वेदों का यथार्थ स्वरुप
Vedon Ka Yatharth Swaroop

600.00

AUTHOR: Pt. Dharmadev Vidyamarttand (पं. धर्मदेव विद्यामार्त्तण्ड)
SUBJECT: Vedon Ka Yatharth Swaroop | वेदों का यथार्थ स्वरुप
CATEGORY: Vedas
LANGUAGE: Hindi
EDITION: 2016
ISBN: N/A
PAGES: 596
BINDING: Hardcover
WEIGHT: 754 g.

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Description

वेदों का यथार्थ स्वरुप पुस्तक के विषय में कुछ धुरन्धर विद्वानों की सम्मतियाँ

आचार्य अविनाशचन्द्र जी बोस (एम.ए., पीएच-डी.) अपनी भूमिका में लिखते हैं-

मैं पण्डित धर्मदेव विद्यामार्त्तण्ड रचित वेद विषयक इस पुस्तक ‘वेदों का यथार्थ स्वरूप’ का जो इस अत्यन्त श्रद्धालु, वैदिक विद्वान् के जीवन पर्यन्त परिश्रम का परिणाम है हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ।…. मैं इस पुस्तक के लेखक को उस विशाल विद्वत्ता और इस विषय पर आधिपत्य के लिए जो उनकी पुस्तक से सूचित होता है, बधाई देता हूँ।

श्री विश्वनाथ जी विद्यालङ्कार, विद्यामार्त्तण्ड, अध्यक्ष सार्वदेशिक अनुसन्धान विभाग ने सारी पुस्तक को सुनने के पश्चात् लिखा-

मैंने श्री पं० धर्मदेव जी विद्यामार्त्तण्ड की हस्तलिखित पुस्तक ‘ वेदों का यथार्थ स्वरूप’ आद्योपान्त सुनी है। मैं मुक्त कण्ठ से इस पुस्तक की प्रशंसा करता हूँ। वेद के सम्बन्ध में पाश्चात्त्यों तथा तदनुयायियों ने जो भ्रमात्मक रूढ़िवादों का उल्लेख समय-समय पर किया है उसकी उचित आलोचना इस पुस्तक में की गई है। इसके लिए श्री पं० जी वेदानुयायियों तथा सत्यान्वेषकों के धन्यवाद के पात्र हैं।….. अन्त में मैं इस उपयोगी पुस्तक के लिखने के लिये लेखक को पुनः हार्दिक बधाई देता हूँ।

सुप्रसिद्ध वैदिक विद्वान् और शास्त्रार्थ महारथी श्री पण्डित बुद्धदेव जी विद्यामार्तण्ड ने लिखा है-

वेदविरोधी लोगों ने दुराग्रह दुरभिमान तथा मिथ्या भाषण के आधार पर एक ऐसा दुर्ग खड़ा किया है जिसे वे अपनी दृष्टि से अभेद्य समझते हैं। पाश्चात्त्य विद्वानों की मानसिक दासता तथा पक्षपातपूर्ण भारत विद्वेष के आधार पर खड़े हुए कलुषित दुर्ग को भस्मसात् करना हर सत्यप्रेमी का परम धर्म है।

श्री धर्मदेव विद्यामार्त्तण्ड जी के इस ग्रन्थ से इस दुर्ग में ऐसी दरारें पड़ जायेंगी जिनकी पूर्ति असम्भव है। श्री धर्मदेव जी विद्यामार्त्तण्ड का ग्रन्थ अनवरत तथा सुव्यवस्थित परिश्रम की सूचना पग-पग पर देता है। इस ग्रन्थ के लिखने के लिए धर्मदेव जी को बहुत-बहुत बधाइयां देता हूँ तथा गुरुकुल और आर्यसमाज को भी बधाई जिसने ऐसे परिश्रमी और विशद-बुद्धि विद्वान् उत्पन्न किये। यह ग्रन्थ अवश्य छपना चाहिये।

श्री पण्डित सुखदेव जी दर्शन वाचस्पति अध्यक्ष वेदमहाविद्यालय गुरुकुल काङ्गड़ी –

पं० धर्मदेव जी विद्यामार्त्तण्ड द्वारा लिखित यह पुस्तक ‘वेदों का यथार्थ स्वरूप’ वेद का स्वाध्याय करने वालों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगी। इस में केवल ‘वैदिक एज्’ में उल्लिखित भ्रमात्मक आक्षेपों का ही उत्तर नहीं है, प्रत्युत वेद का स्वाध्याय करने वाले व्यक्तियों के लिए मार्ग-प्रदर्शन भी किया गया है। मैं इस उपयोगी पुस्तक को लिखने के लिए लेखक को अतिशय धन्यवाद देता हूँ।

लेखक महोदय अपने प्रयास में सफल रहे हैं।

डॉ० सूर्यकान्त जी एम.ए., डी.लिट् फिल संस्कृत विभागाध्यक्ष काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने पुस्तकान्तर्गत अनेक लेखों को पढ़ने के पश्चात् लिखा-

पं० धर्मदेव जी का प्रयास स्तुत्य है और इस विवेचना की आवश्यकता थी जो कि उन्होंने पूरी कर दी है। ‘क्या अथर्ववेद जादू टोनों का वेद है’ नामक लेख पढ़ा। विचारों की मौलिकता पर लेखक को बधाई देता हूँ और उनके गहन सामाजिक अनुशीलन पर उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा करता हूं। वेदों को जादू-टोना बताने वालों पर उनकी बात जादू का काम करेगी ऐसी मेरी धारणा है।

श्री पण्डित लक्ष्मी नारायण जी शास्त्री चतुर्वेदी साहित्याचार्य एम.ए. ने पुस्तकान्तर्गत अनेक लेखों को पढ़ के लिखा कि –

बहुत ध्यान से पढ़ने पर लेखों की विशेषता से चित्त प्रसन्न हुआ। इस समय पाश्चात्त्य विचारधारा की ओर आँख मीच कर दौड़ने वाले विचारों के लिये यह पुस्तक दीप स्तम्भ का काम देगी। यदि इसे विज्ञ जनता तक पहुंचाया गया तो निस्सन्देह वैदिक संस्कृति की शिथिल आस्था को दृढ़ करने में यह परम सहायक होगी।

 

 

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