तन्मेमनः शिवसंङ्कल्पमस्तु का वैज्ञानिक विवेचन Tanme Manah Sivasankalpamastu ka Vaigyanik Vivechan
₹25.00
- Author: Dr. Satyadev Arya
- Language: Hindi
- Publication: Vedic Pustakalaya Ajmer
- Pages: 100
- Edition: 2008
- Cover: Paperback
- ISBN: 818883419X
- Weight: 135 Gms.
सस्ते सरल साहित्य प्रकाशन की श्रीमती परोपकारिणी सभा की उदार योजना के अन्तर्गत “तन्मेमनः शिवसङ्कल्पमस्तु का वैज्ञानिक विवेचन” शीर्षक से यह तृतीय साधना सुमन पाठकवृन्द की सेवा में प्रस्तुत करने का सुयोग सभा के सौजन्य से प्राप्त कर रहा हूं। इसी योजना में मेरी पूर्व प्रकाशित दो पुस्तकें “वैदिक सन्ध्या मीमांसा” और ईश्वर स्तुति प्रार्थनोपासना मन्त्रों का विवेचन” पाठकवृन्द ने सोत्साह अपना कर मुझे प्रेरित एवं उपकृत किया है। आशा है यह पुस्तक भी पाठकवृन्द समरूप सोत्साह में अपना कर उपकृत करेंगे।
“तन्मेमनः शिवसङ्कल्पमस्तु” मन्त्रों पर विवेचन मनोवैज्ञानिक विज्ञान का विषय है। मैं इस विषय का विद्यार्थी नहीं रहा हूं। मेरा विषय तो मुख्यतया चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विज्ञान का ही रहा है, फिर भी इस विषय पर भी हटात लेखनी उठा ही बैठा हूं। आशा है विद्वदवर्य मेरी जो भी त्रुटियां रहें उसके लिये अपनत्व प्रदान कर मेरा यथेष्ट मार्गदर्शन करेंगे।
शिवसंकल्पमन्त्रों पर विवेचन के सन्दर्भ में मन की अवस्थिति, मन की विशिष्ट कार्य प्रणाली, मन के कार्यानुरूप उसके उपभेद व प्रत्येक उपभेद के विशिष्ट कार्यों के सम्बन्ध में यत्किञ्चित् जानकारी देना अधिक उपयोगी था, इसी से यथासाध्य यह जानकारी केवल संक्षिप्त रूप ही में देने का प्रयास किया है। आशा है विषय को समझने के लिये यह यथोचित सिद्ध होगी।
मन हमारे मनोवैज्ञानिक तन्त्र का प्रमुख अङ्ग है। अन्तःकरणीय साधनों में जहाँ बुद्धि व चित्त संसद का कार्य करते हैं वहां मन प्रधान मन्त्री का कार्य करता है। मन ही के माध्यम से बाह्य विषयों का यथेष्ट बोध होता है और ऐच्छिक व अनैच्छिक कार्य सम्पादित होते हैं। अतः मन का शिवसङ्कल्पयुक्त होना अत्यावश्यक है। इसी से यजुर्वेद के ३४वें अध्याय के प्रथम ६ मन्त्रों में मन को शिवसंकल्पयुक्त बनाने का आदेश दिया गया है। मन्त्रों के विवेचन में महर्षि के किये पदार्थों और स्वामी आत्मानन्दजी के किये अर्थों का विशेष ध्यान रक्खा गया है।
पुस्तक नितान्त निःस्वार्थ भाव ही से लिखी गई है। आशा है सभा के सौजन्य से यह जन-जन केहाथों में पहुंच पाठकवृन्द को यथेष्ट लाभान्वित कर पायेगी। सभा की इस उदारवृत्ति के लिये मैं सभा का हृदय से आभारी हूं। प्रो. धर्मवीरजी सम्पादक ‘परोपकारी मासिक’ एवं संयोजक सस्ता साहित्य प्रकाशन समिति का हृदय से आभारी हूं, जिन्होंने समय-समय पर यथेष्ट प्रोत्साहन देने और कतिपय स्थलों पर अपना अमूल्य सुझाव भी देते रहने का अनुग्रह किया है। श्री सतीशचन्द्रजी शुक्ल, व्यवस्थापक वैदिक यन्त्रालय का भी अत्यन्त आभारी हूं, जिन्होंने पुस्तक के प्रकाशन में अथक श्रम किया और पूर्ण रुचि लेकर पुस्तक का यह सुष्ठु प्रकाशन प्रस्तुत किया है।
अन्त में पाठकवृन्द का भी हृदय से आभारी हूं जिन्होंने मेरी पूर्व की प्रकाशित दोनों पुस्तकों को सोत्साह से अपनाकर मुझे प्रोत्साहित किया है और आशा है इस पुस्तक को भी समरूप सोत्साह से अपनाकर उपकृत करेंगे।
विनीत
सत्यदेव आर्य
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