नाड़ी-तत्त्व-दर्शनम् | Nadi-Tattva-Darshanam
₹400.00
- By :Pandit Satyadev Vasishtha
- Subject :Ayurveda
- Pages :360
- Binding :Paperback
- Author: Pandit Satyadev Vasishtha
वर्तमान काल में रोग नि़दान के लिए अनेको उपकरण और परीक्षण प्रणालियों का आविष्कार हुआ है। ये उपकरण और परीक्षण प्रणालियाँ इतनी महँगी है कि साधारण जन उनसे लाभ नहीं उठा पाता। प्राचीन काल में भारतीय मनीषियों ने दोष, धातु मलों के आधार पर रोग निदान की ऐसी निर्दोष प्रणाली को विकसित किया था जो न द्रव्य साध्य है, न ही समय साध्य। उस प्रणाली का नाम है – नाड़ी विज्ञान अर्थात् रोगी के हाथों की नाड़ी का स्पंदन अनुभव कर रोग को पहचान लेना। आधुनिक युग के महान तपस्वी और निर्लोभ विद्वान पं. सत्यदेव वासिष्ठ ने नाड़ी–विज्ञान में प्रवीणता प्राप्त की है। उन्होने इस कला का चरम उत्कर्ष रहस्य प्रस्तुत् ग्रंथ में उद्घाटित किया है। उन्होने अपने ज्ञान और विस्तृत परीक्षण के आधार पर ग्रन्थ में रावणकृत ‘नाड़ी-परीक्षा’ ग्रन्थ की प्रामाणिक व्याख्या और ‘कणाद नाड़ी’ तथा ‘वसवराजीस नाड़ी’ के सम्पूर्ण श्लोकों को प्रकृत ग्रंथ में संगृहीत कर के ग्रन्थ को परिपूर्ण एवं प्रमाणिक बनाया है।
नाडीतत्त्ववेत्ता भिषक् केसरी श्री १०८ पं० सत्यदेव वासिष्ठ
जन्म-परिचय- पं० सत्यदेव वासिष्ठ जी
नाड़ी-विज्ञान के एक अद्भुत महनीय विद्वान् थे। नाड़ी-स्पर्श मात्र से रोगों की अभिज्ञा एवं निदान करते थे। हरियाणा के आधुनिक संस्कृत काव्यकारों में भी वासिष्ठ जी का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। इनके व्यक्तित्व में कवित्व, संगीतज्ञता, वैयाकरणत्व, वैद्यकत्व आदि अद्भुत विशेषताओं का अपूर्व सामञ्जस्य था। इनके अतिरिक्त उदारता, त्याग, संयम और परोपकारिता आदि मानवीय भावों की भी समन्वय रूप से विद्यमानता थी। ऐसे लोकोत्तरचित्त विद्वान् का जन्म पञ्जाब प्रान्त के जालन्धर जिले के ' माहलगहिल' नामक ग्राम में २४ अगस्त सन् १९१२ ई०, दिन मंगलवार को रक्षापूर्णिमा के पावन पर्व में पिता पं० अनन्तराम शर्मा के घर माता द्रौपदी के गर्भ से हुआ। शिक्षा- दस वर्ष की आयु तक इन्होंनें ऊर्दू की शिक्षा ग्रहण की। इसके पश्चात् व्याकरण पढ़ने की इच्छा से प्रेरित होकर १९२२ ई० में अमृतसर से कुछ दूर विरजानन्द ब्रह्मचर्याश्रम में प्रविष्ट हुए। वहां पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी से वर्णलिपि से प्रारम्भकर सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय का अध्ययन किया। इन्होंने अध्ययन काल में ४ घण्टे ४० मिनट में महर्षि पाणिनि के ८८५९ सूत्र पञ्चोपदेश एवं निघण्टु को मौखिक सुना दिया था। इसके बाद गुरु जी की आज्ञा से वाराणसी के अनेक आचार्यों से ज्योतिष, नाड़ी-विज्ञान, सामगान, दर्शपूर्णमास विधि इत्यादि अनेक विषयों का साधिकार अध्ययन किया। लेखन-सम्पादन- परोपकारिणी सभा में पाणिनीयाष्टाध्यायी के तृतीय/चतुर्थ अध्याय के भाष्य का अनुवाद तथा टिप्पणी लिखने का कार्य ३ वर्ष तक किया। उसके बाद 'नाड़ीतत्त्वदर्शन, सत्याग्रहनीतिकाव्य, विष्णुसहस्त्रनामस्तोत्र' आदि ग्रन्थों की रचना की। उपाधियां - (१) सन् १९३४ ई० में 'सामस्वर भास्कर' और 'चतुर्वेदी' की उपाधि। (२) सन् १९३९ ई० में आयुर्वेदाचार्य की उपाधि। (२) सन् १९४२ ई० में 'साङ्गोपवेदवेदचतुष्टयी' की उपाधि। (३) सन् १९४५ ई० में 'आयुर्वेदानूचान' की उपाधि। (४) सन् १९४८ ई० में 'भिषक् केसरी' पद मिला। (५) सन् १९८६ ई० में 'डॉक्टर ऑफ वैदिक साइंस' की उपाधि। (६) लाला हरभज धवन द्वारा ज्योतिर्ज्ञान के सारभूत अङ्कपद १०८ से सम्मानित। आपने सत्याग्रहनीतिकाव्य, नाड़ीतत्त्वदर्शनम् तथा विष्णुसहस्रनामस्तोत्र-सत्यभाष्यम् ये तीनों ग्रन्थ प्रकाशित कराकर रामलाल कपूर ट्रस्ट को न केवल दान किये अपितु इनके रख-रखाव एवं पुनः प्रकाशन की व्यवस्था भी रामलाल कपूर ट्रस्ट में कर दी। निधन - २६ दिसम्बर सन् १९९८ ई० को लगभग ८६ वर्ष की अवस्था में पक्षाघात के कारण देहावसान हो गया।




















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