वैदिक विवाह पद्धति Vedic Vivah Paddhati
₹90.00
- Author: Swami Jagdishwaranand Sarswati
- Language: Hindi
- Pages: 108
- Edition: 2025
- Cover: Paperback
- Weight: 125 Gms.
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वैदिक विवाह पद्धति (Vedic Vivah Paddhati)
भूमिका
वैदिक धर्म में संस्कारों का बड़ा महत्त्व है। मानव-जीवन को उच्च, दिव्य, महान् एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए महर्षि दयानन्द ने ‘संस्कारविधि’ में सोलह संस्कारों का विधान किया है। सभी संस्कार महत्त्वपूर्ण हैं, परन्तु उन सभी में विवाह-संस्कार सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। वस्तुतः यही वह संस्कार है जो अन्य सभी संस्कारों का आधार है।
वर्त्तमान समय में संस्कारों की घोर उपेक्षा हो रही है। आज सोलह संस्कारों के स्थान पर दो-तीन संस्कार ही रह गये हैं और वे भी विधिपूर्वक नहीं कराये जाते। वर-वधूपक्ष के लोग तो खाने और खिलाने में ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं, वही उनकी दृष्टि में मुख्य है, संस्कार गौण है। गौण ही नहीं, उनकी इच्छा तो यह होती है कि संस्कार किसी प्रकार ५-७ मिनट में ही समाप्त हो जाए।
दूसरी ओर संस्कार करानेवाला पण्डित-वर्ग भी घास काटता है। पहले की क्रिया पीछे और पीछे की क्रिया पहले, उल्टे-सीधे मन्त्र बोल और क्रिया कराकर संस्कार समाप्त करा दिया जाता है।
संस्कारों में विवाह-संस्कार सबसे लम्बा है। इसमें प्रक्रियाएँ भी बहुत हैं और अनेक प्रक्रियाओं के कारण इसमें जटिलता भी आ गई है। उस जटिलता को दूर करने के लिए ही हमने महर्षि दयानन्द-प्रणीत पद्धति की व्याख्या यहाँ प्रस्तुत की है। इस पद्धति में पीछे पृष्ठ उलटने की आवश्यकता नहीं पड़ती। एक मन्त्र जितनी बार भी पद्धति में आया है, उसे उतनी ही बार यहाँ लिख दिया गया है। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि पाठक एवं विद्वज्जन इसे उपयोगी पाएँगे।
संस्कार में जितनी भी विधियाँ हैं, उन सबकी व्याख्या हमने विधि से पूर्व दी है। यहाँ दो बातों का निर्देश आवश्यक है। एक-क्या विवाह में पत्नी को वामाङ्ग में बैठाया जाए? दूसरे-परिक्रमा करते समय चलने का क्रम क्या हो, आगे कौन चले, वर या वधू ? दोनों प्रश्नों की मीमांसा यहाँ की जाती है-
विवाह में पत्नी का स्थान
विवाह में महर्षि दयानन्द ने पत्नी का स्थान सर्वत्र पति के दाहिनी ओर माना है। सर्वप्रथम मधुपर्क विधि के पश्चात् जब वर-वधू यज्ञशाला में प्रविष्ट होते हैं, वहाँ महर्षि लिखते हैं-
“दोनों वर-वधू यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करके कुण्ड के पश्चिम भाग में प्रथम स्थापन किये हुए आसन पर पूर्वाभिमुख वर के दक्षिणभाग में वधू और वधू के वामपक्ष में वर बैठ के वधू-‘ओं प्र मे पतियानः……’ इस मन्त्र को बोले।”
‘लाजाहोम’ की विधि पूर्ण होने के पश्चात् ऋषि फिर लिखते हैं-
“पश्चात् वर, वधू को दक्षिणभाग में रखके कुण्ड के पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठके वर – ‘ओं प्रजापतये स्वाहा’ -इस मन्त्र को बोलके खुवा से एक घृत की आहुति देवे।”
विवाह-विधि पूर्ण होने के पश्चात् जब वर और वधू प्रस्थान करते हैं, वहाँ ऋषि लिखते हैं-
“और रथ में बैठते समय वर अपने साथ दक्षिणबाजू वधू को बैठावे।”
इतना ही नहीं, महर्षि दयानन्द ने तो घर में पहुँचकर जो यज्ञ होता है वहाँ भी पत्नी को दक्षिणभाग में बैठाने का निर्देश किया है-
“यज्ञकुण्ड के पश्चिमभाग में पीठासन अथवा तृणासन पर वधू को अपने दक्षिणभाग में पूर्वाभिमुख बैठावे।”
महर्षि का यह विधान स्मृतियों के अनुसार ही है। यहाँ हम स्मृतियों के कुछ प्रमाण उद्धृत करते हैं-
कन्यादाने विवाहे च प्रतिष्ठायज्ञकर्मणि ।
सर्वेषु धर्मकार्येषु पत्नी दक्षिणातः स्मृता ॥
– व्याघ्रपादस्मृति ८४
कन्यादान, विवाह और भवनादि के शिलान्यास आदि सभी धर्मकार्यों में पत्नी का स्थान सदा दक्षिण में माना गया है।
श्राद्धे यज्ञे विवाहे च पत्नी दक्षिणतः सदा ॥
– लघ्वाश्वलायनस्मृति ६।११
