नितिशतकम् (डॉ. राकेश शास्त्री) NItishatkam – by Dr. Rakesh Shastri
₹95.00
- Author: Dr. Rakesh Shastri
- Language: Hindi, Sanskrit-Hindi
- Pages: 170
- Edition: 2022
- Cover: Paperback
- ISBN: 9788171101320
- Weight: 225 Gms.
दो शब्द
नीतिशतकम् की प्रस्तुत पुस्तक को देखकर यह उत्सुकता स्वाभाविक है कि इतनी व्याख्याएँ होने पर एक और व्याख्या क्यों? इस विषय में मेरा विनम्र निवेदन है कि हमारे विद्यार्थियों की एक जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से रहती है कि किसी श्लोक की हिन्दी व्याख्या किस प्रकार की जाए, क्योंकि उपलब्ध नीतिशतकम् की व्याख्याओं से उनकी इस जिज्ञासा की निवृत्ति नहीं होती। इसी बात को ध्यान में रखते हुए यह व्याख्या लिखने का विनम्र प्रयास किया गया है।
यह व्याख्या मेरे पिछले लगभग १५ वर्षों के अध्यापन अनुभव का परिणाम है। इस विषय में मेरा प्रयत्न रहा है कि यह पुस्तक विद्यार्थियों के लिए साक्षात् अध्यापक के समान मार्गदर्शन करे, क्योंकि इसमें अत्यन्त सरल बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है। कठिन और संस्कृतनिष्ठ शब्दों से प्रायः बचने का ही प्रयास रहा है।
मूल श्लोकों के बाद अन्वय, शब्दानुसार हिन्दी अनुवाद देने के बाद विस्तृत हिन्दी व्याख्या दी गई है। व्याख्या में श्लोक में निहित गूढ़तम भावों को भी स्पष्ट करने का प्रयास रहा है। तत्पश्चात् व्याख्यात्मक एवं व्याकरणात्मक टिप्पणियाँ देते हुए श्लोक की सर्वांगीण व्याख्या प्रस्तुत करना ही प्रमुख दृष्टिकोण रहा है।
विशेष के अन्तर्गत श्लोक में निहित गूढ़ रहस्यों, अलंकार, छन्द आदि का उल्लेख किया गया है। छन्दों का यद्यपि बार-बार प्रयोग हुआ है, तथापि छात्रों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए छन्दों का लक्षण उसी स्थल पर बार-बार दिया गया है। इसके पीछे भावना रही है कि उन छन्दों के लक्षण बार-बार पढ़ने से हमारे छात्र उन्हें हृदयंगम कर सकें।
व्याकरणात्मक टिप्पणी के अन्तर्गत शब्द निर्माण में धातु, प्रकृति, प्रत्यय, समास-विग्रह, समास का नाम आदि विस्तारपूर्वक दिए गए हैं। इस सबके पीछे एक ही उद्देश्य रहा है कि छात्रों के व्याकरण विषयक ज्ञान में वृद्धि हो। इसी शीर्षक के अन्तर्गत संधि-विच्छेद करके संधि का नाम तथा संधि-सूत्र का भी उल्लेख किया गया है, जिससे छात्रों को संधि के स्वरूप को समझ कर श्लोक के अर्थ को समझने में भी सहायता प्राप्त हो।
नीतिशतकम् की सभी उपलब्ध प्रतियों में श्लोकों का क्रम एक जैसा नहीं है। साथ ही कुछ श्लोक ऐसे भी हैं जो कुछ प्रतियों में नहीं मिलते है। हमने इन सभी श्लोकों का विषयवार संग्रह करके विद्यार्थियों के हित को देखते हुए सभी की व्याख्या प्रस्तुत की है तथा श्लोकों का क्रम निर्णय सागर प्रेस से प्रकाशित भर्तहरित्रिशती के आधार पर रखा है।
