स्वामी दयानन्द को जानें Swami Dayanand ko Janen
₹70.00
- Author: Dr. Vivek Arya
- Language: Hindi
- Publication: Bharatiya Hindu Shuddhi Sabha
- Pages: 73
- Edition: 2026
- Cover: Paperback
- ISBN: 9789334132458
- Weight: 105 Gms.
स्वामी दयानन्द को जानें (Swami Dayanand ko Janen)
भूमिका
19वीं शताब्दी में पराधीन भारत में स्वामी दयानन्द का भारत भूमि पर आगमन करोड़ों भारत वासियों के लिए एक वरदान पूर्ण होने जैसा था। चिर काल से पराधीन देश मराठा और सिख शासकों के काल में विदेशी दासता से स्वाधीन हुआ पर धार्मिक स्वतंत्रता की अभी प्राप्ति नहीं हुई थी। इस्लामिक शासन के क्षीण होते-होते ईसाइयत ने देश में अपने पाँव पसारने शुरू कर दिए। इस्लामिक शासन से चोट खाया हिन्दू समाज जैसे तैसे अपने को संभालने लगा था कि ईसाइयत के आक्रमण ने उसकी नींव को और अधिक कमजोर कर दिया।
बाल विवाह, सती प्रथा, बहु विवाह, बाल विधवाओं की भीड़, इस्लामिक और ईसाई मतांतरण, धार्मिक अन्धविश्वास, गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का लुप्त होना, वेद विद्या का लोप होना, गोहत्या, भोगवादी और नास्तिकता, विदेशी दासता आदि कुरीतियों से ग्रसित होकर भारतीय जनमानस अपने प्राचीन गौरव को भूल गया कि कभी भारत भी विश्व गुरु था। ऐसे संक्रमण काल में देव दयानन्द का जन्म गुजरात की धरा पर हुआ। आरम्भिक परिस्थितियों ने आपके पूर्वजन्म के संस्कारों को जागृत किया और आपने सच्चे शिव की खोज में गृह त्याग कर दिया। वर्षों तक भ्रमण, तप, सत्संग, स्वाध्याय, शोध, योग-समाधि, विश्लेषण, चिन्तन, मनन, अनुभव करते हुए आपने देश की दुर्दशा रूपी रोग का निवारण वेद रूपी औषधि को बताया।
इसी आधार पर आपने ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा दिया। स्वामी जी ने प्राचीन परिपाटी का अनुसरण करते हुए इस काल में विभिन्न मत-सम्प्रदायों के प्रतिनिधियों से शास्त्रार्थ किये। जन सामान्य को जागरूक करने के भाषण दिए। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ रूपी अमर ग्रन्थ की रचना कर समाज में प्रचलित भ्रांतियों का निवारण किया। समाज सुधार के उद्देश्य से 1875 में मुंबई में आर्यसमाज की स्थापना की।
स्वदेशी एवं स्वशासन के लिए आर्य नरेशों को प्रोत्साहित किया। स्वामी जी की प्रेरणा से हज़ारों क्रांतिकारी भारत माँ के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित करने के लिए प्रेरित हो गए। स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय, रामप्रसाद बिस्मिल, भाई परमानन्द, भगत सिंह, सुखदेव थापर आदि महान् क्रांतिकारियों के चिंतन में प्रेरणा स्त्रोत्र स्वामी दयानन्द ही थे।
गौ माता को कसाइयों के यहाँ जाने से बचाने के लिए आधुनिक भारत की प्रथम गौशाला की स्थापना की। राष्ट्र को एकसूत्र में बांधने के प्रयोजन से राष्ट्रभाषा हिंदी को आर्य भाषा कहकर प्रोत्साहित किया। नारी और शूद्रों को शिक्षा प्राप्ति और सभी धार्मिक अधिकार प्रदान किये। अनाथों और विधवाओं को आश्रय देने के अनाथालय और विधवा आश्रम खोलने के लिए प्रेरित किया। जातिगत भेदभाव के अंतर्गत समाज के एक बड़े वर्ग को धार्मिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा था।
स्वामी जी ने इस भेदभाव को रोकने के लिए ‘वेद सभी के लिए’ का नारा दिया और आर्यसमाज ने सभी के लिए यज्ञ करने, जनेऊ धारण करने, वेद पढ़ने और पढ़ाने के विचार पर जमीनी स्तर पर कार्य किया। वेदों को भारतीय लगभग भूल चुके थे। स्वामी जी ने अपने महान् पुरुषार्थ से न केवल चार संहिता को वेद सिद्ध किया अपितु वेदों से संबंधित भ्रांतियों के निवारण के लिए प्राचीन ऋषियों की परिपाटी पर वेदों का आर्य भाषा में भाष्य कर उसे जनमानस के लिए उपलब्ध करवाया। समय के अनुसार यज्ञ और कर्मकांड जैसे धार्मिक संस्कार विकृत हो गए थे।
स्वामी जी ने संस्कारों के शुद्धिकरण के लिए ‘संस्कार-विधि’ पुस्तक की रचना कर संस्कार प्रक्रिया को पुनः शुद्ध रूप में स्थापित किया। स्वामी जी ने विधर्मी हो चुके भाइयों के लिए शुद्धि का मार्ग खोलकर सदियों से बंद उस परम्परा को पुनर्जीवित किया जिसे हिन्दू समाज विस्मृत कर चुका था। स्वामी जी ने जातिवाद उन्मूलन के लिए वर्ण व्यवस्था को प्रतिपादित किया जिसके अनुसार व्यक्ति के जन्म से नहीं अपितु गुण, कर्म और स्वभाव से उनके वर्ण का चयन शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् होता है। इस पुस्तक में हम स्वामी दयानन्द और उनकी भारतीय समाज को देन पर चर्चा करेंगे।
डॉ० विवेक आर्य
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