परिवर्तन (परिवर्तन आता नहीं – लाया जाता है) Parivartan (Change does not come – it is brought about)
₹100.00
- Author: Vinay Arya
- Language: Hindi
- Pages: 194
- Edition: 2024
- Cover: Hard Cover
- ISBN: 9788196940744
- Weight: 287 Gms.
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परिवर्तन (परिवर्तन आता नहीं – लाया जाता है)
भूमिका
“सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए” वाक्य छोटा-सा है, सरल भी है पर इसकी गहराई इतनी अधिक है कि कुछ गिने-चुने महान्भाव ही उस गहराई में पहुंचने की योग्यता और क्षमता रखते हैं या कहें कि पहुंच पाते हैं। इस अकेले वाक्य में समस्त विश्व की शान्ति एवं मानव मात्र की उन्नति का मार्गदर्शन निहित है।
इस गहरे वाक्य को लिखने वाले महान् चिन्तक, विचारक, परिवर्तन क्रान्ति के सूत्रधार महर्षि दयानन्द सरस्वती जी को उनकी 200वीं जयन्ती पर शत-शत नमन ।
वास्तव में 19वीं शताब्दी के महान् ऋषि, वेद भक्त, राष्ट्र भक्त, महर्षि दयानन्द जी ही थे, जिन्होंने भारत की परिवर्तन क्रान्ति की नींव रखी, जिस नींव पर आज स्वतन्त्र भारत का विशाल भवन खड़ा है। उनकी इतनी सूक्ष्म दृष्टि, अद्भुत विद्वता, निर्भय जीवन, सत्य के प्रति समर्थन, विराट संकल्पशक्ति ही थी जिसने सदियों से सोए भारत के स्वाभिमान को जगाया और उसके जनमानस को अपने महान् लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संकल्पबद्ध कर दिया।
19वीं शताब्दी की बात करें तो भारतवर्ष के जिस प्राचीन वैभव और गौरव को पूरे तौर पर भुलाया जा चुका था और तत्कालीन पढ़ा-लिखा वर्ग भी भारत की प्राचीन संस्कृति पर अभिमान करने के स्थान पर उससे घृणा-सी करने लगा था और उस समय अंग्रेजी सत्ता को ही अपना वास्तविक भाग्य विधाता मानकर उसी दिशा में तेज बहाव के साथ बहने लगा था। यदि आज हम भारतीय प्राचीन वैभव पर गौरव करते हैं, तो ये परिवर्तन-उस बहाव को रोककर विपरीत दिशा में लाने का महानतम और गुरुतर कार्य करने का श्रेय इतिहास किसी को देना चाहेगा तो तथ्यों और सच्चाई के साथ नाम केवल एक ही होगा ऋषि दयानन्द, ऋषि दयानन्द और ऋषि दयानन्द ।
आखिर क्यों हम ऐसा कह रहे हैं? क्यों हम ऐसा लिख रहे हैं?
क्या ऐतिहासिक तथ्यों और सच्चाई जाने बिना इस बात को मानना उचित और न्याय संगत होगा? हमें लगता है कि, नहीं, उन तथ्यों को जाने बिना आप उपरोक्त वाक्यों से सहमत हों, ऐसा कहना उचित नहीं। पर इस पुस्तक में उल्लिखित कार्यों/तथ्यों इतिहास को जानने के पश्चात् हम अवश्य कहेंगे कि आप इस पर विचार करें। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इतिहास से सीख न लेने वालों के लिए इतिहास दोहराता है।
इतिहास अपने आप में उस कठोर पत्थर की भांति है जिसके ऊपर चाहे जितनी धूल पड़ती रहे, जमती रहे, वह दिखना बन्द हो जाए, उसकी कल्पना भी कोई न कर सके कि इस मिट्टी के नीचे कोई पत्थर होगा। पर जब कोई खोजी, यह जानकर कि यहां एक मजबूत चट्टान थी और उस धूल-मिट्टी के ढेर को हटाना शुरु करेगा तो एक समय ऐसा अवश्य आएगा कि वह धूल-मिट्टी हटाकर उस चट्टान को खोज लेगा। काले बादलों के आ जाने पर सूरज की रोशनी कुछ समय के लिए कम हो जाती है पर समाप्त नहीं होती।
ठीक वही स्थिति ऋषि दयानन्द के जीवन, उनके कार्यों और उनके द्वारा स्थापित आर्यसमाज के कार्यों को लेकर भी रही। इतिहास लेखकों द्वारा या खासकर पाठ्य पुस्तकों में उनके जीवन-कार्यों को जिस तरह सम्मान स्थान दिया जाना चाहिए था, वह कभी नहीं मिल पाया, जिसके चलते एक बड़ा वर्ग उस जानकारी से वंचित रहा और एक वर्ग ने उनकी कुछ बातों को नकारात्मक रूप में बताने के लिए भरपूर प्रयत्न किया, परन्तु उन जैसे महान् तेजस्वी व्यक्तित्व का जिस प्रकार से परिचय समस्त मानव जाति के कल्याणार्थ होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। उनके शिष्यों ने अपनी पूरी शक्ति उनके आदेशानुसार किए जाने वाले कार्यों में झोंकी, परन्तु प्रचार में वे कहीं पीछे ही रहे।
खैर ! समय कभी-कभी अपने आप अवसर प्रदान करता है। उस महान् ऋषिवर की 200वीं जयन्ती शायद ऐसा ही अवसर है। आने वाला समय हमारा प्रतीक्षा कर रहा है। समय के साथ-साथ चुनौतियां भी। अतः उनका सामना हम बेहतर तरीके से कर सकें, इसके लिए जरूरी है कि हम कुछ समय अपने अतीत में जाएं और विचारपूर्वक सोचें कि आने वाले समय की चुनौतियां, क्या 150 वर्ष पूर्व की चुनौतियों से ज्यादा हैं तो हमें उत्तर मिलेगा, शायद नहीं। ऋषि दयानन्द जी के जीवन/कार्यों और दर्शन को समझने से पूर्व हमें इतिहास पर दृष्टि डालनी होगी। प्रस्तुत पुस्तक में इन सारे विषयों पर हम चार/पांच चरणों में विचार करेंगे-
सृष्टि के आरम्भ से
पहला – आदि सृष्टि (सृष्टि के आरम्भ से) महाभारत के युद्ध से पूर्व तक का गौरव काल (5000 वर्ष पूर्व का)
दूसरा – महाभारत के युद्ध से कुछ समय पूर्व बनी परिस्थितियां एवं महाभारत के युद्ध के परिणाम।
तीसरा – महाभारत के पश्चात् से 18वीं और 19वीं सदी तक का भारत ।
चौथा – महर्षि दयानन्द जी के समय की परिस्थितियां ओर उनके द्वारा किया गया परिवर्तनकारी कार्य ।
पांचवां – वर्तमान युग की उन चुनौतियों/समस्याओं की चर्चा और समाधान के तत्व जो हमारे मूल अस्तित्व को पूरी तरह समाप्त करने की तैयारी में है।
पुस्तक के अन्त में विशेष परिशिष्ट भी दिए गए हैं जो विषय के विस्तार में सहायक होंगे-
(1) महर्षि द्वारा स्थापित आर्यसमाज का विश्व में फैला वर्तमान संगठन और सेवा कार्य।
(2) महर्षि दयानन्द के शिष्यों की श्रृंखला का संक्षिप्त परिचय ।
-विनय आर्य
महामन्त्री-दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली
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