मेरी दृष्टि में स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनका कार्य | Meri Drishti Mein Swami Dayanand Saraswati Aur Unka Karya
₹500.00
- Author: Yudhishthir Mimansaka
- Language: Hindi
- Publication: Ramlal Kapoor Trust
- Pages: 402
- Edition: 2025
- Cover: Hard Cover
- Weight: 660 Gms.
मेरी दृष्टि में स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनका कार्य
Meri Drishti Mein Swami Dayanand Saraswati Aur Unka Karya
आमुख
[प्रथम संस्करण]
मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थप्रकाश के द्वितीय समुल्लास के आरम्भ में उक्त वचन उद्धृत किया है। इसका तात्पर्य है कि जिसकी प्रशस्त धार्मिक विदुषी माता, वैसे ही प्रशस्त धार्मिक विद्वान् पिता और आचार्य होवें, उस सन्तान को पुरुष जानना चाहिये अर्थात् वही धार्मिक विचारवान् और विद्वान् होकर इस जन्म में मनुर्भव (ऋ० १०/५३।६) आदेश के अनुरूप मनुष्य बन सकता है ।
श्रेष्ठ माता-पिता आचार्य की प्राप्ति – प्रभु की महती कृपा और पूर्व जन्म के किन्हीं सुकृत कर्मों के फलस्वरूप मुझे इस जन्म में तीनों माता पिता और आचायं ऐसे श्रेष्ठ धार्मिक चरित्रवान् एवं ज्ञानवान् प्राप्त हुए, जिन्होंने स्नेह श्रेष्ठ स्वभाव और विद्वत्ता से जिस प्रकार मेरा लालन पालन किया और निश्छल हृदय से मुझे शास्त्रज्ञान सम्पन्न किया, वह वस्तुतः उनके ही अनुरूप था। इस देवतात्रयी ने मुझे सब प्रकार योग्य बनाने का भरसक प्रयत्न किया। मुझमें जो भी कमियाँ हैं, वे मेरी हैं, चाहे वे किसी प्रकार की क्यों न होवें ।
स्वामी दयानन्द सरस्वती से प्रकाश की प्राप्ति- स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने ज्ञान और तपोबल से वेद और वैदिक धर्मरूपी सूर्य का, जिस पर सहस्रों वर्षों से अज्ञानरूपी मल का आवरण चढ़ गया था, पुनः निर्मल कर ज्योतिःपुञ्ज के रूप में प्रकट किया। उसकी कुछ किरण बिना किसी परम्पराविच्छेद के मुझ तक पहुंचीं, यह भी मेरे लिये परम सौभाग्य की बात रही।
स्वामी दयानन्द सरस्वती के साक्षात् मुखारविन्द के माध्यम से वैदिक घर्म की सूर्य की किरणें प्रकट हुईं, उन्होंने हमारे याम के गुर्जरजातीय श्री सूरजमल पटेल’ के हृदय में प्रवेश कर मल को हटा उन्हें ‘सूरज’ बनाया। फिर वहाँ से वैदिक धर्मरूपी सूर्य की किरणों ने निकल आगे बढ़कर ग्राम के तीन नवयुवकों के हृदय में प्रवेश कर उनके अज्ञानान्ध-कार को दूर किया। उनमें एक अन्यतम मेरे पूज्य पिता श्री गौरीलाल आचार्य थे। यतः मेरे पिताश्री को श्री सूरजमलजी पटेल के द्वारा स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा व्याख्यातवैदिक धर्म का ज्ञान प्राप्त हुआ, अतः पिताजी उन्हें परम श्रद्धा से आदिगुरु कहते लिखते और मानते थे ।
पिताजी के उर्वरा मानस पटल को पाकर वैदिक धर्म की उदात्त भावनाएँ अच्छे प्रकार पुष्पित एवं पल्लवित हुईं। ‘घर का दिया जला कर मन्दिर में फिर जलाना’ कहावत के अनुसार पिताजी ने सबसे पूर्व मेरी माताजी को, जो निरक्षर थीं, शिक्षित किया। उन्हें अपनी योग्य जीवनसङ्गिनी बनाया । दोनों एक पथ के पथिक बन गये। दोनों ने निश्चय किया कि हमने ब्राह्मणकुल में जन्म लेकर भी वेद नहीं पढ़ा, हम एक मात्र अपनी सन्तान को वास्तविक वेदपाठी ब्राह्मण बनायेंगे । मेरी स्मेहमयी माता का मेरी आठ वर्ष की अवस्था में निधन हो गया । उन्होंने अन्तिम समय में मेरे पिताजी से तीन विशेष बात कहीं ।
उसमें एक थी- अब आप अकेले रह जायेंगे, मोह में पड़कर युधिष्ठिर को गुरु-कुल भेजना न भूलें। माताश्री के असामयिक निधन से पिताजी कुछ समय अन्यमनस्क रहे। जब पिताजी ने मुझे गुरुकुल भेजने का विचार किया, उस समय मैं ११ वर्ष का हो चुका था। गुरुकुल में प्रवेश का काल (८-१० वर्ष) बीत चुका था। पिताजी ने मुझे कई प्रसिद्ध गुरुकुलों में प्रविष्ट कराने का प्रयत्न किया, परन्तु कहीं पैर की वक्रता तो कहीं वयः की अधिकता आड़े आई।
