वेद ज्ञान के अमृत-रस की एक दिव्यधारा है। कर्तव्य-पथ पर चलने के लिये जीवन में जिन उपदेश और प्रेरणा के प्रवाहों की आवश्यकता है वे सब इस में प्रवाहित हो रहे हैं। उनमें स्नान करके मानव जीवन एक नवीन चेतना, जागृति और स्फुरणा को अनुभव कर सकता है।
वेद का अध्ययन करते हुए मेरा ध्यान वेदों में विद्यमान छोटी-छोटी सूक्तियों की ओर गया। ये सूक्तियाँ क्या हैं, एक-एक अनुपम रत्न हैं, दिव्य सौरभ से महकता हुआ एक-एक पुष्प है, एक-एक अमृत-बिन्दु है। इन सूक्तियों से सुशोभित होकर मानव जीवन का बहुमूल्य मणि-मुकुट एक अलौकिक ज्योति से प्रस्फुरित हो सकता है, इन सूक्ति-पुष्पों के सौरभ से मनुष्य का अन्तःकरण सुरभित बन सकता है, इन अमृत-बिन्दुओं का पान करके मनुष्य अमरता का आनन्द पा सकता है। ये सूक्तियाँ अमर काव्य के अमर गान हैं।
किसी भी साहित्य में सूक्तियाँ बड़े महत्त्व की वस्तु होती हैं। भिन्न-भिन्न भाषाओं की सूक्तियाँ उन भाषाओं के बोलनेवालों के जिह्वाग्र पर रहती हैं, और अपनी बातचीत में, उपदेशों-व्याख्यानों में अनेक प्रसंगों पर लोग उनका व्यवहार करते हैं। संस्कृत में वाल्मीकि, कालिदास आदि तथा हिन्दी में सूर, तुलसी, कबीर आदि कवियों की अनेक सूक्तियाँ ऐसी ही हैं। मैंने देखा कि वेदों में भी विविध विषयों पर बड़ी ही रोचक, शिक्षाप्रद, नित्यप्रति दैनिक व्यवहार में काम आनेवाली अनेक सुन्दर सूक्तियाँ मिलती हैं, किन्तु उनका इतना प्रचार न होने से उन्होंने अब तक अपना उपयुक्त स्थान नहीं पाया है।
जब मैं वेदों की इन सूक्तियों के प्रति आकृष्ट हुआ तो विचार आया कि ये सब सूक्तियाँ संगृहीत होकर जनता के सामने आ जायें तो कितना अच्छा हो। सर्वप्रथम मैंने अथर्ववेद की सूक्तियों का संग्रह प्रारम्भ किया। अथर्ववेद में २० काण्ड हैं और उनमें कुल ५९८७ मन्त्र हैं।
इनमें से चयन की हुई ये एक सहस्त्र सूक्तियाँ इस पुस्तक द्वारा पाठकों के सम्मुख उपस्थित हैं। अनेक सूक्तियाँ हृदयग्राही होने पर भी लम्बी होने के कारण छोड़नी पड़ी हैं। दो चरणों से अधिक लम्बी कोई सूक्ति इस संग्रह में नहीं ली गई। दो चरणोंवाली सूक्तियाँ भी अधिक नहीं हैं। अधिकांश सूक्तियाँ एक चरण की हैं। कुछ एक चरण से भी छोटी हैं। एक ही से आशय की जहाँ कई सूक्तियाँ मिलीं उनमें से उन्हीं को चुन लिया गया है जो अधिक रोचक, भावाभिव्यञ्जक और पाठ में सुविधाजनक हैं।
एक यह प्रश्न था कि सूक्तियाँ किस क्रम से दी जायें। वेद में एक विषय की सब सूक्तियाँ एक ही स्थान पर हों ऐसा नहीं है। वेद का अपना दूसरा ही क्रम है। परन्तु यहाँ पाठकों की सुविधा के लिये तथा अन्य कई दृष्टियों से यही उपयुक्त समझा गया कि सूक्तियाँ विषयवार दी जायें। विषय की दृष्टि से इन्हें ६ अध्यायों में बांट दिया है।
