षड्दर्शनमञ्जूषा (भारतीय दर्शन परम्परा का सम्यक् अध्ययन) | Shaddarshanmanjusha
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- Author: Dr. Abhishek Pargai, Dr. Kanchan Tiwari
- Language: Sanskrit
- Publication: Parv Prakashan, Haridwar
- Pages: 121
- Edition: 2026
- Cover: Paperback
- ISBN: 9788197265051
- Weight: 135 Gms.
भारतीय दर्शनपरम्परा विश्व की दार्शनिक धरोहरों में अद्वितीय स्थान रखती है। इस पुस्तक में भारत के छह आस्तिक दर्शनों – न्याय, वैशेषक, साङ्ख्य, योग, पूर्वमीमांसा व वेदान्त का समग्रमूल अध्ययन प्रस्तुत करते हुए प्रत्येक दर्शन की मूलप्रकृति का सुव्यवस्थित सङ्कलन किया गया है।
यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधार्थियों, परीक्षार्थियों तथा भारतीय दर्शन के गम्भीर अध्येताओं के लिए समान रूप से उपयोगी है। कालानुगुण सुसङ्गतप्रस्तुति इसे अध्ययन व मनन का उत्कृष्टसाधन बनाती है।
प्रकाशकीय
भारतीय ज्ञान-परम्परा विश्व की प्राचीनतम और समृद्धतम बौद्धिक परम्पराओं में से एक है। इस परम्परा की विशिष्टता केवल इसकी प्राचीनता में नहीं, बल्कि इसकी व्यापकता, तार्किकता, तत्त्वचिन्तन और जीवन-दृष्टि में निहित है। भारतीय मनीषियों ने जीवन, जगत्, आत्मा, ईश्वर, ज्ञान, कर्म, दुःख, मोक्ष तथा सत्य की प्रकृति से सम्बन्धित प्रश्नों पर अत्यन्त सूक्ष्म और गम्भीर चिन्तन किया। इसी दीर्घ दार्शनिक परम्परा में षड्दर्शन का विशेष स्थान है। न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा और वेदान्त इन छह आस्तिक दर्शनों ने भारतीय चिन्तन को विविध आयाम प्रदान किए हैं।
प्रस्तुत ग्रन्थ ‘षड्दर्शनमञ्जूषा’ इसी समृद्ध दार्शनिक परम्परा के मूल ग्रन्थों के अध्ययन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। ग्रन्थ में तर्कसङ्ग्रह, तर्कभाषा, साङ्ख्यकारिका, योगसूत्र, अर्थसङ्ग्रह तथा वेदान्तसार जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों को सम्मिलित किया गया है। इन ग्रन्थों के माध्यम से न्याय-वैशेषिक की तार्किक एवं पदार्थमीमांसात्मक दृष्टि, सांख्य का पुरुष-प्रकृति विवेक, योग की साधना एवं चित्तवृत्तिनिरोध की अवधारणा, पूर्वमीमांसा की कर्म एवं विधिविचार-प्रधान परम्परा तथा वेदान्त की ब्रह्मविद्या एवं मोक्ष-दृष्टि को समझने का अवसर प्राप्त होता है।
इस पुस्तक की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें विषय को मूल ग्रन्थों के आधार पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। भारतीय दर्शन के अध्ययन में मूल ग्रन्थों का विशेष महत्त्व है, क्योंकि इनके माध्यम से विद्यार्थी केवल दार्शनिक सिद्धान्तों का सामान्य परिचय ही प्राप्त नहीं करता, बल्कि उस चिन्तन-परम्परा की मूल वैचारिक संरचना से भी परिचित होता है। इसी दृष्टि से ‘षड्दर्शनमञ्जूषा’ विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा भारतीय दर्शन के गम्भीर अध्येताओं के लिए उपयोगी संकलन के रूप में प्रस्तुत की जा रही है।
‘मञ्जूषा’ शब्द अपने भीतर संग्रह और संरक्षण का भाव समेटे हुए है। इसी भाव के अनुरूप यह पुस्तक भारतीय दर्शन की विविध धाराओं से सम्बद्ध महत्त्वपूर्ण मूलपाठों को एक स्थान पर प्रस्तुत करती है। यहाँ छह दार्शनिक परम्पराओं का अध्ययन उनके प्रमुख ग्रन्थों के माध्यम से किया जा सकता है। इससे पाठक को भारतीय दर्शन की अन्तर्वस्तु, उसकी तार्किक पद्धति तथा उसके साध्य की तुलनात्मक समझ विकसित करने में सहायता मिलेगी।
हमें विश्वास है कि ‘षड्दर्शनमञ्जूषा’ विद्यार्थियों के अध्ययन और परीक्षा-तैयारी हेतु एक विश्वसनीय संकलन सिद्ध होगी। साथ ही, यह पुस्तक उन अध्येताओं के लिए भी उपयोगी होगी जो भारतीय दर्शन की मूल स्रोत-परम्परा से परिचित होकर उसके व्यापक बौद्धिक संसार को समझना चाहते हैं। मूलपाठ के प्रति निष्ठा, विषय की प्रामाणिकता और अध्ययन की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए यह कृति पाठकों के समक्ष सादर प्रस्तुत है।
भारतीय दर्शन केवल अतीत की बौद्धिक विरासत नहीं, बल्कि आज भी मनुष्य और समाज के समक्ष उपस्थित अनेक मूलभूत प्रश्नों पर विचार करने की सशक्त दृष्टि प्रदान करता है। आशा है कि ‘षड्दर्शनमञ्जूषा’ ज्ञान, तर्क, आत्मचिन्तन और दार्शनिक जिज्ञासा की उस परम्परा से विद्यार्थियों और अध्येताओं का सार्थक परिचय कराएगी तथा भारतीय ज्ञान-विरासत के अध्ययन को और अधिक सुदृढ़ बनाएगी।
Rameshwar –
इस पुस्तक के माध्यम से दर्शन शास्त्र के छहों प्रकरण ग्रन्थों को एक स्थान पर प्राप्त कर सकते हैं।
Dr.Girish chandra bahuguna –
बहुत बेहतरीन
ऐसी पुस्तक को बहुत दिनों से ढूंढ रहा था
धन्यवाद आचार्य जी
Pawan Joshi –
अति साधु
Pawan Joshi –
अति सुन्दर
Saurabh Suman –
दर्शन के मूलपाठ का सम्यक् संयोजन
Hariswaranand –
इतने से मूल्य में इतना अमूल्य कार्य वास्तव में विद्यार्थियों के लिए आह्लालक है।