आर्यसामा-जिक गुरुकुलों से निराश होकर मुझे वेदपाठी बनाने की उच्च आकांक्षा से सनातन धर्म के ‘भरत महाविद्यालय हृषीकेश’ में प्रविष्ट कराने का प्रयत्न किया । वहाँ पिताजी का आर्यसमाजी होना आड़े आ गया।’ एक दयानन्द के सच्चे अनुयायी को अपने पुत्र को ‘वेदपाठी ब्राह्मण’ बनाने के संकल्प को पूरा करने में कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, इसका विवरण आत्मपरिचय में देखें ।
‘ईश्वर जो कुछ करता है, उसमें मानव का हित निहित होता है’ इस उक्ति के अनुरूप मेरे पैरों का विकार और माताजी की असामयिक मृत्यु के कारण आयु के अधिक हो जाने से गुरुकुलों में प्रवेश न पाना मेरे लिये परमहितकारक हुआ। अन्यथा मैं जिस परिस्थिति को पहुंचा हूं, उसे पाने में कभी सफल नहीं हो पाता ।
अन्त में स्वामी दयानन्द सरस्वती के परम श्रद्धालु स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा प्रदर्शित पाठविधि के अनुसार पढ़ने-पढ़ाने के दृढ़निश्चयी निरभिमानी शिष्य हितैषी श्री पं० ब्रह्मदत्त जिज्ञासु ने अपने विरजानन्द आश्रम में आश्रय दिया। १४ वर्षों तक बहुविध कष्टों को सहते हुए उन्होंने स्वयं तथा अपने निरीक्षण में विद्वानों से विविधशास्त्र पढ़ाये वा पढ़वाये (द्र० – आत्मपरिचय) ।
प्रारम्भ में तो माता-पिता की इच्छापूर्ति के लिये वहुविध कष्ट झेलते हुए अध्ययन में लगा रहा। परन्तु जब मुझे कुछ परिज्ञान हुआ तब मैं अपनी इच्छा से पढ़ाई में दृढ़चित्त होकर लग गया।
गुरुवर्य की इच्छापूति में प्रवृत्त होना – अध्ययन काल की समाप्ति के समकाल ही २५ दिसम्बर १६३५ को पिताजी का अचानक स्वर्गवास हो गया। मैं न माता की सेवा कर सका न पिताजी की। अतः मैंने निश्चय किया कि अब मेरे लिये एकमात्र गुरुजी ही ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी आज्ञा का पालन करना मेरा एकमात्र कर्तव्य है। इस दृष्टि से उनके निधन पर्यन्त उनके निर्देश में काम करता रहा (मध्य में कुछ वर्ष छोड़कर) और उनके निधन के पश्चात् उनके आरम्भ किये कार्य को पूरा करने में लग गया ।
२ मई १९३६ को मेरा श्रीमती यशोदा देवी (नर्मदा देवी) के साथ विवाह हुआ। यह देवी भी मेरे व्रत को निभाने में परम सहायिका हुई। इस जन्म में जो कुछ भी मैंने सफलता प्राप्त की, उसमें माता पिता और आचार्य के पश्चात् इस देवी का योगदान सबसे अधिक रहा।
यदि इस सहधर्मचारिणी का पूरा सहयोग प्राप्त न होता तो मैं भी अन्य साधारण साक्षर व्यक्तियों जैसा ही रहता । श्रस्तु माता पिता की वेदपाठी ब्राह्मण बनाने की इच्छा थी। मैं उनकी इच्छानुरूप तो नहीं बन सका, हाँ प्रयत्न अवश्य किया है। ब्राह्मणत्व का अधिकारी बनने के लिये स्वाध्याय प्रवचन का संकल्प और अप्रतिग्रही होना आवश्यक है। इन तीनों की ओर अपना यथासम्भव घ्यान दिया है। इससे बहुधा संकटों का भी सामना करना पड़ा, परन्तु देवी के सह-योग और धैर्य के कारण परीक्षकाल निवृत्त हुआ ।
मेरा जन्म भाद्र शुक्ला ८ सं० १६६६ तदनुसार २२ सितम्बर सन् १६०६ में हुआ । इस प्रकार मेरे वयः के ८० वर्ष पूर्ण हुए। इस काल में मैंने शिक्षा से लेकर मीमांसा पर्यन्त अङ्गोपाङ्गों का स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा प्रदर्शित पाठविधि से अध्ययन किया है। संस्कृत वाङ्मय के वैदिक और अवैदिक उभयविध महती ग्रन्थराशि का अध्ययन मनन और पारायण किया, संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास (३ भाग) वैदिकस्वरमीमांसा, वैदिकछन्दोमीमांसा सदृश मौलिक ग्रन्थ लिखे, अनेक दुर्लभ प्राचीन वैदिक ग्रन्थों तथा स्वामी दयानन्द सरस्वती की महती ग्रन्थ-राशि का शोधोपयोगी सम्पादन और प्रकाशन किया।
