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पुस्तक-लेखन की प्रेरणा
पूज्यपाद गुरुदेव आचार्य श्री विजयपाल जी विद्यावारिधि के उपकारों से मैं इतना उपकृत हूँ कि उसे शब्दों के द्वारा अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। १९५९-६० में मैं बड़ौत इण्टर कालेज में हाई स्कूल का छात्र था। उस समय अन्य कई मासिक पत्रिकाओं के साथ ‘वेदवाणी’ पत्रिका भी वहां विद्यालय में आती थी। मैं तभी से वेदवाणी पत्रिका के वेदमन्त्रों की व्याख्या बहुत रुचि लेकर पढ़ता था। विज्ञान विषय में स्नातक तक शिक्षा प्राप्त करने के अनन्तर स्वामी ओमानन्द सरस्वती जी के साथ मैं वेदाङ्गों के अध्ययन के लिए बहालगढ़ पाणिनि महाविद्यालय में पहुँचा।
पूज्यपाद आचार्य विजयपाल जी तथा श्री पं० युधिष्ठिर जी मीमांसक के चरणों में बैठकर वेद के अङ्गोंपाङ्गों का अध्ययन किया। लगभग दस वर्ष वहाँ लगातार अध्ययन करने के उपरान्त सन् १९८४-८५ में हम साधना के विचार से उत्तरकाशी आ गये। बीच-बीच में गुरुजनों के पास जाना होता रहता था। १९९७-९८ में जब बहालगढ़ गया तो आचार्य श्री ने कहा कि वेदवाणी पत्रिका में प्रतिमास एक वेदमन्त्र की व्याख्या प्रारम्भ से ही दी जा रही है।
पहले जिन विद्वानों ने ‘वैदिक विनय’ आदि पुस्तकें लिखी हैं उनसे मन्त्रों को लेकर पत्रिका में छापते रहे। उन्हीं पुस्तकों के मन्त्रों को दो-दो बार छापना उचित नहीं है। कुछ नये विचार भी समाज में जाने चाहिएं। इसलिए तुम यह काम शुरू करो। या तो प्रतिमास एक वेदमन्त्र लिखकर दे दो या चार छह मन्त्रों की व्याख्या लिखकर दे दो। हम उन्हें एक-एक करके छापते रहेंगे। मैंने गुरुजी से कहा- गुरुदेव ! यह काम तो बहुत कठिन है। यह तो ऋषि-मुनियों का काम है।
तब गुरु जी ने कहा कि काम तो कठिन है किन्तु असम्भव तो नहीं है। तुम्हें वेद के सब अङ्गोंपाङ्गों को पढ़ाया है और भी वैदिक वाङ्मय का अध्ययन किया और कराया है तो उसका उपयोग करो। मैंने कहा-गुरुदेव ! आपका आदेश है तो मैं यत्न करता हूँ। जहाँ कहीं कुछ भूल होगी तो आप मार्ग निर्देश कीजिये। गुरु जी ने इतना ही कहा कि वेदों का स्वाध्याय करके ईश्वर-भक्ति के मन्त्रों का चारों वेदों से चयन कर लो।
व्याख्या ईश्वर-स्तुति, प्रार्थना, उपासना परक ही होनी चाहिए। मन्त्र के पदों का अर्थ देकर भावार्थ लिखो। व्याख्या बहुत लम्बी न हो। सरल शब्दों में भाव लिखिये। गुरु जी की आज्ञा के अनुसार मैंने लिखना शुरु कर दिया। दो-चार मन्त्रों के जो अर्थ लिखे तो गुरु जी ने मेरी शैली का समर्थन कर दिया। गुरु जी के समर्थन से मेरा भी उत्साहवर्धन हुआ।
इस काम को करते हुए मुझे जब लगभग डेढ़-दो साल हो चुके थे, उन दिनों मैं ब्रह्मचारीवेश में ही रह रहा था। १९९९ ई० में मन में विचार आया कि जीवन तो एक सन्त का जी ही रहा हूँ, वैदिक परम्परा के अनुसार संन्यास की दीक्षा भी ले लेनी चाहिये। यह विचार मुझे दीनानगर (पंजाब) स्वामी सर्वानन्द जी के पास ले गया। वहाँ गया तो एक विचित्र घटना घटी। स्वामी जी के पास एक विद्यार्थी बैठा हुआ था।
मैंने जाकर जब स्वामी जी को प्रणाम किया तो स्वामी जी ने मुझसे पूछा- कहाँ से आये हो? मैंने कहा-उत्तरकाशी से आया हूँ। स्वामी जी की बड़ी आयु होने के कारण उन्हें साफ सुनाई नहीं दिया। तब छात्र ने कान के पास जोर से बोल कर बताया कि उत्तरकाशी से आये हैं। स्वामी जी ने फिर दूसरा प्रश्न किया कि क्या नाम है ? दैवयोग से स्वामी जी उस समय वेदवाणी पत्रिका में लिखी हुई वेदमन्त्र की व्याख्या ही पढ़ रहे थे। मैंने उन्हें देख लिया था। तब मैंने मन्त्र के नीचे लिखे हुए नाम पर ही अंगुली लगाकर बताया कि यह नाम मेरा ही है। स्वामी जी ने पूछा कि तुम मन्त्र की व्याख्या लिखते हो ?