प्रथम अध्याय प्रभु को अर्पित किया गया है। सर्वप्रथम प्रभुचरणों में नमस्कार के पुष्प चढ़ा कर प्रभु का पूजन तथा स्तवन किया गया है। अगला प्रकरण परमेश्वर के एकत्व का प्रतिपादन करनेवाला है। इस प्रकरण की सूक्तियों में बड़ी स्पष्टता और तीव्रता के साथ यह घोषणा की गई है कि परमेश्वर एक ही है। कई अलोचक वेदों पर आक्षेप करते हैं कि वेद नाना देवी-देवों की पूजा सिखाते हैं।
इस प्रकरण से स्पष्ट है कि उनका यह आरोप बिल्कुल मिथ्या है। अग्नि, इन्द्र, वरुण आदि सब एक ही परमेश्वर के भिन्न-भिन्न नाम हैं, न कि अनेक परमेश्वरों को सूचित करते हैं। इसी अध्याय में जो प्रभु-महिमा का गान किया गया है वह भी दर्शनीय है। अन्त में भक्त अपने प्रभु से ऐहलौकिक और पारलौकिक सुखों के लिये जो प्रार्थनाएँ करता है वे दी गई हैं।
द्वितीय अध्याय में ‘गुणों की पुकार’ है। ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, तेजस्विता, सत्य, पवित्रता, निर्भयता, मधुरता आदि अनेक गुणों के लिये इसमें कैसी तीव्रता के साथ प्रेरणा और कामना की गई है, पाठक इसका अनुभव करें।
इन सूक्तियों से मनुष्य को प्रेरणा मिलती है कि वह सत्य आदि गुणों को ग्रहण करता हुआ जीवन में तेजस्वी, यशस्वी बन कर रहे। यहाँ निर्भयता और सुख-शान्ति का जो आह्वान है वह भी देखने योग्य है। अन्त में अमरता की अभीप्सा की गई है। पाठक देखें कि इन सब गुणों की प्राप्ति के लिये वेद हमारे अन्दर कैसी उत्कट भावना भरना चाहता है।
तृतीय अध्याय में ‘गृहस्थ-जीवन’ सम्बन्धी सूक्तियों का संग्रह है। तो भी इसमें अनेक सूक्तियाँ ऐसी हैं जो केवल गृहस्थी के लिये ही नहीं हैं, किन्तु प्रत्येक के काम की हैं। गृहस्थाश्रम में पति-पत्नी के क्या कर्तव्य हैं, आदर्श नारी को वैसा होना चाहिए, किस प्रकार घर में सब पारिवारिक जनों को प्रीति-पूर्वक रहना चाहिए, घर कैसे सुखसमृद्धिमय होने चाहियें, किस प्रकार गृहस्थी को दान, अतिथि सत्कार आदि कर्तव्यों का पालन करना चाहिये, ये सब विषय इस अध्याय की सूक्तियों में कहे गये हैं।
चतुर्थ अध्याय ‘उन्नति के पथ पर’ अग्रसर करनेवाला है। इस अध्याय में प्रारम्भ में ही ‘उद्बोधन’ शीर्षक के नीचे कुछ सूक्तियाँ हैं, जो मनुष्य को जागृत करके आगे बढ़ने की प्रेरणा देनेवाली हैं। ‘राक्षस-संहार’ प्रकरण ऐसा है कि उसे पढ़ कर मन राक्षसों के विध्वंस के लिए उत्साह से परिपूर्ण हो उठता है। मनुष्य में आत्म-विश्वास कैसा प्रबल होना चाहिये, यह भी पाठक इस अध्याय में देखेंगे। एक प्रकरण मनुष्य की महत्त्वाकांक्षाओं का है। अन्त में मनुष्य की उन्नति के लिए शुभ-कामनाएँ व्यक्त की गई हैं।
पञ्चम अध्याय ‘शरीर-रक्षा’ पर है। शरीर का अंग-अंग किस प्रकार शक्ति की तरंगों से तरंगित रहना चाहिये, किस प्रकार मनुष्य को नीरोग रहते हुए सौ और सौ से भी अधिक वर्षों तक सुखपूर्वक जीना चाहिये, इस विषय की अतीव प्रेरणाप्रद सूक्तियाँ इस अध्याय में दी गई हैं। रोगी को आश्वासन देनेवाली सूक्तियाँ भी इस अध्याय का भूषण हैं।
