ओ३म्
न्यायदर्शनम् (आनन्द – भाष्य – सहितम्)
भूमिका
न्यायदर्शन के रचयिता का गोत्रनाम ‘गौतम’ तथा सांस्कारिक नाम मेधातिथि माना जाता है। इस ग्रन्थ में पाँच अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में दो दो आह्निक अर्थात् दस आह्निक हैं। आचार्य श्री उदयवीर जी के अनुसार इसके सूत्रों की कुल संख्या ५३० है। किन्तु न्यायचार्य श्री वाचस्पति मिश्र की ‘न्यायसूची’ के अनुसार इस शास्त्र में ५ अध्याय, १० आह्निक, ८४ प्रकरण, ५२८ सूत्र १९६६ पद और ८३८५ अक्षर हैं।
न्याय शब्द का अर्थ :-
न्याय शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में होता है, परन्तु दार्शनिक साहित्य में ‘न्याय’ शब्द का अर्थ है नियमेन ईयते प्राप्यते विवक्षितार्थसिद्धिरनेन इति न्यायः । (नि + इण् गती + घञ् (अध्यायन्यायो अष्टा. ३/३/१२२) गतेस्त्रयोऽर्था ज्ञानं गमनं प्राप्तिश्चेति – प्राप्तयर्थकाद् घञ्) अर्थात् जिसके द्वारा किसी प्रतिपाद्य विषय की सिद्धि की जा सके और जिसके किसी निश्चित सिद्धान्त पर पहुँचा जा सके, उसका नाम ‘न्याय’ है।
इसी अर्थ को न्याय दर्शन के भाष्यकार ‘वात्स्यायन’ ने भी कहा है -‘प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः’ अर्थात् प्रमाणों के द्वारा अर्थ की परीक्षा करना न्याय है। (- न्या. भा. १/१/१) ।
ऐसा शास्त्र जिसमें प्रमाणों द्वारा पदार्थविद्या का विवेचन होता है, वह ‘आन्वीक्षि-की विद्या के अन्तर्गत माना जाता है।
न्याय – वैशेषिक के लिए ‘योग’ शब्द का प्रयोग भी हुआ है, जो कि ‘युजिर् योगे’ धातु से घञ् प्रत्यय होकर सम्पन्न होता है, क्योंकि ये दोनों शास्त्र परमाणुओं के योग (मेल) से सृष्टि – प्रक्रिया को मानते हैं। आजकल इस पद का प्रयोग नहीं होता । किन्तु पातञ्जल दर्शन के ‘योग’ पद की उत्पत्ति ‘युज समाधी’ धातु से होता है।
न्यायदर्शन का प्रयोजन :-
यद्यपि सूत्रकार ने प्रथम सूत्र में इस शास्त्र का प्रयोजन ‘निःश्रेयस’ (= मोक्ष) बताया है, परन्तु शास्त्र के परिशीलन से हम इस शास्त्र के लक्ष्य को चार भागों में बांट सकते हैं :-
१. सामान्य ज्ञान की समस्या को हल करना ।
२. जगत् की पहेली को सुलझाना ।
३. जीवात्मा तथा मुक्ति का ज्ञान ।
४. परमात्मा और उसका ज्ञान ।
इन सब समस्याओं के समाधान के लिए न्यायदर्शन में प्रमाण आदि सोलह पदार्थ माने हैं।
न्यायदर्शन की अन्य विशेषताएँ :-
१. वैशेषक के समान यह शास्त्र भी पदार्थों का तीन स्तरों में वर्णन करता है – उद्देश, लक्षण और परीक्षा । केवल नाम लेकर पदार्थ का निर्देश कर देना ‘उद्देश’ है। उद्दिष्ट पदार्थ को अन्य पदार्थों से भिन्न रूप में स्पष्ट कर देने वाला धर्म ‘लक्षण’ कहाता है। उद्दिष्ट पदार्थ का जो लक्षण किया गया है, वह उस पदार्थ के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करता है या नहीं ? इसका प्रमाणों के द्वारा निश्चय करना ‘परीक्षा’ है।
