वैदिक संस्कृति में गोधन
Vedic Sanskruti men Godhan

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Vedic Sanskruti men Godhan

वैदिक संस्कृति में गोधन

पंचगव्य

गोपैथी गाय से संबंधित साहित्य

Maharishi Dayanand Yog Foundation

[/vc_column_text][/vc_column_inner][/vc_row_inner][vc_column_text woodmart_inline=”no” text_larger=”no”]विश्व के सभी देशों की अपनी अपनी संस्कृति है । आर्यों का धर्म वैदिक कहलाता है । आर्य या हिन्दू अपने धर्म का मूल वेदों में मानते हैं ।

वैदिक संस्कृति में गोधन इस पुस्तक में गायों को लेकर जो बहुत सी संभावनाऐं प्रत्येक क्षेत्र में हैं उनको ध्यान में रखकर कार्य किया जाएगा ।

इस विषय पर बहुत से शोधकार्य हो चुके हैं बहुत सी बातें प्रकाश में आ रही है जो अत्यंत महत्वपूर्ण हैं , बहुत से शोध कार्य चल रहे हैं ।

विश्व में प्रत्येक देश देशी गाय पर रिसर्च कर रहा है , उसके महत्त्व को समझ रहा है किन्तु गो के अपने देश में ही कोई उसकी महत्ता को पहचान नहीं रहा कि वह क्या है ,

उसमें कितनी शक्ति है , उसके क्या गुण हैं । इस पुस्तक के माध्यम से उस पर होने वाले अनुसंधान और उसके गुण दोषों को प्रस्तुत किया जाएगा ।

हमारे जीवन में उसका क्या मूल्य है ? वह हमारे जीवन को क्या से क्या करने में सक्षम है । उसकी कमी होने पर हमारी संस्कृति पर क्या घातक प्रभाव पड़ रहें है ।

उसकी रक्षा न कर पाने की स्थिति में हम स्वयं की रक्षा नहीं कर सकेंगे । पृथ्वी पर जीवन नष्ट हो जाएगा ।

पर्यावरण पर उसका अत्यंत दुष्प्रभाव पड़ने लगा है । आए दिन आने वाले भूकप इसका ठोस उदाहरण हैं । प्रकृति अनियमित होने लगी है , हम इस बात को समझ नहीं पाते इस कारण हमें पता ही नहीं है कि इस सब का मुख्य कारण गोवंश का विनाश होना ही है ।

पुस्तक को निम्न विषयों के माध्यम से सात अध्यायों में बांटा गया है । जिसके पश्चात् उपसंहार और प्रासंगिक सुझाव होंगे और अंत में सन्दर्भ सूची को प्रस्तुत किया जाएगा ।

कुछ चित्रों का भी स्थान रहेगा उसकी सूची अंत में रखी जाएगी ।

प्रथम अध्याय में वर्णव्यवस्था आश्रम व्यवस्था , नारी का स्थान , भौगोलिक स्थिति , शिक्षा पद्धति , रहन सहन , भोजन एवं पेय पदार्थ , वस्त्र परिधान , आभूषण , आर्थिक स्थिति , कृषि का परिचय , गृह निर्माण , गृहोपयोगी वस्तुओं के नाम , गोशालाके विषय में , पशु संवर्धन , पशु संपदा की उपयोगिता , उस समय के उद्योग धंधे , गोवंश का सामान्य परिचय , उनका नाम , वर्गीकरण , नंदियों का परिचय , आदि विस्तार से प्रस्तुत है ।

भागवत्शास्त्र बैल को धर्म और गाय को पृथ्वी के रूप में देखते हैं । राजा परीक्षित ने गाय और बैल के उपर अत्याचार करने वाले कुपुरूष के रूप में ही कलयुग को देखा था , धर्म के रहने पर ही धरती रह सकती है ।

धरती की रक्षा करने के लिये ही धर्म को धारण किया जाता है । शिव के भक्त कृष्ण के भक्त इस बात को हृदय में धारण करने पर गोसेवा के महत्त्व को समझ सकेंगें ।

