🎉 Free shipping on orders above ₹1500. 🎉
प्रस्तावना
वेद के शब्दों में भक्त प्रार्थना करता है।
मा प्र गाम पथो वयम्। ऋ० १०।५७।१
हम पथ से विचलित न हों, मार्ग से भटकें नहीं।
वह मार्ग कौन-सा है। वह मार्ग है- वैदिक पथ। वेद परमात्मा का दिव्य ज्ञान है। इसमें मनुष्य के सभी कर्त्तव्य कर्मों का विशद विवेचन है। हम इधर-उधर न भटक कर वैदिक पथ पर ही चलें। यही कल्याण का मार्ग है। यही इहलौकिक और पारलौकिक, अभ्युदय और निश्रेयस की प्राप्ति का मार्ग है। जो वैदिक पथ का अनुसरण करेगा, वह न ठोकर खा सकता है, न भटककर मार्गभ्रष्ट हो सकता है।
सन्मार्गदर्शन में इसी वैदिक पथ की मनोहारी व्याख्या है। वीतराग
स्वामी सर्वदानन्दजी महाराज ने सूत्र-शैली को अपनाते हुए मानव-जीवन के सभी बिन्दुओं पर प्रकाश डाला है। सर्वप्रथम परमपिता परमात्मा के सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम और निज नाम ओम् की व्याख्या है। तत्पश्चात् अन्य विषयों पर सुन्दर विवेचन है।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- जीवन के चार फलों का- मनुष्य के परमपुरुषार्थ का, उसके उपायों का रोचक वर्णन है। मुक्ति के साधन के रूप में पञ्चकोशों की व्याख्या है।
वर्ण और आश्रम धर्मों का विवेचन है। इसी प्रसङ्ग में पञ्च महायज्ञों का वर्णन है। इन वर्णनों के साथ परिवार, समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए स्थान-स्थान पर सुझाव दिये गये हैं। प्रसङ्गवश अवैदिक मतों का तर्कपूर्ण खण्डन करके वैदिक मन्तव्यों की स्थापना की है।
सारा ही ग्रन्थ अत्युत्तम है। सभी विषय महत्त्वपूर्ण हैं, परन्तु ‘सरलगतिः’ तो इसका मुकुटमणि है। साधारण-से-साधारण व्यक्ति भी इसे समझकर इससे लाभ उठा सकता है। सभी दृष्टान्त अत्यन्त रोचक और शिक्षाप्रद हैं।
स्वामीजी महाराज की भाषा तो अनूठी है। स्वामीजी महाराज भाषा के शिल्पी प्रतीत होते हैं। गद्य होने पर भी भाषा काव्यमयी है। भाषा में गति है, लय है, तुक है। अनुप्रास की छटा तो देखते ही बनती है।
स्वामीजी महाराज की यह कृति बहुत समय से उपलब्ध नहीं थी। हितकारी प्रकाशन समिति हिण्डौन ने इस ग्रन्थ को छपवाकर सराहनीय कार्य किया है।
विदुषामनुचरः
– जगदीश्वरानन्द
प्रकाशकीय
“वेद एक परमात्मा की पूजा करना सिखाता है और वही एक मनुष्यमात्र का उपास्य देव है, यही सन्मार्ग है, इसका ही सहारा लेने में कल्याण है।”
शरीरगति प्रकरण के प्रारम्भ में लिखी गई यह पंक्तियाँ बहुत अर्थपूर्ण व महत्त्वपूर्ण हैं। मनुष्य का एकमेव व अन्तिम लक्ष्य एक ही परमात्मा की प्राप्ति है और सब कुछ तो साधनमात्र या व्यवधान हैं। व्यक्ति प्रायः इन्हें साध्य समझकर और बनाकर जन्म-जन्मान्तरों तक कष्ट पाता और भोगता है। इस परमात्मा प्राप्ति के सन्मार्ग का दर्शन इस ग्रन्थरत्न के नामगति, अर्थगति, शरीरगति, जीवगति, संसारगति, सामान्यगति, सरलगति और मान्यगति अध्यायों में करवाया गया है।
वीतराग महात्मा स्वामी श्री सर्वदानन्दजी सरस्वती का जीवन स्वयम् में प्रेरणादायक रहा। वह मान-अपमान से पृथक् घण्टों की समाधि लगाते और जनकल्याण के लिए अपने अनुभवों का लाभ प्रवचनों द्वारा सभी को प्रदान करते थे। ऐसे परोपकारी सन्त ने इस पुस्तक की भूमिका में दुःखपूर्ण लेकिन सटीक लिखा है-हमारे पास सृष्टि का आदिज्ञान जो शाश्वत व सर्व-हिताय है, इसके होते हुए भी प्रमाद और अध्ययनवृत्ति के समाप्त होने से, उत्थान के स्थान पर सभी दृष्टियों से पतनोन्मुखी होते गये।
हम आशा करते हैं कि हमारे पाठक इस सहज प्राप्त ज्ञान का सम्पूर्ण लाभ उठाकर अपने जीवन का साध्य प्राप्त करने की ओर अग्रसर होंगे।
इस पुस्तक के यथासम्भव शुद्ध प्रकाशन में हमारे आदरास्पद् पूज्य स्वामी श्री जगदीश्वरानन्दजी सरस्वती ने जो आत्मना सहयोग प्रदान किया है वह हमारे लिए उनका अपना उत्साह-वर्धक स्नेह है जो इस दिशा में हमें गति प्रदान करता है। आप सभी की स्नेह कामना सहित।

Reviews
There are no reviews yet.