ऋषि के पुण्य संस्मरण Rishi Ke Punya Sansmaran
₹100.00
- Author: Atrauli, Dr. Vivek Arya, Pandit Rajendra Ji
- Language: Hindi
- Publication: Bharatiya Hindu Shuddhi Sabha
- Pages: 93
- Edition: 2026
- Cover: Paperback
- ISBN: 9789334202359
- Weight: 130 Gms.
वैदिक साहित्य और परम्परा के गहन अध्ययन और अनुशीलन के बिना ऋषि दयानन्द की महत्ता का वास्तविक मूल्यांकन कठिन है, यही कारण है कि आज का पुरुष उन्हें समझने में अशक्त है। संसार तो क्या, इस देश के विद्वान् मनीषी भी उनको भली-भाँति नहीं समझ पाये। प्रायः वे ऋषि दयानन्द को एक हिन्दू समाज सुधारक ही समझते हैं। जनसाधारण और साम्प्रदायिक लोग तो उन्हें अपना विरोधी ही समझ बैठे हैं।
ऐतिहासिक काल, जिसकी गणना प्रायः बौद्धकाल के समीप से की जाती है, के किसी सन्त महात्मा से, चाहे उसे उसके अनुयायियों ने ईश्वर अथवा ईश्वरावतार के पद पर ही क्यों न आसीन कर दिया हो, स्वामी दयानन्द की तुलना करना इसलिए उचित नहीं क्योंकि वे महापुरुष वैदिक ज्ञान और परम्पराओं से बहुअशों में अनभिज्ञ थे। महात्मा बुद्ध ने जहाँ एक ओर वेदों की उपेक्षा की वहाँ अन्य साम्प्रदायिक आचार्यों ने वेदों के नाम पर अनेक वेद विरोधी मतमतांतर खड़े कर दिये, जिसके दुष्परिणाम स्वरूप हम आज के भारत को अनेकानेक सम्प्रदायों में विभक्त देख रहे हैं।
यदि हम महाभारत की ओर जाएँ तो उसमें भी प्राचीन वैदिक ऋषियों और ब्राह्मणों की सर्वत्र उपेक्षा ही दीख पड़ती है। उनका स्थान, चाहे कारण कुछ भी हों, क्षत्रिय राजनीतिज्ञ ले चुके थे। वेदव्यास, कृष्ण, भीष्म पितामह, धर्मराज युधिष्ठिर आदि सभी क्षत्रिय थे। द्रोण और कृपाचार्य जैसे ब्राह्मणों का स्थान एक सैनिक योद्धा से अधिक कुछ नहीं था। यही भावना उत्तरोत्तर बौद्ध और पौराणिक काल में और भी बलवती हो गई।
बुद्ध और महावीर स्वामी का किसी ब्राह्मण के यहाँ जन्म धारण करना अनुचित समझा गया। पौराणिक काल के सोलहकला पूर्ण, पूर्णावतार राम और और कृष्ण दोनों ही क्षत्रिय वंशज हैं। यहाँ मैं ब्राह्मण-क्षत्रिय शब्द का प्रयोग जन्मगत वर्ण के आधार पर न करके कर्मानुसार ही कर रहा हूँ। क्योंकि उपर्युक्त सभी महापुरुषों ने अपने को क्षत्रिय ही माना है। पुराणों में प्राचीन ऋषि-मुनियों पर कोई न कोई लांछन लगाकर उन्हें अपमानित करने की अनेक साक्षियाँ भी हमारी इस धारणा को परिपुष्टि करती हैं। अतएव दयानन्द की तुलनात्मक विवेचना के लिये हमें महाभारतकाल से भी पूर्व जाना पड़ेगा।
कुछ लोगों की यह भावना है कि महापुरुषों का तुलनात्मक विवेचन उचित नहीं है। परन्तु कभी-कभी ऐतिहासिक तथ्य निरूपण के लिए यह आवश्यक और अनिवार्य हो जाता है। वैसे भी यह धारणा भावुकता पर ही आधारित प्रतीत होती है, इसका बौद्धिक कोई आधार नहीं जान पड़ता। साम्प्रदायिक मतवादियों ने तो न केवल शिष्ट तुलनात्मक विवेचन अपितु एक दूसरों के आचार्यों तथा उनके उपास्य देवों तक की बड़ी भर्त्सना की है और उनके लिए अपशब्दों तक का प्रयोग किया है।
इस दृष्टि से ऋषि दयानन्द केवल प्राचीन वैदिक कालीन ऋषियों की श्रेणी में रखे जाने के अधिकारी हैं। उनका गहन वेदाध्ययन, धर्म-शास्त्रों का विस्तृत अनुशीलन, अखण्ड ब्रह्मचर्य, त्याग और तपस्यामय निर्भीक जीवन, अनुपम तर्क-शैली के साथ योगाभ्यास तथा सांसारिक भोगों में अलिप्तता एवं पूर्ण बुद्धिवादिता ऐसी अनेक विशेषतायें हैं जो उन्हें युग-युगान्तर के महापुरुषों से बहुत ऊँचा ले जाती हैं। पाठक, मेरी उपर्युक्त धारणा का विस्तृत अध्ययन ऋषि दयानन्द के इन संस्मरणों में करेंगे।
देश का दुर्भाग्य है कि हमने ऋषि दयानन्द को अभी तक नहीं समझा और उन्हें केवल दूर से देखने का प्रयत्न किया है। यूरोप के प्रसिद्ध फ्रेंच विचारक तथा साहित्यिक सन्त रोमाँरोला के शब्दों में यह उपेक्षा न केवल योरुप वरन् इस देश के निवासियों के लिए भी बहुत मँहगा सौदा होगा। वह लिखते हैं-
‘This man (Dayanand) with the nature of a lion is one of those whom Europe is too apt to forget when She Judges India but whom She will probably be forced to remember to her cost, for he was that rare combination, a thinker of action with a genious for leadership.”