द्वितीय अध्याय में वैदिक संस्कृति में गोधन के विवरण विषय पर चर्चा की गई है । इस अध्याय गो शब्द का प्रयोग कहां किस अर्थ में किया गया है गो दुग्ध से क्या अंतर होता है , रोगाणुओं को नष्ट करने की क्षमता , सौर विकिरण , गोसेवा , गोग्रास , गोयज्ञ , गोसंस्कृति , राजा के दायित्व , गो संवर्धन और उनकी सुरक्षा , गो मंत्रालय और उसके क्या दायित्व हैं

यह भी विस्तार से प्रस्तुत गो के गले में घण्टी बांधने का क्या कारण है इस प्रकार की बातों को भी स्पष्ट किया गया है[/vc_column_text][/vc_column][/vc_row][vc_row disable_element=”yes” woodmart_css_id=”624099e71a414″ responsive_spacing=”eyJwYXJhbV90eXBlIjoid29vZG1hcnRfcmVzcG9uc2l2ZV9zcGFjaW5nIiwic2VsZWN0b3JfaWQiOiI2MjQwOTllNzFhNDE0Iiwic2hvcnRjb2RlIjoidmNfcm93IiwiZGF0YSI6eyJ0YWJsZXQiOnt9LCJtb2JpbGUiOnt9fX0=” mobile_bg_img_hidden=”no” tablet_bg_img_hidden=”no” woodmart_parallax=”0″ woodmart_gradient_switch=”no” woodmart_box_shadow=”no” wd_z_index=”no” woodmart_disable_overflow=”0″ row_reverse_mobile=”0″ row_reverse_tablet=”0″][vc_column][vc_column_text woodmart_inline=”no” text_larger=”no”]तृतीय अध्याय में धर्म की दृष्टि से , पर्यावरण की दृष्टि से , सामाजिक दृष्टि से , आर्थिक दृष्टि से आयुर्वेद की दृष्टि से , उसके महत्त्व को और उससे होने वाली आय को स्पष्ट किया गया है । वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी पर तीन प्रकार की तरंगें चलती हैं

इनका पृथ्वी पर क्या प्रभाव पड़ता है गो से ये किस प्रकार से संबन्धित होती हैं ये सब इस शोध में यह सिद्ध किया गया है ।

चतुर्थ अध्याय में वैदिक संस्कृति में गोधन के महत्त्व एवं परवर्ती संस्कृति में गाय की उपयोगिता , सम्मान , महत्त्व पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है ।

वैदिक संस्कृति के पश्चात् भी हमारे देश में गो की महत्ता में कोई भी कमी नही आई थी , इसके पश्चात पश्चिमी देशों ने हम पर आक्रमण किए हैं ।

गोहत्या , गोउत्पीड़न का प्रथम प्रयास भारत में इस्लाम धर्म के आगमन से बताया जाता है । इन्हीं पांच शताब्दियों में बड़ी संख्या में ग्रामीड़ बंगाल का इस्लाम में मतान्तरण हुआ ।

इस्लामी परंपरा में भेड़ बकरी , को बलि के रूप में मारकर खाने का चलन रहा है , सात या ज्यादा लोग दावत में शामिल हों तो ऊंट को मारकर खाने का चलन रहा है ।

गाय की बलि चढ़ाने का प्रश्न ही नहीं उठता इस्लामी भूमि पर गाऐं नहीं होतीं थी ।

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पंचगव्य

गोपैथी गाय से संबंधित साहित्य

Maharishi Dayanand Yog Foundation

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पंचगव्य

गोपैथी गाय से संबंधित साहित्य

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उसके सर्वागीण जीवन का निर्माण करते हैं । उसकी संस्कृति कहे जाते हैं । संस्कृति किसी भी देश जाति या समाज की आत्मा होती है ।

उन सभी वस्तुओं के समूह को जिनमें ज्ञान धार्मिक विश्वास , कला , नैतिक कानून , परम्परायें तथा वे सब अन्य योग्यतायें सम्मिलित होती हैं