२. विद्ययाऽमृतमश्नुते. (यजु. ४०/१४) इस वेदमन्त्र के अनुसार मोक्ष-प्राप्ति का यह क्रम रखा गया है, कि पदार्थों के तत्त्वज्ञान से मिथ्याज्ञान की निवृत्ति होने पर क्रमश, राग – द्वेष – मोह आदि दोषों की निवृत्ति, अशुभ कर्मों में प्रवृत्ति का न होना, तत्पश्चात् जन्मादि दुःखों की निवृत्ति से मोक्ष होता है।
३. संशयास्पद विषयों में निर्णय करने का प्रकार, ‘वाद’ की पञ्चावयवादि रूप पद्धति तथा बाद में होने वाले हेत्वाभास, जल्प, वितण्डा आदि दोषों का परिहार भी समझाया है। अतः संशय, मिथ्याज्ञान आदि की निवृत्ति न्यायदर्शन की शैली से सरल हो जाती है।
४. जो वेदादि शास्त्रों तथा ईश्वर को नहीं मानते, उनके साथ वाद करना तथा उनको पराजित करने की पञ्चावयवरूप परार्थानुमान की विशेष पद्धति का भी स्पष्ट उल्लेख है।
५. इस दर्शन में परमेश्वर को सृष्टिकर्ता, निराकार, सर्वव्यापक, जीवात्मा को शरीरादि से भिन्न, परिच्छिन्न तथा प्रकृति को अचेतन एवं सृष्टि का उपादान कारण मानकर स्पष्टरूप से त्रैतवाद का वर्णन किया गया है।
६. न्यायदर्शन प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द-इन चार प्रमाणों को ही मानता है, अन्य ऐतिह्य आदि का इन्हीं में समावेश मानता है ।
७. इस दर्शन पर महर्षि वात्स्यायन का प्रामाणिक भाष्य उपलब्ध होता है।
एक भ्रान्ति का निराकरण :-
इस शास्त्र में परीक्षा के अवसर पर मस्तिष्क में उठने वाले कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण प्रसङ्गों की चर्चा है, जिनका प्रथम उद्देश सूत्र में कथन नहीं है, किन्तु साधारण सिद्धान्त के स्पष्टीकरण की भावना से विवेचन किया गया है।
अतः उनके विषय में यह धारणा बनाना अनुचित है, कि बौद्धादि ग्रन्थों में वर्णित
सिद्धान्तों और युक्तियों को अर्धचन्द्र देने के लिए यह शास्त्र उन ग्रन्थों के पश्चात् रचा गया है। जैसे –
१. अवयवी का स्वरूप (२/१/३०-३६, ४/२/३-३७)
२. अभावकारणवाद ४/१/१४ १८
३. ईश्वरकारणवाद – ४/१/१९ – २१
४. अनिमित्तवाद – ४/१/२२ – २४
५. सर्वानित्यत्ववाद – ४/१/२५ – २८
६. सर्वनित्यत्ववाद – ४/१/२९ – ३३
७. सर्वपृथक्त्ववाद – ४/१/३४ – ३६
८. सर्वाभाव (= शून्य) वाद – ४/१/३७-४०
९. संख्यैकान्तवाद ४/१/४१-४६
इत्यादि ।
इसीलिए न्यायविद्या के सम्बन्ध में भाष्यकार वात्स्यायन ने कहा है –
प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तिता ।। न्या. भा. १/१/१
अर्थात् (प्रमाण आदि विभागों में वर्णित यह आन्वीक्षिकी न्यायविद्या) सब प्रकार के ज्ञानों को प्रकाश में लाने के लिए दीपक के समान है, सभी लौकिक वैदिक कर्मों की उपकारिका (= सहायिका) है, सब धर्मों का आश्रय है। (इस विद्या का यह संक्षिप्त स्वरूप कौटिल्य अर्थशास्त्र के) विद्योद्देश में वर्णित है ।।
– आचार्य आनन्दप्रकाश
आर्ष – शोध संस्थान, अलियाबाद (तेलंगाना)

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