स्वाभिमान का प्रतीक मेवाड़ Svaabhimaan ka prateek Mewar
₹100.00
- Author: Rajesharya Atta
- Language: Hindi
- Publication: Vedic Sarvahitkari Trust
- Pages: 144
- Edition: 2025
- Cover: Paperback
- Weight: 171 Gms.
सन्देश
अंग्रेजों के षड्यन्त्र का भण्डा फोड़ते हुए युगप्रवर्तक महर्षि दयानन्द ने कहा था- ‘ए भारतीयो ! तुम्हारे पूर्वज जंगलों में बसे अशिक्षित नहीं थे, अपितु विश्व को जाग्रत करने वाले महापुरुष थे। तुम्हारा इतिहास पराजय की गठरी नहीं, अपितु विश्व विजेताओं की गौरव गाथा है जागिये, उठिये और अपने उज्ज्वल इतिहास का अभिमान रखिए।’ इनकी राह पर चलते हुए आर्यसमाज में पण्डित लेखराम, पं० भगवद्दत्त रिसर्च स्कॉलर जैसे अनेक इतिहासकार हुए, जिनका प्रयास यही रहा कि हमारे देशवासी अपने सही इतिहास को जानें।
आर्यजगत् के उदीयमान लेखक विचारक श्री राजेशार्य ने ‘स्वाभिमान का प्रतीक मेवाड़’ पुस्तक की रचना कर दिग्भ्रमित लोगों को नवसंदेश दिया है। इससे पूर्व भी इनकी ‘हिन्दू इतिहास : वीरों की दास्तान’ नामक चर्चित पुस्तक और अनेक लेख-टिप्पणियाँ इतिहास व अन्य विषयों पर प्रकाशित हुए हैं।
मैं प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि ये नैरोग्य व उत्तम बल बुद्धि को प्राप्त कर ऐसे सामाजिक कार्यों में सर्वप्रकारेण लगे रहें।
डॉ० देवव्रत आचार्य
प्राचार्य, गुरुकुल कुरुक्षेत्र
(वर्तमान राज्यपाल, गुजरात)
इतिहास के पन्नों में शौर्य और बलिदान के इस प्रकार के अनेक प्रसंग छुपे हुए हैं, जो प्रकाश में नहीं लाए जा सके और केवल उन्हीं बातों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया जाता रहा जिनसे नई पीढ़ियों के आत्मगौरव व स्वाभिमान को चोट पहुँचाई जा सके। इसी प्रकार का प्रसंग देश के स्वाभिमान के प्रतीक मेवाड़ का है। जिस सर्वशक्तिमान सत्ता के सामने बड़े-बड़े शक्तिशाली शासक झुक गए, उसके सामने मेवाड़ के रूप में देश की गौरव पताका स्वाभिमान के साथ लहराती रही। कितना त्याग, कितना बलिदान !! एक बहुत लम्बे चलने वाले संघर्ष में किया गया।
पीढ़ियों तक अपने आदर्शों के लिए सर धड़ की बाजी लगाई जाती रही, और पक्षपाती इतिहासकारों ने उनको भी कायर कहने में संकोच नहीं किया। इसी गौरव गाथा को लेखक श्री राजेशार्य ने इस लघु पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इसमें लेखक कितना सफल हुआ है, यह तो प्रबुद्ध पाठक स्वयं ही निर्णय करेंगे, लेकिन इस बात का अवश्य ध्यान रखा जाए कि न तो यह कोई पाठ्यपुस्तक है और न ही कोई शोधग्रंथ। यह तो इस भारत वर्ष देश के विस्तृत गौरवशाली अतीत के एक बहुत ही छोटे से कालखंड का सिंहावलोकन मात्र है।
इतिहास का संकलन एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। फिर इस क्षेत्र में तो बहुत कुछ कार्य होना शेष है। यदि अपने पूर्वजों से प्रेरणा लेकर सैकड़ों वर्ष पूर्व मर चुके पीरों की मजारों और पत्थरों में सर पटकने वाले नौजवान अपनी क्लीवता और कायरता को त्यागकर व वीरता के भावों को धारण कर अपने पूर्वजों के गौरवशाली इतिहास की खोज करने को प्रेरित होंगे और देश के वास्तविक स्वरूप का चिन्तन कर उसके पुनर्निर्माण में प्रवृत्त होने को अग्रसर होंगे तो लेखक का सम्पूर्ण प्रयास सफल होगा।
– चन्द्रभानु आर्योपदेशक
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