जिन्हें मनुष्य समाज का सदस्य होने के नाते सीखता है । उसे ही संस्कृति कहते हैं ।

यह एक मानसिक प्रक्रिया है । इस संस्कृति में सौन्दर्य तथा मानवीय अनुभूतियों को हृदयंगम करने की पूर्ण क्षमता है ।

संस्कृति प्राणि की तमाम प्राकृतिक चीजों और उन उपहारों के गुणों का सार है । विश्व के सभी देशों की अपनी अपनी संस्कृति है ।

वैदिक परिचय की दृष्टि से वेद एवं वैदिक साहित्य दोनों की अलग अलग श्रेणियां हैं । वेद शब्द से जहां चार मंत्र संहिताओं का ज्ञान होता है । वह वैदिक शब्द से वेद विषयक बहुविध सामग्री का बोध होता है ।

यह सामग्री ब्राह्मण , आरण्यक , उपनिषद की है जो मंत्र संहिताओं से भिन्न नहीं हैये ही वैदिक साहित्य के ग्रंथ है । वैदिक वाङ्मय का एक क्रमिक रूप है

संहिता ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद् है । ऋग्वेद भारतीय संस्कृति पुरातनतम ग्रंथ है । इसकी ऋचाओं में वैदिक युग की सभ्यता और संस्कृति मूर्त रूप से निहित है ।

ऋग्वेद में आर्यों के धार्मिक राजनीतिक सांस्कृतिक सामाजिक वैज्ञानिक आदि सभी प्रकार के विचारों का उनकी प्रगति का विस्तृत वर्णन है । आर्यों का धर्म वैदिक कहलाता है ।

आर्य या हिन्दू अपने धर्म का मूल वेदों में मानते हैं भूगोलः वेदों में राष्ट्र व देश की स्पष्ट कल्पना है

राष्ट्र की उन्नति , राष्ट्र की सुरक्षा , राष्ट्र का संचालन , राष्ट्र भावना आदि का अनेक मंत्रों वैदिक संस्कृति में गोधन में उल्लेख किया गया है ।

यजुर्वेद में राष्ट्र की सुरक्षा के लिये सदा जागरूप रहने का निर्देश है । अथर्ववेद में राष्ट्राणि के द्वारा अनेक राष्ट्रों का संकेत किया गया है ।

अथर्ववेद में देश शब्द का भी प्रयोग है । देश पर आने वाले संकटों के निवारण की प्रार्थना की गयी है ।

इस प्रकार से गहन अध्यन करने पर सम्पूर्ण भौगोलिक स्थिति का स्पष्ट ज्ञान हो जाता है । 1 1.2 . समाजिक जीवनः वैदिक साहित्य में समाज शास्त्रीय सामग्री अत्यधिक मात्रा में प्राप्त होती है ।

यहां विस्तृत विवेचन अमीष्ट नहीं है अतः मुख्य विषय संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत किये जा रहे हैं । 1.3 . वर्ण व्यवस्थाः वर्ण व्यवस्था का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है ।

यजुर्वेद में इन चारों वणों के कर्तव्यों का बहुत सुन्दर वर्णन प्राप्त होता है । ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र जिनमें ब्राह्मण का कार्य ज्ञान शिक्षा व धर्म सम्बन्धी सभी कार्य , क्षत्रिय का कार्य क्षेत्र , राष्ट्र , देश की सुरक्षा करना था

वैश्य का कार्य देश देशान्तर से व्यापार व धन की सृष्टि करना तथा देश की अर्थ व्यवस्था को संभालना था । शूद्र का कार्य श्रम साध्य सभी कार्यों को करना था ।

वैदिक काल में इन चारो वर्णों में सामंजस्य , प्रेम , सदभाव था छोटे बड़े , स्पृष्य अस्पृष्य आदि के भाव सर्वथा नहीं थे ।

आश्रम व्यवस्थाः वेदों में चार अश्रमों का उल्लेख किया गया है । जिनमें भी ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थ आश्रम के विषय में बहुत साक्ष्य प्राप्त होते हैं ।