षष्ठ अध्याय में ‘विविध विषयों’ पर सूक्तियाँ हैं। सर्वप्रथम मातृ-भूमि के प्रति उद्गार प्रकट किये गये हैं। भूमि हमारी माता है, हम उसके पुत्र हैं। हमारी राष्ट्र-भूमि हमें सुखी-समृद्ध रखे, धन-धान्य, मणिमुक्ता, हिरण्यादि से हमें सिंचित करती रहे और हम भी राष्ट्र के सच्चे सेवक हों, ये विचार इन सूक्तियों में प्रकट किये गये हैं। इसके बाद राजा को उसके कर्तव्यों का स्मरण कराया गया है। वही राष्ट्र उन्नति कर सकता है जिसमें क्षात्रबल और ब्राह्मबल दोनों का समन्वय रहता है।
जो राजा ब्राह्मणवाणी को अनसुना करके स्वेच्छाचारी हो जाता है, वह कभी राष्ट्र में सुख-शान्ति नहीं ला सकता। ब्राह्मण-घाती राजा का राज्य दुर्गतियों से ग्रस्त हो जाता है। इस विषय की सूक्तियाँ भी इस अध्याय में हैं। वृष्टि की जो सूक्तियाँ हैं उन्हें पढ़ते हुए वर्षाकाल की छटा आँखों के सामने चित्रित हो जाती है। गो-पालन की सूक्तियों का महत्त्व स्वतः स्पष्ट है। वेद की दृष्टि में गौ हमारी माता है, गौ का दूध हमारे लिये अमृतोपम है। जीवात्मा-विषयक सूक्तियों का जो प्रकरण है उससे सिद्ध होता है कि आत्मा अमर है, और वह कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेता है। अन्त में विविध शीर्षक के नीचे कुछ बिखरी हुई सूक्तियाँ दी गई हैं।
यह इस पुस्तक के अध्यायों का संक्षिप्त सा परिचय है। पर वस्तुतः सूक्तियों में जो सौष्ठव है वह इससे कुछ भी प्रकट नहीं हो पाया है। वह तो तभी प्रकट होगा जब पाठक स्वयं उन सूक्तियों का रसास्वादन करेंगे।
जो पाठक संस्कृत से अनभिज्ञ हों और वेद के शब्दों का सीधा आनन्द न ले सकते हों वे विषय-वार सूक्तियों का केवल हिन्दी अनुवाद भी पढ़ते चलेंगे तो भी वैदिक भावना को ग्रहण कर सकेंगे और सूक्तियों का रस ले सकेंगे।
मैंने प्रयत्न किया है कि सूक्तियों का अनुवाद ललित और सुन्दर रहे। जहाँ तक हो सका है अनुवाद को मूल शब्दों से अधिक दूर नहीं जाने दिया। तो भी मूल में जो भाव, बल, स्पन्दन, आवेश आदि है वह अनुवाद में बिल्कुल वैसा आ सके, इसके लिए अनुवाद में कुछ स्वतन्त्रता की अपेक्षा होती ही है।
जिन्हें वेद के स्वाध्याय में रुचि हो और यह देखने की अभिलाषा हो कि अथर्ववेद में अमुक सूक्ति किस स्थल पर किस प्रकरण में आई है, उनके लिए प्रत्येक सूक्ति के अन्त में उसका पता भी दे दिया है। पता तीन अंकों में दिया गया है। पहला अंक काण्ड का सूचक है, दूसरा अंक सूक्त का और तीसरा अंक मन्त्र का।
जैसे १०.८. १ का अभिप्राय होगा कि अमुक सूक्ति दशम काण्ड में, आठवें सूक्त के पहले मन्त्र की है। जहाँ एक ही पते की दो या अधिक सूक्तियाँ एक साथ आ गई हैं वहाँ उनमें से प्रत्येक सूक्ति के आगे पता न देकर उस पते की पहली सूक्ति पर ही पता दिया है। अतः जिन सूक्तियों के आगे कुछ नहीं लिखा गया उनका पता वही समझना चाहिये जो उपरली सूक्ति का है जिसके आगे पता दिया हुआ है।

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