वेद प्रतिष्ठा Ved Pratishtha
₹100.00
- Author: Acharya Satyajit
- Language: Hindi
- Publication: Vedic Pustakalaya Ajmer
- Pages: 334
- Edition: 2016
- Cover: Paperback
- Weight: 360 Gms.
भूमिका
भारत में वेद विशेष चर्चा के विषय रहे हैं। विश्वभर के चिंतकों-विचारकों ने भी वेद पर अपने विचार मन्तव्य रखे है। यह वेद के महत्व को रेखांकित करता है। इन चर्चाओं में वेद समर्थक भी रहे हैं व वेद के विरोधी भी रहे हैं। एक वर्ग तथाकथित तटस्थ रूप से भी वेद का समालोचक रहा है। किसी भी विषय पर चर्चा हो, यह अच्छी प्रक्रिया है, समालोचना में हुए आलोडन-विलोडन से विषय खुलता है, स्पष्टता आती है।
यह प्रक्रिया यदि तर्क-युक्ति-न्यायपूर्वक हो तो परिणाम हितकर आते हैं। कुछ व्यक्ति चर्चा के नाम पर आग्रह विशेष को स्थापित करना चाहते हैं। इसके लिए वे कुतर्क व अनुचित रीति को अपना लेते हैं। प्रतिष्ठित वेद का इस प्रकार खण्डन करते हुए वे अपने को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, अपने को वेद से ऊंचा स्थापित करना चाहते हैं, इसी में उन्हें प्रसन्नता मिलती है।
वेद की अपनी एक भाषा है, अपनी एक शैली है। इसे ध्यान में रखते हुए प्राचीन ऋषियों ने वेद को जानने-समझने के लिए एक परंपरा विकसित की है। उस परंपरा से अनभिज्ञ व्यक्ति यदि वर्तमान की किसी भाषा व शैली के अनुसार वेद को देखेगा तो वह वेद के साथ न्याय नहीं कर पायेगा। किन्तु वैचारिक स्वतन्त्रता के नाम पर स्वच्छन्द चिंतन चला और इस प्रकार वेदों पर बहुत सारे निराधार कपोल कल्पित आक्षेप किये जाते रहे। इसके निराकरण-समाधान के प्रयत्न भी वैदिक परम्परा के विद्वानों-चिंतकों द्वारा किये जाते रहे हैं।
पिछले कुछ दशकों से वेदों को अप्रतिष्ठित करने के प्रयास नये तरीके से किये गये, मूल आक्षेप तो प्रायः पूर्ववत् ही थे। इनके समाधान भी किये गये, प्रवचनों, लेखों व पुस्तकों के माध्यम से। ये समाधान प्रायः परंपरागत शैली में रहे। आक्षेपकों ने यह दुष्प्रचारित किया कि ये समाधान हमारे आक्षेपों का उचित समाधान करने में असमर्थ हैं। आक्षेपकों ने दुराग्रहपूर्वक हठ कर रखी थी कि आक्षेपों का उत्तर मात्र वेद व तर्क-युक्ति से दिया जाय, अन्य ग्रन्थों का प्रमाण उन्हें स्वीकार्य नहीं है।
ऐसे में विचार हुआ कि क्यों न इन्हें इन्हीं की शैली से उत्तर दिया जाए। साथ ही इनकी इस शैली को इन पर भी लागू कर के इनके आक्षेपों की भी समालोचना की जाए। इन्हें इस का बोध कराया जाए कि तर्क-युक्ति की बात करने वाले आप लोग अपने विचारों-निर्णयों-आक्षेपों में कितने अधिक तर्कहीन व अयुक्तियुक्त हो जाते हैं। उन्हें भी तर्क-युक्ति के आधार पर अपने गिरेवान में झंकवाया जाए, अपने मुख को दर्पण में दिखाया जाए।
बस इस पृष्ठभूमि में एक-एक करके लेख लिखे जाते रहे। ये लेख ‘परोपकारी’ पत्रिका में छपते रहे। महर्षि दयानन्द सरस्वती की उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा अजमेर जहाँ वेदों के प्रचार-प्रसार के लिए तत्पर है, वहाँ वह वेदों पर हुए आक्षेपों का समाधान करने के लिए भी प्रयास करती है।
परोपकारिणी सभा ने अपनी पत्रिका ‘परोपकारी’ में लगातार इन लेखों को दिया। इनके परिणाम स्वरूप आक्षेपकों की बोलती बन्द हुई, वे बहाने बनाकर उत्तर देने से बचने लगे, वे आक्रामक मुद्रा से रक्षात्मक मुद्रा में आ गये। वस्तुतः वे उन पर की गई समालोचना का उत्तर भी न दे पाये, अपनी रक्षा भी न कर पाये। इन लेखों से उन वेद प्रेमियों को बहुत संतोष व शान्ति मिली जो वेदों पर हुए आक्षेपों को सुन-सुन कर आहत होते रहे थे।
लेखों की इस श्रृंखला में ३९ लेख लिखे गये, जिनमें पं. उपेन्द्रराव जी द्वारा प्रस्तुत १०० प्रश्नों (आक्षेपों) में से २८ के उत्तर आ चुके हैं। उनकी मूलभूत चिंतन व आक्षेप शैली की समीक्षा तो साथ ही साथ स्वतः होती गई। इस दृष्टि से उनका पूरा आक्षेप तन्त्र धराशायी हो चुका है। हाँ, उनके शेष प्रश्नों का सीधा-सीधा उत्तर नहीं आ पाया। यदि आगे कभी उचित संयोग बना तो शेष की समीक्षा भी लिखी जानी चाहिए, यह मुझे भी प्रतीत होता है।
वेद प्रेमियों की मांग आती रही कि इन लेखों को संगृहीत कर पुस्तकाकार में लाना चाहिए। उनकी यह इच्छा अब पूरी हो पा रही है। इस पुस्तक में लेखों को लगभग पूरा उसी रूप में रखा गया है जैसा परोपकारी में छपा था। उचित व आवश्यक आंशिक संशोधन परिवर्तन किये गये हैं।
परमात्मा की कृपा-सहयोग का विस्मरण तो कैसे हो सकता है, उसके प्रति धन्यवाद-कृतज्ञता सदा बनी रहे यह उससे प्रार्थना है। परमात्मा का स्मरण ही इस मार्ग पर चलाये रखता है।
निवेदक
सत्यजित्
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