पाउन जीवन को आग के आधार पर चार भागों में विभाजित किया जाता था

जिससे समाज में एक सामंजस्य बना रहे 13 प्रत्येक व्यक्ति इन नियमों का पालन खुशी से करता था ।

वेदों में नारी का गौरवः वेदों में नारी को बहुत आदरणीय स्थान दिया गया है । यह पुरूष की सहयोगी है ।

विवाह के पश्चात उसे पतिगृह की गृहस्वामिनी का अधिकार प्राप्त होता है । वेदों में नारी के शौर्य की बहुत चर्चा की गयी है ।

ऋग्वेद में स्त्री सेना का वर्णन किया गया है । मुद्गलानी के लिये कहा गया है कि उसने असुरों से युद्ध करके गायँ छुडा ली थी ।

वेदों में बाल विवाह निसिद्ध है ।4 पत्नी के लिये पतिव्रत धर्म है तो वहीं पति के लिये पत्नीव्रत धर्म का पालन करना अनिवार्य बताया गया है ।

नारी अपनी इच्छा से विवाह भी कर सकती थी । इसी को स्वयंवर कहा गया है । वेदों में विधवा विवाह का समर्थन प्राप्त होता है । पति की मृत्यु के उपरांत पत्नी संतान व अपने जीवन निर्वाह वैदिक संस्कृति में गोधन

वैदिक संस्कृति का परिचय 1. वैदिक संस्कृति का सामान्य परिचयः मानव जीवन के वे सब संस्कार जो लौकिक और पारलौकिक उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करते हैं ।

उसके सर्वागीण जीवन का निर्माण करते हैं । उसकी संस्कृति कहे जाते हैं । संस्कृति किसी भी देश जाति या समाज की आत्मा होती है ।

इसमें उक्त देश या जाति के चिन्तन , मनन , आचार विचार बोली भाषा , वेशभूषा , आदि बातों का समावेश होता है

उन सभी वस्तुओं के समूह को जिनमें ज्ञान धार्मिक विश्वास , कला , नैतिक कानून , परम्परायें तथा वे सब अन्य योग्यतायें सम्मिलित होती हैं जिन्हें मनुष्य समाज का सदस्य होने के नाते सीखता है । उसे ही संस्कृति कहते हैं ।

यह एक मानसिक प्रक्रिया है । इस संस्कृति में सौन्दर्य तथा मानवीय अनुभूतियों को हृदयंगम करने की पूर्ण क्षमता है ।

संस्कृति प्राणि की तमाम प्राकृतिक चीजों और उन उपहारों के गुणों का सार है । विश्व के सभी देशों की अपनी अपनी संस्कृति है ।

वैदिक परिचय की दृष्टि से वेद एवं वैदिक साहित्य दोनों की अलग अलग श्रेणियां हैं । वेद शब्द से जहां चार मंत्र संहिताओं का ज्ञान होता है । वह वैदिक शब्द से वेद विषयक बहुविध सामग्री का बोध होता है ।

यह सामग्री ब्राह्मण , आरण्यक , उपनिषद की है जो मंत्र संहिताओं से भिन्न नहीं हैये ही वैदिक साहित्य के ग्रंथ है । वैदिक वाङ्मय का एक क्रमिक रूप है

संहिता ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद् है । ऋग्वेद भारतीय संस्कृति पुरातनतम ग्रंथ है । इसकी ऋचाओं में वैदिक युग की सभ्यता और संस्कृति मूर्त रूप से निहित है ।

ऋग्वेद में आर्यों के धार्मिक राजनीतिक सांस्कृतिक सामाजिक वैज्ञानिक आदि सभी प्रकार के विचारों का उनकी प्रगति का विस्तृत वर्णन है । आर्यों का धर्म वैदिक कहलाता है ।

आर्य या हिन्दू अपने धर्म का मूल वेदों में मानते हैं भूगोलः वेदों में राष्ट्र व देश की स्पष्ट कल्पना है ।

राष्ट्र की उन्नति , राष्ट्र की सुरक्षा , राष्ट्र का संचालन , राष्ट्र भावना आदि का अनेक मंत्रों वैदिक संस्कृति में गोधन में उल्लेख किया गया है ।

