मन का कायाकल्प
Man Ka Kayakalp

100.00

Book Details:
  • Author: Dr. Raghuveer Vedalankar
  • Language: Hindi
  • Pages: 152
  • Edition: 2025
  • Cover: Paperback
  • Weight: 183 Gms.
Description

प्राक्कथन

इस पुस्तक में जिन उपद्रवों का उल्लेख है, अब से ५० वर्ष पूर्व लेखक स्वयं इनसे ग्रसित रहा है। एक सन्त के कहने पर कि इस समस्या का समाधान स्वयं तुम्हें ही करना होगा। बस, सन्त की बात मेरे मन में घर कर गई तथा तभी से मैंने मन का विश्लेषण करना प्रारम्भ कर दिया। छात्रावस्था में भी मनोविज्ञान मेरा विषय था। मन के अध्ययन तथा विश्लेषण के द्वारा मैंने सभी मनोविकारों से मुक्ति प्राप्त की। इतना ही नहीं, अपितु दो मानसिक रोगियों की चिकित्सा भी की है। इनका संक्षेप यह है कि एक २५ वर्षीय नवयुवक अति उदास तथा जीवन से लगभग निराश होकर मेरे पास आया।

उसने कहीं सड़क पर भयङ्कर दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मृत्यु देख ली थी। तभी से उसके मन को मृत्यु तथा दुर्घटना के भय ने जकड़ लिया था। वह दिन-रात यही सोचता था कि कभी मेरे साथ भी ऐसा न हो जाए। मैंने एक मनोचिकित्सक की भाँति उसे समझाया। परिणामस्वरूप उसका भय तथा तज्जन्य निराशा समाप्त हो गई। अब वह प्रसन्नतापूर्वक अपने सभी कार्य कर रहा है।

दूसरे रोगी की दशा तो इससे भी भयङ्कर थी। वह २५-२६ वर्ष की विवाहित लड़की थी। बुद्धिमती तथा एम.एस.सी. तक शिक्षित थी। सज्जन प्रकृति की छल-फरेब से दूर थी। इसके उपरान्त भी उसे ससुराल में उपेक्षा तथा प्रताड़ना सहनी पड़ी, क्योंकि उसकी सास अशिक्षित तथा अति निष्ठुर प्रकृति की थी। शिक्षित पति भी उसके ही कहने में था। इस प्रकार ससुराल में कोई भी उस लड़की का पक्ष पोषक न था। उसके पितृगृह को इस सबकी जानकारी नहीं थी।

परिणामस्वरूप वह लड़की कई गम्भीर रोगों से आक्रान्त हो गई। निरन्तर खाँसी, न्यून रक्तचाप तथा फेफड़ों की समस्या रहने लगी। उसका एक पुत्र अभी छोटा ही था। उसकी चिन्ता उसे दिन-रात रहती थी। क्योंकि उसका पिता भी उस पर अधिक ध्यान नहीं दे रहा था। लड़की के हाथ-पैर काँपने लगे थे। रोती रहती थी तथा चिन्ता, तनाव, भय आदि से ग्रस्त होकर वह अवसाद की स्थिति की ओर बढ़ रही थी।

मैंने उसके रोगों तथा उनके कारणों को समझा तथा मनोवैज्ञानिक रीति से उसकी चिकित्सा की। उसके मन से चिन्ता, भय तथा निराशा को दूर भगाया। उसे उसकी योग्यता का ध्यान दिलाया। परिणामस्वरूप वह पूर्णतः स्वस्थ हो गई। एक वर्ष से भी अधिक यह प्रयोग चला। इस समय वह लड़की दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रोफेसर है। अध्यापन के साथ-साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने घर को भी सम्भाल रही है, तथा पुत्र की शिक्षा पर भी ध्यान दे रही है।

निश्चय ही समाज में इस प्रकार के अनेक रोगी होंगे। छात्र तो असफल होकर आत्महत्या तक कर रहे हैं। इस प्रकार के मानसिक विकार ग्रस्त व्यक्तियों के लिए यह पुस्तक निश्चित रूप से लाभप्रद होगी।

– रघुवीर वेदालंकार

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