मैक्समुलर द्वारा वेदों का विकृतिकरण
Max muller Dwara Vedon ka Vikrutikaran

110.00

Book Details:
  • Author: Dr. K.V. Palival
  • Language: Hindi
  • Publication: Suruchi Prakashan
  • Pages: 117
  • Edition: 2022
  • Cover: Paperback
  • ISBN: 9789381500514
  • Weight: 160 Gms.
Description

मैक्समुलर द्वारा वेदों का विकृतिकरण यह पुस्तक क्यों ?

भारत के लोगों को फ्रेडरिक मैक्समूलर का परिचय कराने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि ब्रिटिश शासनकाल में ब्रिटिश राजनीतिज्ञों, प्रशासकों और कूटनीतिज्ञों ने उसे एक सदी (1846-1947) तक लगातार हिन्दुओं का एक अभिन्न मित्र और वेदों के महान विद्वान् के रूप में प्रस्तुत किया है, परन्तु सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है। वास्तव में वह हिन्दुओं और हिन्दू धर्मशास्त्रों का एक महान शत्रु था।

लेकिन दुर्भाग्य से, उस समय के ही नहीं, बल्कि आज के हिन्दू भी उसके उद्देश्य व कार्य के दूरगामी प्रभाव को समझने में असफल रहे हैं क्योंकि मैक्समूलर ने अपनी लेखनी की चतुराई द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप और वेद भाष्य के विकृतीकरण के उद्देश्य को बड़े योजनाबद्ध तरीके से छिपाए रखा, यहाँ तक कि उसके निधन के बाद सन् 1901 में प्रकाशित स्वलिखित जीवनी में भी उसे उजागर नहीं किया।

इस संदर्भ में श्री ब्रह्मदत्त भारती, ने अपनी पुस्तक ‘मैक्समूलर-ए लाइफ लौंग मास्करेड’ में इस प्रकार लिखा है :

“Max Muller’s effectiveness as the arch enemy of Hinduism lay dangerously hidden in his subtle equivocations and in his ability, which seemed congenital, successfully to pass a counterfeit coin without being caught while performing the feat. His capacity to look honest and sound sincere on surface was prodigious.

The Hindus, of the nineteenth century failed to discover and understand Max Muller and his Max Mullerism, because, by and large, being, too guillible, they believed whatever Max Muller wrote and said. “Since he had been, in addition, convertly supported and encouraged by the Englishmen who then ruled Hindustan, he was able to mount his veiled attacks on Hinduism again and again from behind the convenient cover of philological research.” (p. 194)

अर्थात् “मैक्समूलर की हिन्दूधर्म के प्रति कट्टर शत्रुता का प्रभावीपन उसकी लेखनी की बहुअर्थी शैली में भयंकर रूप से छिपा हुआ है। इस सफलता का रहस्य उसकी इस योग्यता से भी आसानी से समझा जा सकता है, जैसे कोई चालाक व्यक्ति खोटे सिक्के को चला देने पर भी पकड़ा नहीं जाता है। उसका ऊपर से हिन्दू धर्म शास्त्रों-वेदों आदि के प्रति सच्चा और निष्ठावान दिखलाई देना उसकी आश्चर्यजनक रहस्यमयी लेखनशैली की क्षमता का परिचायक है।

उन्नीसवीं सदी के हिन्दू मैक्समूलर और उसके मैक्समूलरवाद को पहचानने और समझने में पूरी तरह असफल रहे हैं क्योंकि हिन्दुओं के आमतौर पर अत्यंत सीधे-सादे होने के कारण उन्होंने उसे ही सच मान लिया जो कि मैक्समूलर ने कहा और लिखा। इसके अतिरिक्त उसे आजीवन अप्रत्यक्ष रुप से अंग्रेजों का पूर्ण समर्थन और सहयोग मिलता रहा जो कि उस समय भारत के शासक थे। इसी कारण वह भाषा विज्ञान-शोध की आड़ में छिपकर लगातार हिन्दू धर्म एवं वेदों पर प्रहार करता रहा।”

इसी के साथ-साथ अंग्रेज शासक लगातार यही प्रचार करते रहे कि मैक्समूलर तो वेदों का महान विद्वान और हिन्दू धर्म तथा हिन्दुओं का शुभचिंतक है। वे इस कथन की पुष्टि इस बात से करते हैं कि उसने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में 1846 से 1900 तक वेदों और हिन्दू धर्मशास्त्रों पर एक विशाल साहित्य स्वयं लिखा तथा अपने जैसे सहयोगी लेखकों द्वारा लिखवाकर उसे स्वयं संपादित किया। aid ni nabbid vi

मैक्समूलर ने अपनी बहुअर्थी लेखनी की आड़ में आजीवन वेदों को विरुपित किया, फिर भी वह अपने को हिन्दू धर्म का हितैषी होने का ढोंग रचंता रहा। इस बात के इतने पक्के, सच्चे और आवश्चर्यजनक प्रमाण हैं कि कोई भी तर्क उसे वेदों के विकृतीकरण के दोष से बचा नहीं सकता।