श्राद्ध, यज्ञ और विवाह में पत्नी का स्थान वर के दक्षिणभाग में होता है। यहाँ श्राद्ध से तात्पर्य पौराणिकों के मृतक श्राद्ध से नहीं है। श्राद्ध का तात्पर्य है नान्दीश्राद्ध। यह श्राद्ध विवाह-संस्कार से पूर्व होता है। इसमें ब्राह्मणों को गोदान किया जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के विवाह से पूर्व भी महाराज दशरथ ने नान्दीश्राद्ध करके उसमें ब्राह्मणों को गौएँ प्रदान की थीं। अपनी बात की पुष्टि के लिए हम एक और प्रमाण देते हैं-
नान्दीश्राद्ध, सोमयाग और मधुपर्क (विवाह) में पत्नी का स्थान वर के दक्षिण में होता है।
इस प्रकार के और भी अनेक प्रमाण हैं। विस्तारभय से इतने ही प्रमाण पर्याप्त हैं।
जो विद्वान् पत्नी को वामाङ्ग में बैठाते हैं वे कहते हैं कि शरीर में हृदय बायीं ओर होता है, अतः स्त्री को वामाङ्ग में बैठाकर वह यह सूचित करता है कि मैं गृहस्थ में पत्नी को वही स्थान दूँगा जो शरीर में हृदय का है। सुनने और पढ़ने में ये व्याख्याएँ अच्छी लगती हैं, परन्तु हैं सब अशास्त्रीय ।
कुछ लोगों की आपत्ति है कि जब स्त्री को दक्षिण में बैठाने का ही विधान है तो शास्त्रों में उसे वामाङ्गी क्यों कहा है? इस भ्रान्ति का कारण है ‘वाम’ शब्द का अर्थ। वाम का अर्थ प्रिय, सुन्दर और मनोहर भी होता है। वस्तुतः ‘वाम’ का मूल अर्थ सुन्दर ही था। कालक्रम से मूल अर्थ गौण हो गया। ‘वाम’ का अर्थ यदि उल्य या बायाँ ही है तो फिर वामलोचना का क्या अर्थ होगा? क्या वामलोचना का अर्थ टेढ़ी आँखवाली होगा या जिसकी दाहिनी आँख फूट गई है? वामलोचना का अर्थ है सुन्दर नेत्रोंवाली। इसी प्रकार वामाङ्गी का अर्थ है-सुन्दर अङ्गोंवाली।
प्रदक्षिणा में आगे कौन रहे?
अब दूसरी समस्या को लीजिए। प्रदक्षिणा के समय आगे कौन चले, वर या वधू? पौराणिक परिपाटी यह है कि वे तीन प्रदक्षिणाओं में कन्या को आगे चलाते हैं और चौथी परिक्रमा में वर को। पौराणिकों की मान्यता है कि धर्म, अर्थ और काम-ये तीनों स्त्रियों में अधिक होते हैं, अतः प्रथम तीन परिक्रमाओं में वह आगे रहती है; परन्तु उसे मोक्ष का अधिकार नहीं है, अतः चौथी परिक्रमा में वर आगे हो जाता है। यह सब विधान और कल्पना अवैदिक ही है। आर्यजगत् में भी प्रायः यही पौराणिक परिपाटी प्रचलित है, जो सर्वथा हेय एवं त्याज्य है।
वर और वधू में कौन आगे चले, महर्षि दयानन्द ने स्पष्ट शब्दों में इस विषय पर कुछ नहीं लिखा है; परन्तु सम्पूर्ण विवाह-विधि का सूक्ष्म आलोडन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि परिक्रमा करते समय वर आगे और वधू पीछे रहनी चाहिए। यह बात निम्न विधियों से झलकती है।
जिस समय वर और वधू स्वागत, मधुपर्क और वस्त्र-धारण की विधि के पश्चात् ‘यदैषि मनसा दूर…’ इत्यादि तीन मन्त्रों को बोलकर यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा कर यज्ञवेदी पर बैठते हैं, उस समय वधू कहती है- प्र मे पतियानः पन्थाः कल्पताम्। अब तो पति के आचार का मार्ग, पति के कुल एवं मर्यादा का मार्ग ही मेरा जीवन-पथ बनेगा।
पति का मार्ग पत्नी का जीवन-पथ तभी बन सकता है जब पत्नी पति का अनुगमन करे, पति के पीछे चले।
विवाह-संस्कार में एक विधि है- अरुन्धती दर्शन।
अरुन्धती दर्शन का तात्पर्य यह है कि जैसे अरुन्धती तारा सदा वसिष्ठ तारे के पीछे ही रहता है उसके आगे नहीं चलता, इसी प्रकार पत्नी को भी सदा पति के पीछे ही चलना चाहिए।
सभी परिक्रमाओं में पत्नी पीछे चलेगी और पति आगे, इस विषय में दो प्रमाण हम यहाँ उपस्थित करते हैं-
अथर्ववेद का सम्पूर्ण चौदहवाँ काण्ड विवाह-सम्बन्धी है। वहाँ कहा है-
भगो राजा पुर एतु प्रजानन् ।
– अथर्व० १४।१।५९
प्रजा की कामनावाला यह ऐश्वर्यशाली राजा (वर, दूल्हा) पुर एतु-आगे-आगे चले।
और एक अकाट्य प्रमाण लीजिए-
अग्निं प्रदक्षिणीकुर्वन् वधूमनुगमयेत् ॥
– खादिरगृह्य० रुद्रस्कन्दवृत्तिसहितम् १।३।२४
वर अग्नि की प्रदक्षिणा करता हुआ वधू को पीछे चलाए। भूमिका लम्बी हो रही है, अतः यहीं विराम देता हूँ।
विदुषामनुचरः –
जगदीश्वरानन्द सरस्वती
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