मध्य एशिया तथा चीन में भारतीय संस्कृति
Madhya Asia tatha China mein Bharatiya Sanskriti

430.00

Book Details:
  • Author: Satyaketu Vidyalankar
  • Language: Hindi
  • Pages: 232
  • Edition: 2020
  • Cover: Hard Cover
  • Weight: 405 Gms.
Description

प्रस्तावना

प्राचीन काल में भारत के सांस्कृतिक साम्राज्य का क्षेत्र अत्यन्त विशाल था । एशिया के प्रायः समी देश उस समय भारत के धर्म तथा संस्कृति से प्रभावित थे । अफगानिस्तान तब भारत का उसी प्रकार से अंग था, जैसे कि काश्मीर, कलिङ्ग (उड़ीसा) और आंध्रप्रदेश आदि थे। मध्य एशिया में तब बहुत-से भारतीय उपनिवेशों की सत्ता थी, जिनमें खोतन तथा कुची प्रधान थे। वर्तमान समय में राजनीतिक दृष्टि से मध्य एशिया के दो भाग हैं, चीनी तुर्किस्तान (सिगकियांग) और रूसी तुर्किस्तान जिसमें उजबक, खिरगिज आदि के समाजवादी सोवियत गणराज्य विद्यमान हैं।

मध्य एशिया के इन दोनों भागों के निवासी अब इस्लाम को अपना चुके हैं, और भारतीय संस्कृति से उनका विशेष सम्पर्क नहीं रहा है। पर प्राचीन काल में वहाँ भारतीय धर्मों का प्रचार था, संस्कृत ग्रन्थों का पठन-पाठन होता था, लिखते के लिये ब्राह्मी तथा खरोष्ठी लिपियों का प्रयोग किया जाता था, और राजकीय कार्यों तथा परस्पर व्यवहार के लिये संस्कृत भाषा प्रयुक्त की जाती थी।

गत वर्षों में मध्य एशिया में पुरातत्त्व-सम्बन्धी जो खोज हुई है, उससे रेत की ढेरियों के नीचे दबे हुए बहुत-से स्तूप, गुहामन्दिर तथा चैत्य प्रकाश में आये हैं, और संस्कृत के कितने ही हस्तलिखित ग्रन्य तथा अभिलेख भी उपलब्ध हुए हैं। शक, युइशि, हूण आदि जिन विविध जातियों ने मध्य एशिया के भारतीय राज्यों पर आक्रमण किये, भारतीयों के सम्पर्क में आकर उन्होंने भी इस देश के धर्म, भाषा और संस्कृति को अपना लिया ।

भारत के धर्मप्रचारक चीन, तिब्बत, मंगोलिया, कोरिया और जापान भी गये, और वहाँ जाकर उन्होंने अपने धर्म का प्रचार किया। इन देशों की भाषाएँ सीख कर संस्कृत के ग्रन्थों का उन्होंने वहाँ की भाषाओं में अनुवाद किया, और वहाँ अनेक विद्यापीठों तथा अनुवाद-संस्थानों की स्थापना की। बौद्ध धर्म के जो बहुत-से ग्रन्य आज संस्कृत व पालि भाषाओं में उपलब्ध नहीं हैं, वे उनके चीनी तथा तिब्बती अनुवादों में प्राप्य हैं। भारत के वेद्वानों और धर्मप्रचारकों ने चीन, तिब्बत, मंगोलिया आदि सुदूर देशों में भारत का जो विशाल सांस्कृतिक साम्राज्य स्थापित किया था, वह वस्तुतः अनुपम था और वह वर्तमान समय में भी विद्यमान है।

विदेशों में भारतीय संस्कृति की सत्ता के सम्बन्ध में खोज का प्रधान श्रेय फ्रेञ्च तथा जर्मन विद्वानों को है, यही कारण है, जो इस विषय की पुस्तकें अंग्रेजी में बहुत कम लिखी गई हैं, और भारतीय पाठकों को अपने देश के इस गौरवमय सांस्कृतिक साम्राज्य का विशेष परिचय नहीं है। मैंने प्रयत्न किया है, कि मध्य एशिया, चीन, तिब्बत आदि में भारतीय संस्कृति की सत्ता के सम्बन्ध में जो सामग्री अब तक प्रकाश में आयी है, उसे संक्षिप्त एवं सुपाठ्य रूप से हिन्दी में प्रस्तुत करूँ ।

मुझे आशा है, इस पुस्तक द्वारा भारतीय संस्कृति के के गौरवमय प्राचीन इति अध्याय पाठकों के सम्मुख आ जायगा और इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी प्राप्त इतिहास का एक करने की जिज्ञासा भी उनमें उत्पन्न हो जायगी ।

इस पुस्तक में जो अनेक चित्र दिये गये हैं, उनकी प्राप्ति के लिये मैं नेशनल म्यूजियम, नई दिल्ली तथा भारतीय पुरातत्त्व विभाग के प्रति आभार प्रगट करता है।

– सत्यकेतु विद्यालंकार

Reviews (0)

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “मध्य एशिया तथा चीन में भारतीय संस्कृति
Madhya Asia tatha China mein Bharatiya Sanskriti”

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Shipping & Delivery