आर्यसमाज और परोपकारिणी सभा के साथ सम्पर्क रहा। इस सवका समुदित प्रभाव मेरे मन पर यह पड़ा कि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने विद्याबल और तपोबल से वेदोद्धार और वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार का जो कार्य किया, उसका शतांश भी उनके द्वारा स्थापित इन सभाओं ने नहीं किया। जो कुछ कार्य हुआ, वह अधिकतर व्यक्तिगत प्रयासों का फल है। इतना ही नहीं, अव तो आर्यसमाज के द्वारा जो कार्य हो रहा है, उसका ७५ प्रतिशत स्वामी दयानन्द सरस्वती के मन्तव्यों के विपरीत हो रहा है। सम्प्रति तो सामान्य व्यक्तियों और आर्यसमाजियों में कोई अन्तर ही नहीं है। यह सब गिरावट आर्यसमाज के नियमों की विशेषकर ३-४-५ की उपेक्षा के कारण हुआ है।
मैं कुछ वर्षों से अनेक क्षेत्रिय व्याधियों से पीड़ित हूं। स्वास्थ्य अति क्षीण हो चुका है। कुछ भी कार्य करने में असमर्थ हो चुका हूं। अतः अब बहालगढ़ (सोनीपत) छोड़कर ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति के पास फरीदाबाद में रहता हूं। मैंने अपने दीर्घकालीन अध्ययन मनन स्वाध्याय आदि से स्वामी दयानन्द सरस्वती को तथा उनके कार्य को जिस रूप में समझा है, वह आर्यसमाज के विद्वानों से सर्वथा भिन्न है।
अतः अत्यन्त अस्वस्थ तथा हाथ पैरों में यत्किचित् कार्य करने की शक्ति न होने पर भी दो वर्ष पूर्व मन में विचार उत्पन्न हुआ कि मैंने स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनके कार्य को जिस रूप में समझा है, उसे शब्दवद्ध कर दू। इस समय में आर्यसमाज में कोई ऐसा विद्वान् नहीं है, जो स्वामी दयानन्द सरस्वती के विषय में मेरे बरावर जानता हो। दो व्यक्ति थे, जो स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनके कार्य का सही मूल्याङ्कन करने में समर्थ थे।
उनके नाम हैं श्री पं० भगवद्दतजी (लाहौर निवासी) और श्री पं० ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु । ये दोनों महानुभाव स्वर्गत हो चुके हैं। इसलिये दो वर्ष पूर्व इस विचार को साकाररूप देने लगा। स्वास्थ्य ठीक न रहने से जब कभी तबीयत ठीक होती, ५-१० पंक्तियाँ लिख लेता। इस प्रकार टुकड़े-टुकड़े रूप में लिखे जाने से इसमें लेखनसम्बन्धी कई त्रुटियाँ हैं। कई अंश दुबारा लिखे गये, कुछ छूट गये। इन सब त्रुटियों के रहते हुए भी यह ग्रन्थ मेरे स्वामी दयानन्द सरस्वती विषयक मन्तव्यों और मेरे विचारों को प्रकट करने में समर्थ होगा ।
इस ग्रन्थ में स्वामी दयानन्द सरस्वती के वेदोद्धार के विषय में ही लिखा है, क्योंकि मैं उनका यही कार्य प्रधान मानता हूं। सन् १९२५ तक आर्यसमाज स्वयं दयानन्द को वेदों वाला कहता तथा मानता था । मथुरा-जन्मशताब्दी की शोभायात्रा में वेदां वलियाँ ऋषियाँ तेरे आवन दी लोड़ तथा वेदों का डङ्का आलम में बजबा दिया ऋषि दयानन्द ने ये दो भजन व गीत ही प्रमुख थे। स्त्रीसुधारक, समाजसुधारक, अछूतोद्धारक गोरक्षक, आर्यभाषा (हिन्दी) प्रसारक, स्वतन्त्रता का प्रचारक आदिरूप यदा कदा ही स्मरण किया जाता था। सम्प्रति दयानन्द को इन्हीं विशेषणों से विशेषित किया जाता है। उसका प्रमुख वेदों वाला स्वरूप हम भूल गये अर्थात् हमने दयानन्द के वेदोद्धाररूपी प्रमुख कार्य को सर्वंया भुला दिया ।
प्रकाशन में सहायता – इस ग्रन्थ के प्रकाशन में अमेरिका प्रवासी श्री सुरेन्द्र मोहन वर्मा जी ने २५००००० दो सहल पांच सौ रुपये सहाय-तार्थ भेजे हैं। जिस समय ये रुपये प्राप्त हुए तब प्रस्तुत ग्रन्थ छप रहा था। अतः इनकी इच्छानुसार इमकी छपाई में ही ये रुपये सहायता रूप में व्यय किये हैं। इस अयाचित सहायता के लिये मैं आपका बहुत आभारी हूं। प्रभु से प्रार्थना करता हूं कि आपके द्वारा, जहाँ आप निवास करते हैं, वैदिक धर्म का प्रचार प्रसार यथेच्छ रूप में हो और ऋषि दयानन्द के ऋण से उऋण होवें । सम्पूर्ण परिवार में वैदिक धर्म के प्रति श्रद्धा तथा प्रेम उत्तरोत्तर बढ़ता जाये ।