यजुर्वेद में राष्ट्र की सुरक्षा के लिये सदा जागरूप रहने का निर्देश है । अथर्ववेद में राष्ट्राणि के द्वारा अनेक राष्ट्रों का संकेत किया गया है ।

अथर्ववेद में देश शब्द का भी प्रयोग है । देश पर आने वाले संकटों के निवारण की प्रार्थना की गयी है ।

इस प्रकार से गहन अध्यन करने पर सम्पूर्ण भौगोलिक स्थिति का स्पष्ट ज्ञान हो जाता है । 1 1.2 . समाजिक जीवनः वैदिक साहित्य में समाज शास्त्रीय सामग्री अत्यधिक मात्रा में प्राप्त होती है ।

यहां विस्तृत विवेचन अमीष्ट नहीं है अतः मुख्य विषय संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत किये जा रहे हैं । 1.3 . वर्ण व्यवस्थाः वर्ण व्यवस्था का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है ।

यजुर्वेद में इन चारों वणों के कर्तव्यों का बहुत सुन्दर वर्णन प्राप्त होता है । ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र जिनमें ब्राह्मण का कार्य ज्ञान शिक्षा व धर्म सम्बन्धी सभी कार्य , क्षत्रिय का कार्य क्षेत्र , राष्ट्र , देश की सुरक्षा करना था

वैश्य का कार्य देश देशान्तर से व्यापार व धन की सृष्टि करना तथा देश की अर्थ व्यवस्था को संभालना था । शूद्र का कार्य श्रम साध्य सभी कार्यों को करना था ।

वैदिक काल में इन चारो वर्णों में सामंजस्य , प्रेम , सदभाव था छोटे बड़े , स्पृष्य अस्पृष्य आदि के भाव सर्वथा नहीं थे ।

आश्रम व्यवस्थाः वेदों में चार अश्रमों का उल्लेख किया गया है ।

जिनमें भी ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थ आश्रम के विषय में बहुत साक्ष्य प्राप्त होते हैं । पाउन जीवन को आग के आधार पर चार भागों में विभाजित किया जाता था

जिससे समाज में एक सामंजस्य बना रहे 13 प्रत्येक व्यक्ति इन नियमों का पालन खुशी से करता था ।

वेदों में नारी का गौरवः वेदों में नारी को बहुत आदरणीय स्थान दिया गया है । यह पुरूष की सहयोगी है ।

विवाह के पश्चात उसे पतिगृह की गृहस्वामिनी का अधिकार प्राप्त होता है । वेदों में नारी के शौर्य की बहुत चर्चा की गयी है ।

ऋग्वेद में स्त्री सेना का वर्णन किया गया है । मुद्गलानी के लिये कहा गया है कि उसने असुरों से युद्ध करके गायँ छुडा ली थी ।

वेदों में बाल विवाह निसिद्ध है ।4 पत्नी के लिये पतिव्रत धर्म है तो वहीं पति के लिये पत्नीव्रत धर्म का पालन करना अनिवार्य बताया गया है ।

नारी अपनी इच्छा से विवाह भी कर सकती थी । इसी को स्वयंवर कहा गया है । वेदों में विधवा विवाह का समर्थन प्राप्त होता है ।

पति की मृत्यु के उपरांत पत्नी संतान व अपने जीवन निर्वाह वैदिक संस्कृति में गोधन

यह जबरन , शोषण , हिंसा करने में भी हिचकिचाती नहीं है , यहां तक कि ऐसा करने में चाहे दूसरा समाप्त ही हो जाए तो भी उसे परवाह नहीं होती ।

दूसरी शैली ऐसी है जो सभी के स्वत्व का समान आदर करती है , उनके स्वत्व को बनाए रखने में सहायता करती है । इस प्रकार दोनों एक दूसरे से प्रभावित होते हैं ,

फिर भी स्वत्व बना रहता है । इस प्रकार यह तो स्पष्ट है कि दोनों में पहली यूरोपीय अथवा अमेरिकी शैली है