अर्थात् – सिंह समान निर्भीक प्रकृति वाला यह महापुरुष उन व्यक्तियों में था जिन्हें भारत का मूल्याङ्कन करते समय यूरोप भुलाने की चेष्टा करता हुआ भी भुला न सकेगा, क्योंकि ऐसा करना उसके (यूरोप) के लिए मँहगा सौदा सिद्ध होगा। इस महान् पुरुष दयानन्द में विचार, कर्म और नेतृत्व की प्रतिभा का अनुपम सम्मिश्रण था।
श्री रोमाँरोला ने ऋषि दयानन्द के प्रति यूरोपवासियों की जिस उपेक्षा वृत्ति का यहाँ उल्लेख किया है वही प्रवृत्ति इस देशवासियों में भी कम नहीं है, जिसका भारी मूल्य न केवल हमें चुकाना पड़ेगा अपितु हम चुका रहे हैं। यदि हम अब भी सजग न हुए तो हमें उसके लिए इससे भी कहीं भारी मूल्य चुकाना पड़ेगा।
ऋषि दयानन्द ने अपने सोलह वर्ष के अल्प प्रचार-काल में जिस अथक परिश्रम द्वारा मौखिक एवं लेख-बद्ध प्रचार कार्य किया वह इस युग पुरुष की न केवल भारत अपितु संसार के लिए एक अनुपम देन है, जिसे हम अन्यत्र नहीं देख पाते ! समय आयेगा जब उसका उचित मूल्यांकन, आज नहीं तो कल, संसार के लोग करेंगे।
इस पुस्तक में संग्रहीत संस्मरणों की सामग्री का सङ्कलन स्वर्गीय हुतात्मा पं० लेखराम तथा पं० देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, जिन्होंने अपना समस्त जीवन ऋषि दयानन्द की जीवन घटनाओं के संग्रह में लगा दिया, उनके रचित ग्रन्थों से किया गया है। केवल 2-4 संस्मरण ऐसे हैं जो अन्यत्र से लिए गये हैं। पं० लेखरामजी ने ऋषि की जीवन-घटनाओं का संग्रह स्थान-स्थान पर घूमकर ऋषि निर्वाण के 4-5 वर्ष के पश्चात् यथासम्भव उन सभी लोगों से जिन्होंने ऋषि दयानन्द के दर्शन किये थे अथवा उनके सम्पर्क में आये थे, किया था।
अतएव उनकी असंदिग्ध प्रामाणिकता में विश्वास न करने का कोई कारण नहीं है। फिर उन जैसे आर्य समाज के बुद्धिवादी नेता से किसी प्रकार अत्युक्ति की आशा भी लेशमात्र नहीं की जा सकती। ऋषि दयानन्द के जन्म स्थान एवं उनके वंशजों का ठीक-ठीक पता खोज निकालने का श्रेय पं० देवेन्द्रनाथ जी को है, जिन्होंने आर्यसमाज का सभासद न होते हुए बिना किसी बाह्य आर्थिक सहायता के केवल ऋषि-भक्ति से प्रेरित होकर इस दुस्तर कार्य को सम्पन्न किया। मैं इन दोनों ही महानुभावों का उनकी कृतियों से सहायता लेने के लिये आभारी हूँ।
– राजेन्द्र
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