क्या खोजा भारत या इंडिया Kya Khoja Bharat Ya India
₹100.00
- Author: Rajesharya Atta
- Language: Hindi
- Pages: 144
- Edition: 2021
- Cover: Paperback
- Weight: 167 Gms.
क्या खोजा भारत या इंडिया (Kya Khoja Bharat Ya India)
आर्यों को विदेशी व आक्रमणकारी मानने के सिद्धान्त की नींव विलियम जोन्स (१७४६-१७९४) ने डाली थी, जो धीरे-धीरे पूरे भारतीय जनमानस में फैल गया। स्वयं को आर्यों (हिन्दुओं) के प्रतिनिधि मानने वाले पौराणिक ब्राह्मणों ने स्वामी दयानन्द के वैदिक प्रचार व सुधार के विरुद्ध तो सभाएँ कीं व पुस्तकें लिखीं, पर अंग्रेजों के इस षड्यन्त्र के विरुद्ध किसी ने एक शब्द भी नहीं बोला। और तो और बाल गंगाधर तिलक जैसे राष्ट्रवादी पण्डित ने भी आर्यों को विदेशी सिद्ध कर दिया।
फिर ऐसे वातावरण में यदि ज्योति बा फुले ने अंग्रेजों के ‘आर्य विदेशी’ सिद्धान्त का समर्थन किया हो तो क्या आश्चर्य की बात है ! पर ज्योति बा को अपना गुरु मानने वाले डॉ० अम्बेडकर ने न केवल उनके इस सिद्धान्त को नकारा अपितु इसके विरुद्ध शोधपूर्ण लिखा भी है। यदि वे चाहते तो अपने साथ दुर्व्यवहार करने वाले आर्यों (सवर्ण जाति अभिमानियों) के विरुद्ध बोलकर राजनैतिक लाभ उठा सकते थे, पर उन्होंने अंग्रेजों को प्रसन्न करने की अपेक्षा राष्ट्रहित में सत्य का पक्ष लिया। ‘बाबा साहेब डॉ० अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय’ के प्रमाणों के आधार पर श्री कुलदीप चन्द अग्निहोत्री ने ‘डॉ० भीमराव रामजी अम्बेडकर यात्रा के पदचिह्न’ पुस्तक में लिखा है-
अम्बेडकर लिखते हैं-“यह दावा कि आर्य बाहर से आये और भारत पर आक्रमण किया, और यह कल्पना कि दास या दस्यु भारत के मूल निवासी थे एकदम गलत है। फिर यह कहना कि चातुर्वण्य व्यवस्था आर्यों की रंगभेद की नीति पर आधारित है, यथार्थ से बहुत दूर है। (वेदों में इनका कोई संकेत नहीं मिलता।) (पृ० ८५)
अम्बेडकर के अनुसार-“मैं बार बार कह चुका हूँ कि आर्य शब्द का सम्बन्ध न रक्त से है और न ही शारीरिक ढाँचे से, न बालों से और न कपाल से, मेरा सीधा तात्पर्य है, जो आर्य भाषा बोलते हैं वही आर्य हैं।” (पृ० ८६)
इसके बाद अम्बेडकर ने ऋग्वेद के अनेक मन्त्र देकर सिद्ध किया है कि आर्यों और दस्युओं के बीच का अन्तर न तो प्रजातीय था और न ही शारीरिक बनावट का। दास और दस्यु भी आर्य हैं।” (पृ० ८७)
अम्बेडकर आर्य और दास दस्यु, दोनों को ही भारत के दो समुदाय के रूप में मानते हैं। “प्रायः यह सम्भावना व्यक्त की जाती है कि दास और दस्यु भारत के मूल निवासी थे और वे आर्यों से भिन्न जाति के थे। आर्यों ने उन्हें पराजित किया। यह सब एक काल्पनिक उड़ान मात्र है।….. यह सिद्धान्त कुछ कही सुनी सुनाई बातों को अंतिम साक्ष्य मानकर निर्धारित किया गया है।” (पृ० ८९)
उन्होंने (डॉ० अम्बेडकर ने) डॉ० केतकर को उद्धृत किया-“सभी राजा चाहे वे तथाकथित आर्य थे अथवा द्रविड़, आर्य ही कहलाते थे। जब तक विदेशियों ने नहीं कहा, भारत के लोगों को इससे कोई सरोकार नहीं था कि कोई आर्य है या द्रविड़ । चमड़ी का रंग इस देश में जाति का मानदंड नहीं रहा।” (पृ० ५४)