तो दूसरी भारतीय इन दोनों के लिए क्रमशः पाश्चात्य और प्राच्य ऐसी अधिक व्यापक संज्ञा का प्रयोग हम करते हैं ।

यह तो सर्वविदित है कि भारतीय संस्कृति विश्व में अतिप्राचीन है , प्राचीन ही नहीं समृद्ध , सुव्यवस्थित , सुसंस्कृत , विकसित है ।

आज से 500 वर्ष पूर्व यूरोप ने विस्तार करना शुरू किया तब समग्र विश्व में फैल जानें की उसकी आकांक्षा थी । विश्व के अन्य देशों के साथ भारत भी उसका लक्ष्य था ।

इंग्लैण्ड में ईस्ट इंडिया कंपनी बनी , वह भारत आई , उसने पहले समुद्रतटीय प्रदेशों में अपने व्यापारिककेन्द्र बनाए . उन्हें किलों का रूप दिया , नाम दिया , सैन्य रखा , व्यापार के साथ धीरे धीरे प्रदेश जीतने शुरू किए , अपने कब्जे में किया साथ ही इसाईकरण का काम भी शुरू किया

सन् 1820 तक सम्पूर्ण भारत अंग्रेजों के अधिकार में चला गया ।

भारत को अपने जैसा बनाने के लिए अंग्रेजों ने यहां की सभी व्यवस्थाओं प्रशासकीय , शासकीय , सामाजिक , सांस्कृतिक , आर्थिक , व्यावसायिक , शैक्षणिक , नागरिक इनको तोड़ना शुरू किया । उन्होंने नए कायदे कानून बनाए

व्यवस्थाएँ बनाई , संरचनाओं का निर्माण किया और बलपूर्वक उस पर अमल भी करवाया । उन्होंने यहां जो किया वह सब इंग्लैण्ड में अस्तित्व में था

इसी कारण भारत दरिद्र होता चला गया । यहां वर्ग संघर्ष पैदा हो गए , लोगों का आत्मसम्मान और गौरव नष्ट होता चला गया ।

मौलिकता और सृजनशीलता कुंठित होती चली गई , मूल्यों का ह्रास हुआ , मानवीयता का स्थान यांत्रिकता ने ले लिया और सर्वत्र दीनता व्याप्त हो गई ,

लोग स्वामी के स्थान पर दास बन गए । एक विराट , अमानुशी व्यवस्था के पुर्जे बन गए जिसे वे बिल्कुल मानते नहीं थे , समझते तथा स्वीकारते भी नहीं थे क्योंकि यह उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं था ।

इसी क्रम में एक भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है गौमाता ब्रिटिसों द्वारा डेढ़ सौ वर्षों तक निरंतर प्रतिदिन गोहत्या की जाती रही

ब्रिटिस शासन में गाय की व्यापक रूप से अवहेलना की जाती रही , उसका दर्जा कम करने के प्रयत्न किए जाते रहे हैं ।

मुगल शासक जहांगीर ने सन 1615 में अपने जहाज पुर्तगालियों के द्वारा रोके जाने से मुक्ति दिलाने के लिए ब्रिटिसों की सहायता ली थी ।

पुर्तगालियों तथा कुछ अन्य के विरूद्ध सहायता लेने के फलस्वरूप बादशाह को सूरत तथा उसके आसपास के कुछ इलाके ब्रिटिशों को हस्तांतरित कर दिए थे ।

इसी के परिणामस्वरूप उन्होंने पश्चिमी एवं पूर्वी तटों पर सैकड़ों व्यापारिक चौकियां स्थापित कर लीं किलेबन्दी भी कर ली थी । तथापि , सन् 1748 के आसपास ब्रिटिश एवं फ्रांसीसी दोनों ने अपनी आपसी रंजिश के बहाने आर्कोट के एक छोटे से

मुस्लिम बहुल क्षेत्र पर अपनी अपनी दावेदारी प्रस्तुत की इस कारण उनके बीच भीषण स्तर का युद्ध हुआ ।