मैक्समूलर की दूसरी जीवनी में असली स्वरूप

इसके लिए हमें बाहर के किसी दूसरे प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मैक्समूलर द्वारा लिखित साहित्य और अपने मित्रों, परिवारीजनों आदि को लिखे उसके पत्रों में ही पर्याप्त सामग्री मिलती है। हालांकि मैक्समूलर की स्वलिखित जीवनी 1901 में ही प्रकाशित हुई थी, परन्तु उसकी पत्नी जोर्जिना मैक्समूलर ने उसके फौरन बाद, 1902, में उसकी एक और जीदनी “दी लाइफ एण्ड लैटर्स ऑफ दी आनरेबिल फ्रेडरिक मैक्समूलर” के नाम से प्रकाशित की। इसमें अन्य विवरणों के सहित मैक्समूलर द्वारा लिखे पत्रों का संकलन भी है। इसके प्रकाशन का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए श्रीमती जोर्जिना ने पुस्तक की भूमिका में लिखाः

“It may be thought that the publication of these volumes is superflous after two works ‘Auld Lang Syne’ and the ‘Autobiography (2 Vols.) written by Max Muller himself. But it seemed that something more wanted to show the innermost character of the real man……. The plan pursued throughout these volumes has been to let Max Muller’s letters and the testimony of friends to his mind and character speak for themselves, whilst the whole is connected by a slight thread of necessary narrative. The selection from the letters has been made with a view to bring the man rather the scholar before the world.” (preface to November, 1902, New York Edition; Bharti, p.IX).

अर्थात् “ऐसा सोचा जा सकता है कि स्वयं मैक्समूलर द्वारा लिखित “ओल्ड लैंग सायने” और “आत्मजीवनी” (2 खंडों में) के प्रकाशित हो जाने के बाद, इन दों खंडों के प्रकाशन की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि उस मनुष्य के आन्तरिक चरित्र की वास्तविकता को दिखाने के लिए कुछ और अधिक करने की आवश्यकता है।

इन खंडों में जो योजना लगातार अपनाई गई है वह मैक्समूलर के पत्रों और उसके मित्रों के प्रमाणस्वरूप दिए गए कथन, उस मनुष्य की सोच और ‘चरित्र को स्वयं उजागर करते हैं, जबकि समस्त सामग्री आवश्यक आत्मकथा के धागे से बंधी हुई हैं। यहां उद्धृत पत्रों का चुनाव इस उद्देश्य से किया गया है ताकि विश्व के सामने एक विद्वान की अपेक्षा उस मनुष्य का सही स्वरूप प्रस्तुत किया जा सके।’ (न्यूयार्क संस्करण, 1902, प्राक्कथन, पृ. IX)

इसलिए यहाँ हमारा उद्देश्य यह समझने का है कि क्या वह वास्तव में वेदों और हिन्दू धर्म शास्त्रों का प्रशंसक और भारत का मित्र था ? क्या वह वेदों, उपनिषदों, दर्शनों आदि के उदात्त, प्रेरणादायक और आध्यात्मिक चिंतन से प्रभावित था, और उन्हें वह अंग्रेजी माध्यम से विश्वभर में फैलाना चाहता था ? क्या वह भारतीय धर्मशास्त्रों का जिज्ञासु था ? क्या उसने ऋग्वेद का भाष्य भारतीय प्राचीन यास्कीय-पाणिनीय पद्धति के अनुसार किया था ? उसने सायण-भाष्य को ही आधार क्यों माना ? क्या उसने सायण के संभी मापदण्डों को अपनाया? यदि नहीं, तो क्यों ? आखिर उसे वेदों में क्या मिला ?

क्या वह तुलनात्मक भाषा विज्ञान और गाथावाद के शोध की आड़ में एक पक्षपाती, पूर्वाग्रही और छद्‌मवेशी सैक्यूलर ईसाई मिशनरी था ? जो वेदों और हिन्दू धर्म शास्त्रों के भ्रामक अर्थ करके हिन्दू धर्म को समूल नष्ट करना चाहता था। क्या वह वेदों को बाईबिल से निचले स्तर का दिखाकर भारतीयों को ईसाईयत में धर्मान्तरित करना और भारत में ब्रिटिश राज को सुदृढ़ करना चाहता था ? आखिर उसने वेदों और भारत के प्राचीन इतिहास के बारे में अनेक कपोल कल्पित मान्यताएं क्यों स्थापित कीं ? इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी अंग्रेजी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं के ज्ञान में अधकचरे, चौबीस वर्षीय, अनुभवहीन गैर-ब्रिटिश, जर्मन युवक मैक्समूलर को ही वेदभाष्य के लिए क्यों चुना ?

उसने वेदों का विकृतीकरण क्या, क्यों और कैसे किया ? इन्हीं कुछ प्रश्नों को यहां संक्षेप में विश्लेषण किया जाएगा ताकि अधकचरे ज्ञानी हिन्दू और सैक्यूलरवादी, जो उसके विकृत साहित्य के आधार पर समय-समय पर हिन्दू धर्म की निंदा करते रहते हैं, उसकी वास्तविकता तथा उसके निहित उद्देश्य को समझ सकें। इसके लिए हमें तत्कालीन ब्रिटिश शासित भारत की धार्मिक व राजनैतिक स्थितियों को समझना होगा, जिनके कारण उन्हें एक मैक्समूलर की तलाश करनी पड़ी।

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