वैदिक जीवन
Vedic Jeevan

200.00

AUTHOR: Dr. Raghuveer Vedalankar (डॉ. रघुवीर वेदालंकार)
SUBJECT: Vedic Jeevan | वैदिक जीवन
CATEGORY: Vedic Literature
LANGUAGE: Hindi
EDITION: 2025
PAGES: 320
BINDING: Paperback
WEIGHT: 354 g.
Description

वैदिक जीवन (पूर्व कथ्य)

जीना और जीवन दोनों अलग-अलग चीजें हैं। पशु-पक्षी भी जी रहे हैं, किन्तु क्या वे जीवन का उपयोग भी कर रहे हैं? क्या उन्हें जीने तथा जीवन के अन्तर का पता है? क्या वे अपने जीवन में कुछ परिवर्तन-परिवर्धन कर सकते हैं? इन सभी का उत्तर नकारात्मक है। वे जी रहे हैं, बस जी रहे हैं, खा-पी रहे हैं। सुख-दुःख का अनुभव भी कर रहे हैं, किन्तु यह सब एक सुनिश्चित प्रक्रिया के अन्तर्गत हो रहा है। न तो उन्हें जीवन का कोई भान है तथा न ही वे इसमें परिवर्तन-परिवर्धन कर सकते हैं।

तो क्या हम मानव भी ऐसा ही जीवन जी रहे हैं? क्या हम भी खाने-पीने-सोने-सन्तान तथा सुख-दुःखों तक ही सीमित हैं? क्या हमें भी अपने जीवन तथा इसके प्रयोजन का पता नहीं? यदि ऐसा है तो यह पाशविक जीवन है। परमेश्वर ने मनुष्य को मनुष्य-ज्ञानवान् बनाया है, पशु नहीं, जो कि ‘पश्यति स्वार्थम्’ केवल अपने स्वार्थ को ही देखता है। अपने सुख को ही देखता है। कम से कम हमें मानुष जीवन तो जीना ही चाहिए।

स्वार्थ से ऊपर उठकर विवेक के आधार पर कार्य करने चाहिएं। अपने साथ दूसरों को भी खिलाते रहना चाहिए। स्व से पर की ओर बढ़ना चाहिए। जो ‘स्व’ (अपने) तक सीमित है वह स्व + अर्थी स्वार्थी है। जो ‘स्व’ से ऊपर उठकर पर अन्य को भी देखता है, उसके लिए भी जीता है, उसके लिए कुछ करता है, वह परार्थी है। मानव जीवन केवल स्वार्थ के लिए नहीं, अपितु परार्थ के लिए भी है।

इससे भी थोड़ा आगे चलिए। कुछ तत्त्व ऐसे भी हैं, जो केवल परार्थ के लिए ही हैं, स्वार्थ वहां है ही नहीं। तत्त्व मैंने इसलिए कहा कि ऐसे तत्त्व दोनों प्रकार के हैं। जड़ भी तथा चेतन भी। वृक्ष, सूर्य, चन्द्रमा, नदियाँ, पृथिवी, पर्वत आदि ऐसे ही तत्त्व हैं जो केवल परार्थ ही हैं। उनका अपना कोई प्रयोजन है ही नहीं। मनुष्यों में भी ऐसे अनेक महानुभाव हैं जो केवल परार्थ में ही रत हैं। उपर्युक्त ये दोनों तत्त्व देव कहलाते हैं।

हम मनुष्यत्व से भी ऊपर उठकर देवत्व को प्राप्त करें। दैवीय जीवन जिएँ, तभी जीवन की सफलता है, तभी उपयोगिता है। पशु इस काम को नहीं कर सकते, क्योंकि उनमें इतना विवेक ही नहीं। मानव! तू तो विवेकशील प्राणी है। परमेश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना है। उसके सबसे अधिक निकट है। तुझे तो पाशविक जीवन से ऊपर उठकर मानवीय जीवन तथा मानवीयता से ऊपर उठ कर दैवीय जीवन बिताना चाहिए। तभी तेरे जीवन की सफलता है, किन्तु तू तो आज अपने स्वाभाविक मानुषी जीवन को भी छोड़कर आसुरी जीवन, राक्षसी जीवन जीने लगा। पशुओं से भी नीचे गिर गया। यदि पशुओं में वाणी होती तो वे तेरी इस अधोगति पर अवश्य ही हँसते। अवश्य ही आँसू बहाते।