एक ही दशक में दक्षिण भारत के अधिकांश हिस्सों को समाहित करके युद्ध हुआ जिसके परिणामस्वरूप सन् 1799 तक ब्रिटिश समग्र दक्षिण भारत के शासक बन गए ।

इस जीत के नशे में ब्रिटिसों ने बड़ी त्वरित गति से अपने क्षेत्र के विस्तार के लिए पैर पसारे । यह सब 1780 तक ऐसे ही चलता रहा । सन् 1773 में वारेन हेस्टिंग्स की ब्रिटिश गवर्नर जनरल के रूप में नियुक्ति हुई ।

उस समय राजस्थान के शासक अठारहवीं शताब्दी में मराठों से अभिभूत रहे अतः भले ही विदेशी परन्तु मराठों के शत्रु ऐसे ब्रिटिश शासकों के साथ मित्रता करने के निए जोधपुर , राजस्थान के शासक रूचि दिखाने के लगे

सन् 1780 में वारेन हेस्टिंग्स के दूत और राजस्थान के जोधपुर एवं अन्य रियासतों के महाराजाओं के बीच सम्पन्न संक्षिप्त सम्पर्क के दौरान उन्होंने आशा व्यक्त की उनके एवं ब्रिटिसों के मध्य ऐसी औपचारिक संधि की जाए कि

वे उनके क्षेत्र में गो हत्या नहीं करेंगें । क्योंकि कुछ ब्रिटिस लोगों तत्कालीन राजा के अधिकार क्षेत्र में भोजन के लिए बहुत सी गायों का वध किया था ।

मांस भक्षण के लिए गोवध करने की अंग्रेजों पिछले दशक की छवि से भारत के विभिन्न प्रांतों के लोग परिचित हो चुके थे ।

इसकी भनक लगते ही वारेन हेस्टिंग्स ने अपने दूत से कहा कि मुझे अफसोस है कि राजस्थान के शासकों द्वारा सुझाव दिए जाने से पूर्व इस संवेदनशील मुद्दे पर विचार नहीं किया गया था । ‘

लगभग 38 वर्ष पश्चात सन् 1818 में ब्रिटिश समग्र भारत के शासक बन गए ब्रिटिश शासकों ने उदयपुर , जयपुर , जोधपुर की रियासतों को सूचित किया कि वे इस बात का पूरा ध्यान रखें कि उनकी रियासतों में कोई गोहत्या न हो ।

इससे पूर्व किसी भी सन्धि में ब्रिटिशों ने कोई गोहत्या निशेध का इस प्रकार का उल्लेख नहीं किया था । जैसे जैसे ब्रिटिश ताकतवर होते गए इस संवेदनशील मुद्दे की चिन्ता भी कमजोर पढ़ती गई ।

पहले 1750 के पश्चात तक सेना की आवश्यकता की पूर्ति के लिए 1760 तक सूखा मांस ब्रिटेन से रखरखाव आदि के विषय में भी आवश्यक निर्देश होने चाहिए ताकि कोई हानि न हो , आयुर्वेद में इसका उल्लेख है ।

इस प्रकार से इलाज करने से अनेक दुर्धर रोगों के इलाज का प्रमाण प्रस्तुत किया है चेहरे पर व्रणों का इलाज , लीवर की सूजन का समाप्त होना विभिन्न अंगों में कर्करोग , जीभ , फेफड़े , कुश्ठ रोग , श्वेत कुष्ठ आदि का भी इलाज संभव हुआ है ।

बरसों पुराने रोगों का प्रभाव कम करने की क्षमता इन ●

औषधियों में विद्यमान है । हम अपने प्राचीन कालीन वैभव के आधार को भूल गए इसीलिए देश में सभी ओर दौर्बल्य आया है जब तक हम गाय का दूध पीते रहे मुगलों को टक्कर देते रहे

किन्तु जब अंग्रेज आए हमने गाय का दूध पीना बंद कर दिया और दासत्व में जकड़ गए जब से समुद्र मंथन से कामधेनु की उत्पत्ति हुई

