भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का इतिहास
Bharat ke Rashtriya Andolan Ka Itihaas

550.00

AUTHOR:Satyaketu Vidyalankar (सत्यकेतु विद्यालंकार)
SUBJECT:Bharat ke Rashtriya Andolan Ka Itihaas | भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का इतिहास
CATEGORY:History
LANGUAGE:Hindi
EDITION:2023
PAGES:236
BINDING:Hardcover
WEIGHT:391 g.
Book Details:
  • Author: Satyaketu Vidyalankar
  • Language: Hindi
Description

प्रारम्भिक शब्द

पाश्चात्य साम्राज्यवाद का ह्रास बीसवीं सदी के इतिहास की सब से महत्त्व-पूर्ण घटना है। अठारहवीं सदी में यूरोप के साम्राज्यवादी देशों ने एशिया में अपने आधि-पत्य का विस्तार प्रारम्भ किया था। जापान के अतिरिक्त एशिया के प्रायः अन्य सभी देशों में उन्नीसवीं सदी के अन्त तक किसी न किसी प्रकार से यूरोप का प्रमुत्त्व व प्रभाव स्थापित हो गया था।

१७५७ में प्लासी के युद्ध से बंगाल में अंग्रेजी शासन की नींव सुदृढ़ होनी प्रारम्भ हो गई थी, और १८४६ में चिलियांवाला की लड़ाई में सिक्खों को परास्त कर अंग्रेजों ने भारत की विजय को पूरा कर लिया था । १८४६ से १९४७ तक भारत पर अंग्रेजों का शासन निर्बाध रूप से कायम रहा, और इस देश की सैन्यशक्ति एवं आर्थिक साधनों का प्रयोग अंग्रेज लोग अपने साम्राज्य का प्रसार करने के लिए भी करते रहे।

पर यूरोपियन देशों का यह प्रभुत्त्व देर तक कायम नहीं रह सका। उन्नीसवीं सदी का अन्त होने से पूर्व ही एशिया के विभिन्न देशों में राष्ट्रीय स्वाधीनता और लोकतन्त्रवाद के आन्दोलन विकसित होने शुरू हो गए, और अब यह दशा आ चुकी है, जब कि एशिया पाश्चात्य साम्राज्यवाद के चंगुल से प्रायः मुक्त हो गया है।

भारत में स्वाधीनता के लिये पहला संघर्ष १८५७ में हुआ, जो सफल नहीं हो सका । इसका प्रधान कारण यह था, कि उस समय भारत में राष्ट्रीय चेतना भलीभांति उत्पन्न नहीं हुई थी। उन्नीसवीं सदी में भारत में धार्मिक सुधार के जो विविध आन्दोलन प्रारम्भ हुए, उन्होंने जनता का ध्यान देश की दुर्दशा की ओर आकृष्ट किया और नवीन शिक्षा के कारण उसे राष्ट्रीय भावना तथा लोकतन्त्रवाद के नये विचारों से परिचय प्राप्त करने का अवसर मिला।

भारत में नवजागरण का प्रारम्भ किस प्रकार हुआ, किस ढंग से इस देश में राष्ट्रीय जागृति का प्रादुर्भाव हुआ, और किस प्रकार जनता ने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष कर स्वाधीनता प्राप्त की- इसका वृत्तान्त बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इस ग्रन्थ में मैंने इसी वृत्तान्त को सरल एवं विशद रूप से प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में कांग्रेस का कर्तृत्त्व प्रधान है।

अतः इस पुस्तक में कांग्रेस के इतिहास पर विशद रूप में प्रकाश डाला गया है। पर साथ ही, उन अन्य आन्दोलनों को भी यथोचित महत्त्व दिया गया है, जो ब्रिटिश शासन का अन्त करने के लिये हुए थे। मुझे आशा है, कि पाठक इस पुस्तक को उपयोगी पायेंगे, और इस द्वारा भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन तथा स्वतन्त्रता-संग्राम की समुचित जानकारी प्राप्त कर सकेंगे ।

– सत्यकेतु विद्यालंकार

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