इस पुस्तक की कापी को शोधने तथा प्रूफ देखने का महत्त्वपूर्ण कार्य श्री पं० चन्द्रदत्तजी व्याकरणाचार्य ने किया है। साथ ही अल्प समय में ही जिल्द बन्धवाकर तैयार करने में भी सहयोग दिया है। पुस्तक को अल्प समय में कम्पोज कर पूरा करने में श्री ओंकार त्यागी, ओंकार गगोटिया तथा दयाशंकर ने पर्याप्त प्रयत्न किया है। इसके लिए मैं इन सबको शुभाशीः प्रदान करता हूं ।
विदुषां वशंवदः
युधिष्ठिर मीमांसक
मेरी दृष्टि में स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनका कार्य पुस्तक का परिचय
मेरी दृष्टि में स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनका कार्य युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा लिखित एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है, जो महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती के व्यक्तित्व, विचारधारा और उनके महान कार्यों को समझने की दृष्टि प्रदान करती है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने वेदों के ज्ञान को जनसामान्य तक पहुँचाने, सामाजिक कुरीतियों का विरोध करने तथा समाज में सत्य, तर्क, शिक्षा और नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
यह पुस्तक पाठकों को महर्षि दयानन्द सरस्वती के विचारों, वैदिक सिद्धांतों और उनके सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों के विभिन्न पक्षों से परिचित होने का अवसर प्रदान करती है। इसके माध्यम से पाठक उनके कार्यों के महत्त्व तथा भारतीय समाज और वैचारिक परंपरा पर उनके प्रभाव को समझने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
मेरी दृष्टि में स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनका कार्य पुस्तक की प्रमुख विशेषताएँ
- महर्षि दयानन्द सरस्वती का व्यक्तित्व: उनके जीवन, विचारों और आदर्शों को समझने का अवसर।
- वैदिक विचारधारा: वेदों पर आधारित उनके चिंतन और सिद्धांतों का परिचय।
- सामाजिक सुधार: समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरोध और सुधार के प्रयासों का अध्ययन।
- धार्मिक एवं वैचारिक योगदान: भारतीय समाज में वैदिक ज्ञान के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान को जानने का अवसर।
- लेखक का दृष्टिकोण: युधिष्ठिर मीमांसक की दृष्टि से महर्षि दयानन्द सरस्वती के कार्यों का अध्ययन।
मेरी दृष्टि में स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनका कार्य पुस्तक किनके लिए उपयोगी है?
यह पुस्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती के जीवन और विचारों में रुचि रखने वाले पाठकों, आर्य समाज के अनुयायियों, वैदिक साहित्य के विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधार्थियों तथा भारतीय सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों का अध्ययन करने वाले व्यक्तियों के लिए उपयोगी है।
यदि आप महर्षि दयानन्द सरस्वती के वैचारिक योगदान, वैदिक सिद्धांतों और समाज सुधार के प्रयासों को समझना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके व्यक्तिगत पुस्तकालय और अध्ययन-संग्रह के लिए एक उपयोगी विकल्प हो सकती है।
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महर्षि दयानन्द सरस्वती के जीवन, विचारों और कार्यों से संबंधित साहित्य का अध्ययन करें और भारतीय वैदिक ज्ञान-परंपरा को समझने की दिशा में अपना ज्ञान बढ़ाएँ।














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