प्रस्तुत पुस्तक इसी उद्देश्य से लिखी गयी है। वेद हमें जीवन का अर्थ बतलाता है। उसे जीने की शिक्षा देता है। वेद जीवन को निम्न से उच्च, उच्च से उच्चतर तथा उससे भी ऊपर उठकर उच्चतम बनाने की न केवल प्रेरणा ही देता है, अपितु मार्गद्रष्टय की भाँति हमारा मार्गदर्शन भी करता है। जीवन क्या है, क्यों मिला? क्या प्रयोजन है इसका? इन प्रश्नों का समाधान हमें वेद में मिलेगा। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज में वह कैसे जिये?

कैसे वह अपने तथा दूसरों के जीवन को समुन्नत कर सके? इस कार्य में वेद हमारा मार्गदर्शक बनता है। मानव जीवन का प्रयोजन धर्म-अर्थ-काम तथा मोक्ष की सिद्धि करना है। वेद हमें इनकी सिद्धि का मार्ग बतलाता है। हमारे इस शरीर के अन्दर एक आत्मतत्त्व है, जिसका साक्षात्कार केवल मनुष्य ही कर सकता है, पशु-पक्षी नहीं। वेद हमें इसके साक्षात्कार का मार्ग बतलाता है। आत्म तत्त्व के साथ ही एक अन्य अजर-अमर-नित्य तत्त्व वहाँ बैठा है, जिसे ईश्वर आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। उनका नाम तथा शुद्ध स्वरूप भी हमें वेद ही बतलाता है।

जीवन जीने के लिए कर्म करना अनिवार्य है। हमारे वे कर्म कैसे हों? क्या पशुवत् ? क्या असुरवत्? क्या मनुष्यवत् तथा दैववत् ? इन सभी का उत्तर वेद देता है। हमारा पारस्परिक व्यवहार कैसा हो, परिवार कैसा हो, राष्ट्र कैसा हो, उसकी रक्षा कैसे हो, विश्व में सुख-शान्ति कैसे हो? इन सभी का उत्तर वेद देता है और अन्त में दुःखों से छूट कर हम उस आनन्दधन परमानन्द स्वरूप अचिन्त्य अगोचर शक्ति को प्राप्त कर सकें, इसका मार्ग भी हमें वेद बतलाता है।

वेद हमें जीने तथा मरने की कला सिखाता है। वेद कहता है कि हमारा जीवन हसाय आनन्द के लिए हो, दुःखमय न हो तथा मृत्यु भी ‘उर्वारुकमिव’ पके हुए सुगन्धित खरबूजे की तरह हो, दुःखदायी न हो, स्वाभाविक, शान्तिमय हो। ‘ज्योक् च सूर्यं दृशे’ एक दीर्घ अवधि तक सूर्य को देखते हुए ‘अरिष्टानि-अंगानि’ समर्थ इन्द्रियों के साथ हम संसार में रहें। आगे बढ़ें, उद्यान उद् + यान करें। अवयान अवनति न करें।

इन सब बातों की शिक्षा हमें वेद देते हैं। इसीलिए शंकराचार्य वेद को प्रदीपवत् सर्वार्थद्योती = सभी प्रयोजनों को सिद्धि करने वाला कहते हैं। सायणाचार्य के अनुसार वेद हमारे अभीष्ट को प्राप्त कराता है तथा अनिष्ट का परिहार करता है। मनु वेदों को सर्वज्ञानमय कह रहे हैं। इसके अनुसार ही महर्षि दयानन्द वेदों को सभी सत्य विद्याओं की पुस्तक कह रहे हैं।

– रघुवीर वेदालंकार

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