तभी से पंचगव्य चिकित्सा का भी प्रारंभ हुआ इस पंचगव्य में विष को भी समाप्त करने की क्षमता है इसे सुपर स्पेशियलिटी औषधि वर्णित करते हुए इसके प्रचार प्रसार एवं सामाजिक जागृति लाने की आवश्यकता है ।

गोबर और गोमूत्र दरिद्रता नाश का परम उपाय है गोरीर को जल से स्नान कराना , सहलाना , सींगों को मलना चाहिए ।

शरीर के जिस अंग में शून्यता आ गई हो उसमें गोबर को लेप करके 30 मिनट छोड़ देने पर अंग पुनः शक्तिमान हो जाएगा ।

सन् 2000 के समकालीन अमेरिका के डा गैकफर्सन ने गोबर पर दो वर्ष अनुसंधान कार्य किया उसका महत्त्व न्यूयार्क टाइम्स में छपवाया लिखा है ‘

कि गोबर के समान उत्तम कीटनाशक दूसरा उपयुक्त पदार्थ नहीं है जो कीटाणु तो नाश करता ही है किन्तु मानव शरीर को कोई विषमता नहीं पहुंचाता ।

इसमें ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिस गाय का गोबर प्रयोग किया जाए वह निरोग हो और उसका आहार भी शुद्ध हो जो सड़कों पर घूमती हुई गाय का नहीं होता

गौशाला या घर की गायों का ही होता है । गोमूत्र गोबर , दूध , दही , घृत , कुशा के जल को ग्रहण करने से दुःस्वप्न नहीं होते ।

गोमय लेपन से कृमि कीट का विनाश होता है

गोग्रास दान से स्वर्ग प्राप्त होता है । पर पुरूष की गौ को ग्रास देना स्वर्ग प्राप्त करता है , गौओं का हित करने वाला ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है ।

गोदान , गोकीर्तन गौओं को मधुर संगीत का सुनानाद्ध द्वारा गोरक्षा से कुल का उद्धार होता है ।

गौ के श्वास से भूमि वैदिक संस्कृति में गोधन[/vc_column_text][/vc_column][/vc_row][vc_row disable_element=”yes” woodmart_css_id=”62409c69e21bb” responsive_spacing=”eyJwYXJhbV90eXBlIjoid29vZG1hcnRfcmVzcG9uc2l2ZV9zcGFjaW5nIiwic2VsZWN0b3JfaWQiOiI2MjQwOWM2OWUyMWJiIiwic2hvcnRjb2RlIjoidmNfcm93IiwiZGF0YSI6eyJ0YWJsZXQiOnt9LCJtb2JpbGUiOnt9fX0=” mobile_bg_img_hidden=”no” tablet_bg_img_hidden=”no” woodmart_parallax=”0″ woodmart_gradient_switch=”no” woodmart_box_shadow=”no” wd_z_index=”no” woodmart_disable_overflow=”0″ row_reverse_mobile=”0″ row_reverse_tablet=”0″][vc_column][vc_video link=”https://www.youtube.com/watch?v=bSkTtJrysWo” el_width=”50″ image_poster_switch=”no”][/vc_column][/vc_row][vc_row disable_element=”yes” woodmart_css_id=”62409e0454979″ responsive_spacing=”eyJwYXJhbV90eXBlIjoid29vZG1hcnRfcmVzcG9uc2l2ZV9zcGFjaW5nIiwic2VsZWN0b3JfaWQiOiI2MjQwOWUwNDU0OTc5Iiwic2hvcnRjb2RlIjoidmNfcm93IiwiZGF0YSI6eyJ0YWJsZXQiOnt9LCJtb2JpbGUiOnt9fX0=” mobile_bg_img_hidden=”no” tablet_bg_img_hidden=”no” woodmart_parallax=”0″ woodmart_gradient_switch=”no” woodmart_box_shadow=”no” wd_z_index=”no” woodmart_disable_overflow=”0″ row_reverse_mobile=”0″ row_reverse_tablet=”0″][vc_column][vc_single_image image=”1435″ parallax_scroll=”no” woodmart_inline=”no”][/vc_column][/vc_row]

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