर कुछ कहने की आवश्यकता समझी, क्योंकि उसके वक्तव्य पाणिनि की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट हैं।
यास्क के निरुक्त पर आज हमें दो वृत्तियाँ देखने को मिलती हैं, प्रथम है- आचार्य दुर्ग की निरुक्तवृत्ति तथा दूसरी है- स्कन्दस्वामीप्रणीत निरुक्तभाष्यटीका ।
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