मैंने कहा-स्वामी जी मैं मन्त्र व्याख्या लिखने वाला नहीं, यह तो गुरुजनों के आशीर्वाद का फल है। उन्हीं की कृपा से यह कार्य चल रहा है। तीन दिन के बाद श्रावणी पर्व आ रहा था। पर्व के पहले दिन स्वामी सदानन्द जी ने मुझ से पूछा कि आप अपने संन्यास के नाम के विषय में कुछ सोच कर आये हो? मैंने कहा- मैंने तो कुछ नहीं सोचा। तब सदानन्द जी ने कहा कि आप आज ही स्वामी जी से पूछ लो, उन्होंने तुम्हें क्या नाम देना है।
उनके कहने पर मैं स्वामी जी के पास चला गया। वहाँ जाकर स्वामी जी से पूछा कि स्वामी जी! मेरे नाम के विषय में क्या विचार किया है? स्वामी जी ने कहा- नाम के विषय में क्या विचार करना था। वेदमन्त्रों की व्याख्या करते हो तो नाम वेदानन्द होगा। दूसरे दिन दीक्षा के समय मुझे स्वामी वेदानन्द सरस्वती के नाम से पुकारा गया। यह नाम तो मुझे गुरुवर स्वामी सर्वानन्द जी ने प्रदान किया किन्तु वेद मन्त्रों की व्याख्या लिखने की योग्यता तो पूज्यपाद आचार्य विजयपाल जी ने ही प्रदान की थी। इसलिए मैं उस महान् दिव्य आत्मा के उपकार को नहीं भूल सकता।
ऋषियों के ऋण से पार होने के लिए उन्होंने मुझे इस पवित्र पथ का पथिक बनाया। जन सामान्य तो न वेद पढ़ सकते हैं और न ही वेदों के अर्थ को जान सकते हैं। इसलिए जनहित के दृष्टिकोण से आचार्य श्री ने मुझे ईश्वरभक्ति के न्यून से न्यून तीन सौ पैंसठ मन्त्रों के भावार्थ लिखकर पुस्तक रूप में छपवाने का आदेश दिया था। आप लोगों के हाथ में जो यह पुस्तक प्रस्तुत है यह उन्हीं गुरुदेव के आदेश के अनुपालन के रूप में लिखी गई है। इस कार्य के लिए वेदों के चिन्तन, मनन और लेखन से जो मुझे आध्यात्मिक आनन्द मिला है उसे मैं शब्दों द्वारा अभिव्यक्त नहीं कर सकता।
गुरुदेव आचार्य श्री विजयपाल जी एक ऋषि आत्मा थे। ४३ वर्षों तक मुझे उनके सान्निध्य में रहने का अवसर मिला। ‘स्वर्ग-सोपान’ पुस्तक लिखने की प्रेरणा मुझे उसी ऋषि आत्मा से प्राप्त हुई। पूज्यपाद श्री पं० युधिष्ठिर जी मीमांसक ने भी मुझे वेद-वेदाङ्गों के लिए जीवन लगाने का आदेश दिया था। गुरुजनों की कृपा से ऋषि ऋण से उऋण होने के लिये मैंने इस ग्रन्थ को लिखने का श्रम किया। ईश्वर-भक्ति पूर्ण इस ग्रन्थ के स्वाध्याय से जिज्ञासु पवित्र आत्माओं को सत्प्रेरणा मिलेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। स्वाध्यायशील लोगों को इससे कुछ लाभ मिलेगा तो हमारा अपना परिश्रम भी सफल होगा।
– स्वामी वेदानन्द सरस्वती
ज्ञानकेन्द्र, वेदमन्दिर, कुटेटी,
उत्तरकाशी।

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