पुस्तक के प्रारम्भ में विस्तृत भूमिका दी गई है। जिसमें गीतिकाव्य का स्वरूप, गीतिकाव्य का उद्भव एवं विकास, संस्कृत गीतिकाव्य की विशेषताएँ आदि विषयों का तथा कवि भर्तृहरि के जीवनचरित, स्थितिकाल, कृतियाँ एवं भाषा शैली आदि का विस्तार से उल्लेख किया है, क्योंकि अधिकांश विश्वविद्यालयों में कवि एवं कृति पर प्रश्न पूछने की परम्परा रही है।
भूमिका में ही सभी दस पद्धतियों का सारांश देने का विचार था, किन्तु उससे पुस्तक के कलेवर में अत्यधिक वृद्धि हो जाती, जिससे बचने के लिए हमने परिशिष्ट में केवल एक विद्वपद्धति का सारांश दे दिया है। छात्रों को उसके आधार पर ही अन्य पद्धतियों के सारांश लिखने का भी अभ्यास करना चाहिए।
कुछ विश्वविद्यालयों में श्लोकों की संस्कृत व्याख्या भी परीक्षा में पूछी जाती है।
हमने प्रत्येक श्लोक की संस्कृत व्याख्या न करके नमूने के रूप में एक श्लोक की व्याख्या परिशिष्ट में दी है। उसके आधार पर अन्य श्लोकों की संस्कृत व्याख्या की जा सकती है।
छात्रों में एक जिज्ञासा सदैव बनी रहती है कि अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए श्लोक की हम किस प्रकार हिन्दी व्याख्या करें। उनकी इस जिज्ञासा के लिए हमने परिशिष्ट में एक हिन्दी व्याख्या भी उदाहरण रूप में दी है।
प्रत्येक श्लोक के कुछ कठिन शब्दों के अर्थों को भी परिशिष्ट के अन्तर्गत पुस्तक के अन्त में अकारादिक्रम में दिया गया है। साथ ही वहीं पर श्लोकानुक्रमणिका का भी उल्लेख किया गया है।
तदनन्तर में इस पुस्तक की प्रेरणास्त्रोत मेरी शक्ति-स्वरूपा सहधर्मिणी डॉ. प्रतिमा शास्त्री, व्याख्याता (स्कूल शिक्षा) के प्रति भूरिशः धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। जिन्होंने मुझे बार-बार स्मरण कराते हुए इस कार्य को शीघ्र पूर्ण करने के लिए निरन्तर प्रेरित किया एवं अनेक दायित्वों को अपने ऊपर लेकर सहयोग प्रदान किया। कु० प्राची शास्त्री ने तो पाण्डुलिपि तैयार करने में भी अनेकशः सहायता की है। एतदर्थ उसे कोटिशः आशीर्वाद। नन्हें आत्मज आयुष्मान् सुवासित शास्त्री को भी असीम शुभकामनाएँ और हार्दिक प्यार इस कामना के साथ कि उसका भी निरन्तर संस्कृत के अध्ययन के प्रति रुझान हो।
अन्त में मैं संक्षेप में केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि हमारी आने वाली संस्कृत अध्येता छात्रों की पीढ़ी का व्याकरण विषयक ज्ञान अत्यल्प है। वह इसे अत्यन्त क्लिष्ट समझती है। प्रस्तुत पुस्तक उसकी इस भावना को दूर करने का एक तुच्छ प्रयास मात्र है। जो अत्यन्त विनम्र भाव से अर्पित है।
इस पुस्तक के लेखन में मुझे अभी तक प्रकाशित सभी नौतिशतकम् की व्याख्याओं से सहायता प्राप्त हुई, एतदर्थ मैं उन सभी के विद्वान् व्याख्याकारों का हृदय से आभार व्यक्त करना अपना पुनीत कर्तव्य समझता हूँ। इति शम्
विदुषां वशंवद
राकेश शास्त्री
Reviews
There are no reviews yet.