श्रीमद्भगवद्गीता भाष्यम् (वैदिक-मन्तव्यानुसारी सरल-सुबोध-भाष्य) | Shrimadbhagvadgita bhashyam (simple, understandable commentary based on Vedic meaning)
₹100.00
- Author: Pandit Tulsiram Swami
- Language: Hindi
- Publication: Ramlal Kapoor Trust
- Pages: 160
- Edition: 2025
- Cover: Paperback
- Weight: 200 Gms.
श्रीमद्भगवद्गीता भाष्यम्
(वैदिक-मन्तव्यानुसारी सरल-सुबोध-भाष्य)
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय दर्शन एवं आध्यात्मिक चिंतन का एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। प्रस्तुत ‘श्रीमद्भगवद्गीता भाष्यम्’ वैदिक मन्तव्य के अनुसार गीता के श्लोकों को सरल, सुबोध एवं स्पष्ट रूप में समझने का अवसर प्रदान करता है। इसका उद्देश्य पाठकों को गीता के मूल भाव, उसके दार्शनिक विचारों तथा जीवनोपयोगी शिक्षाओं से परिचित कराना है।
यह ग्रंथ उन पाठकों के लिए विशेष उपयोगी है, जो श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन वैदिक दृष्टिकोण से करना चाहते हैं और उसके उपदेशों को तर्कपूर्ण ढंग से समझकर अपने जीवन में अपनाना चाहते हैं। इसके माध्यम से कर्तव्यपालन, आत्मचिंतन, ज्ञान, कर्म तथा नैतिक जीवन से संबंधित विचारों का अध्ययन किया जा सकता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- वैदिक मन्तव्य के अनुरूप गीता की व्याख्या।
- सरल एवं सुबोध भाषा में विषय को समझने में सहायक।
- गीता के दार्शनिक एवं जीवनोपयोगी विचारों के अध्ययन के लिए उपयोगी।
- विद्यार्थियों, अध्येताओं, जिज्ञासुओं तथा भारतीय दर्शन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए उपयुक्त।
यदि आप श्रीमद्भगवद्गीता को वैदिक दृष्टिकोण से समझना चाहते हैं, तो यह भाष्य आपके अध्ययन के लिए एक उपयोगी पुस्तक है।
ग्रन्थ की विशेषता
संस्कृत में तो गीता के अनेक भाष्य शङ्कराचार्यादि ने बनाये ही थे, किन्तु फारसी, अंग्रेजी, बंगला, मराठी, गुजराती आदि संसार भर की बड़ी-बड़ी भाषाओं में भी इसके अनुवाद हुए हैं। आर्यभाषा में भी अनेक टीका, भाष्य, अनुवाद बने और छपे हैं।
पण्डित तुलसीराम स्वामी (सामवेद-भाष्यकार)
मैंने इस भाष्य की आवश्यकता इस कारण विशेष समझी कि अद्वैत-वादियों ने मतवाद से और पौराणिक अवतारवाद की छाया से इसके प्रकाश को आच्छादित कर दिया था। यह भाष्य वैदिकमार्गानुसार श्री कृष्णचन्द्र के यथार्थ अभिप्राय को स्पष्ट करके किया गया है।
प्रथम मूल, फिर शब्दार्थ, और कहीं-कहीं कुछ विशेष संक्षेप से लिखा गया है। जिस अर्थ में वा अभिप्राय में विशेष वक्तव्य था, उस पर ‘चिह्न कर दिया है। और १८ अध्यायों के अन्त में अध्याय और श्लोक की संख्या देकर विशेष व्याख्यान द्वारा स्पष्टीकरण और शङ्का-समाधान पृथक् किया गया है। इससे पाठकों को अपूर्व लाभहोगा।
– पण्डित तुलसीराम स्वामी












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