सत्यासत्य निर्णय Satyasatya Nirnay
₹25.00
- Author: Rajendra 'Jigyasu', Lala Jagannathdas
- Language: Hindi
- Publication: Vedic Pustakalaya Ajmer
- Pages: 31
- Edition: 2014
- Cover: Paperback
- Weight: 45 Gms.
प्रकाशकीय
शाहपुरा भीलवाडा का छोटा सा राज्य था, परन्तु सम्पूर्ण रूप से आर्य राज्य था। शाहपुरा के विद्यालयों में ऋषिकृत ग्रन्थों की शिक्षा दी जाती थी। आर्योद्देश्यरत्नमाला, महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र, व्यवहारभानु कक्षा ४ में लगाई गई थी व इन्हें पढ़ाने के लिए ‘पं. भगवानस्वरूप जी न्यायभूषण’ की नियुक्ति की गई थी। कक्षा ५ व ६ में परसादीलाल जी सत्यार्थप्रकाश पढ़ाते थे।
सत्यासत्य निर्णय नामक पुस्तक जगन्नाथ दास ने आर्यसमाज से निकाले जाने से पूर्व लिखी थी। यह पुस्तक शाहपुराधीश सर नाहर सिंह जी के हाथ लगी तो उन्होंने इस पुस्तक की उपयोगिता को देखकर सन् १९२९ में इसे प्रकाशित किया एवं शाहपुरा राज्य के विद्यालयों में कक्षा ३ में पढ़ाने हेतु भी लगा दिया।
परोपकारिणी सभा प्रतिवर्ष धर्मप्रेमी जनता को छोटी-बड़ी, नई-नई पुस्तकें भेंट करती रहती है। ‘सत्यासत्य निर्णय’ नामक छोटी सी पुस्तक पाठकों तक पहुँचाते हुए हमें विशेष प्रसन्नता हो रही है। इस पुस्तिका के रचयिता लाला जगन्नाथ मुरादाबादी ने इसे पद्म में लिखा। इसमें अन्धविश्वासों का खण्डन तथा मुख्य मुख्य वैदिक सिद्धान्तों का मण्डन किया गया था। यह उस समय की माँग थी और इसकी आज भी उपयोगिता है।
मुंशी इन्द्रमणि और उनके शिष्य लाला जगन्नाथदास जो आर्यसमाज मुरादाबाद के प्रधान एवं पुस्तकाध्यक्ष थे, उन्होंने लोभ लालच में फंसकर हिसाब नहीं दिया व स्वामी दयानन्द एवं मेरठ के रईस रामशरणदास जी का विरोध करने लगे तो उन दोनों गुरु-चेलों को २९ मई सन् १८८३ को आर्यसमाज से निकाल दिया गया। जगन्नाथदास ने अपने गुरु को इतना बहका दिया व लालच में फंसा दिया कि वह सही रास्ते पर नहीं आए।
लाला जगन्नाथ थोड़ा समय ही आर्यसमाज में रहे। इन्होंने मुंशी इन्द्रमणि जी को बहकाया-भ्रमित किया। धन लोलुपता के कारण ऋषि दयानन्द व लाला रामशरण दास के उपकारों को भुलाकर ऋषिद्रोही बनकर आर्यसमाज तथा ऋषि की निन्दा में वही वही बातें घुमा-फिरा ,कर लिखते रहे। यह पुस्तिका न जाने लाला जी ने कहाँ छिपा ली। श्री सोहनलाल जी शारदा शाहपुरा ने इसका इतिहास की दृष्टि से महत्त्व जानकर एक प्रति सभा को प्रचारार्थ भेंट कर दी।
इसके बारे में अपने सम्पादकीय में जिज्ञासु जी ने बहुत कुछ लिख दिया है। इसे भी ऋषि जीवन का पूरक मानकर पाठक पढ़ेंगे तो ऋषि की निन्दा करने वालों का मुँह बन्द करने में सहायता मिलेगी। ऐतिहासिक दृष्टि से इसके महत्त्व को देखते हुए सभा ने इसे पुनः प्रकाशित कराया है। आशा है पाठक इससे लाभ उठायेंगे।
ओममुनि, मन्त्री, परोपकारिणी सभा, अजमेर
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