प्राचीन भारत में रसायन का विकास Prachin Bharat me Rasayan ka Vikas
₹695.00
- Author: Swami Satyaprakash Sarswati
- Language: Hindi
- Pages: 860
- Edition: 2018
- Cover: Hard Cover
- ISBN: 8185134065
- Weight: 1054 Gms.
प्राचीन भारत में रसायन का विकास
वेद के आविर्भाव के अनन्तर ही प्राचीन भारतीय आर्यों ने अनेक दृष्टिकोणों से सृष्टि को समझने का प्रयास किया, और उन्होंने इस प्रसंग में वेदांगों की रचना की। इन 6 बेदांगो में एक वेदांग कल्प है। इस कल्प के अन्तर्गत ही रसायन शास्त्र माना जा सकता है। भारतीय रसायन शास्त्र की परम्परा वैदिक संहिताओं की श्रुतियों से अनुप्रभावित है। प्रस्तुत ग्रन्थ –“प्राचीन भारत में रसायन का विकास” इस विषय का सांगोपांग अन्यन्त प्रामाणिक ग्रन्थ है।
वैदिक ऋचाओं से लेकर चरक और सुश्रुत कालीन विशुद्ध आयुर्वेदिक परम्पराओं तक की रसायन सामग्री का संकलन इसमें है, और बाद के तंत्र साहित्य का भी। नागार्जुन को साधारणतया भारतीय रसायन का जन्मदाता माना जाता है और उससे प्रेरित होकर अनेक तन्त्राचार्यों ने पारद, अनक, माक्षिक (रसों और उपरसों) पर कार्य किया।
रसायन शास्त्र का एक सैद्धान्तिक और दार्शनिक पक्ष भी रहा है- जिस उपादान से सृष्टि का रचना हुई है, उसको समझना, और भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तनों का नियमित रूप से अध्ययन करना। कारण-कार्य का संबंध, परमाणुवाद का विकास, सत्कार्यवाद, असत् कार्य-वाद, पीलूपाक- पिठरपाक वाद – इन सबका यथार्थ विवेचन इस ग्रन्थ में है। रसायन शास्त्र के विकास की प्रचुर सामग्री लघु गृह उद्योगों से प्राप्त होती है।
हमारे प्राचीन भग्नावशेष और संग्रहालयों में संकलित सामग्री इस परम्परा की पुष्टि करती है। अनेक दशक व्यतीत हो गये जब आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय ने इस विषय पर “हिन्दु केमिस्ट्री” नाम से एक ग्रन्थ अंग्रेजी में लिखा था, पर आज सबसे प्रामाणिक और बृहद् ग्रन्थ “प्राचीन भारत में रसायन का विकास” ही है, जिसका पुनर्मुद्रण वर्तमान भव्य रूप में किया जा रहा है।
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