इसके विपरीत श्री नेहरू जी ने ‘आर्य विदेशी’ के दुष्प्रचार को सार्वभौम सत्य की तरह मानकर वर्तमान हिन्दुओं के पूर्वजों (आर्यों) को उनकी जन्म भूमि से काट दिया। कम्युनिस्ट होने के कारण शायद वे अपने पूर्वज किसी और को मानते हों, तभी तो जेल में बैठे हुए भी अपनी ८-९ वर्ष की पुत्री इन्दिरा को लिखे पत्रों में भी राम-कृष्ण आदि किसी महामानव की बजाय डार्विन के आदि (जंगली) मानव की कहानियाँ लिखते थे। विदेशियों का झुनझुना बजाते हुए उन्होंने आर्यों के विषय में लिखा-
“उन द्रविड़ों पर आर्यों ने उत्तर से आकर हमला किया, उस जमाने में मध्य एशिया में बेशुमार आर्य रहते होंगे। ….. आर्य एक मजबूत लड़ने वाली जाति थी और उसने द्रविड़ों को भगा दिया। …. पुरानी संस्कृत किताबों में तुम्हें उनका बहुत-सा हाल मिलेगा। (ऋग्वेद तथा) दूसरे वेदों से और पुराणों और दूसरी संस्कृत की पुरानी किताबों से हमें मालूम होता है किआर्य फैलते चले जाते थे।”
“आर्यों को अपनी जाति का बड़ा घमण्ड था और इसलिए वे हिन्दुस्तान की दूसरी जातियों में मिल जुल जाने से डरते थे। इसलिए उन्होंने ऐसे कायदे और कानून बनाये कि मिलावट न होने पाए।…..”
प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसी झूठ का प्रचार करने वाले इतिहास लेखकों को संरक्षण दिया। इसके लिए उन्होंने राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की लोकप्रियता का भी लाभ उठाया। उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाकर (१९५२ ई०) उनसे ‘संस्कृति के चार अध्याय’ ग्रन्थ लिखवाया। इसकी प्रस्तावना स्वयं नेहरू जी ने लिखी।
पुस्तक पढ़ने से स्पष्ट पता चलता है कि दिनकर जी तो आर्यों को भारत का मूल निवासी मानते थे, पर उन पर कोई दबाव था, जो उनसे कहीं-कहीं आर्यों को विदेशी लिखवा रहा था। धन व पद के आगे झुके बाद के लेखकों ने उन्हीं की लकीर को पीटकर देश की पीढ़ी को इतना भ्रमित कर दिया कि वह आतंकवादी और देशभक्त सैनिकों में अन्तर करना भी भूल गई। ऐसी ही कुछ भ्रान्तियों का निराकरण करने के लिए प्रस्तुत पुस्तक ‘क्या खोजा-भारत या इण्डिया’ लिखी है। पुस्तक लिखने में सहयोगी ग्रन्थ के लेखकों के प्रति मैं धन्यवादी हूँ।
श्री सहदेव समर्पित ने मेरे परिश्रम को सार्थक किया। श्री सुरेन्द्र कुमार शास्त्री, प्राचार्य देवर्षि विद्यापीठ नन्दगढ़ (जुलाना जीन्द) ने व प्राचार्य श्री अभय आर्य रोहतक (आर्य बाल भारती, पानीपत) ने मेरे साहित्य को प्रचारित करने में विशेष योगदान देकर मेरा उत्साह बढ़ाया। ‘हमने क्या खोजा’ पुस्तक की महत्ता को समझते हुए ‘वैदिक सर्वहितकारी ट्रस्ट’ ने इसके दूसरे संस्करण के प्रकाशन व प्रचार का उत्तरदायित्व लेकर मुझे अगले कार्य के लिए निश्चिन्त कर दिया है। ‘इतिहासकार की कलाकारी’ के बाद ट्रस्ट द्वारा यह मेरी दूसरी पुस्तक छप रही है। आशा है अब आगे से मेरी सभी पुस्तकें ‘वैदिक सर्वहितकारी ट्रस्ट’ ही प्रकाशित करवाएगा। मैं ट्रस्ट के प्रधान श्री दिनेश कुमार शास्त्री जी व अन्य सदस्यों का धन्यवाद करता हूँ।
आशा है यह पुस्तक सत्य के जिज्ञासु विद्यार्थियों का मार्ग दर्शन करेगी। इससे स्वधर्म व राष्ट्र का बड़ा उपकार होगा।
– राजेशार्य
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