किसी भी विज्ञान-शास्त्र को व्यावहारिक एवं गतिमान बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि उसे परम्परा एवं प्रगति दोनों की अखण्ड कड़ी से सन्नद्ध किया जाए । एकपक्षीय ज्ञान का मात्र सम्बल बौद्धिक विकास की यात्रा पूर्ण करने में सक्षम नहीं होता। सम्भवतः इसी उद्देश्य से इस पुस्तक का सर्जन किया गया है।
आधुनिक विकासशील वैज्ञानिक युग में आयुर्वेद-चिकित्सा की ओर विश्व की आशाभरी दृष्टि लगी हुई है। इस दिशा में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आयुर्वेद के द्रव्यों के महत्त्व को स्वीकार करते हुए योजनाबद्ध अनुसन्धान कार्य करने की अपनी संस्तुति प्रदान की है।
आयुर्वेदीय द्रव्यों पर पृथक् रूप से लिखा गया क्रमबद्ध यह प्रथम उपलब्ध प्रन्य ‘धन्वन्तरिनिघण्टु’ लगभग १०वीं सदी के बाद का है। यह ग्रन्थ मूलतः संस्कृत भाषा में रचा गया था, अतः संस्कृत साहित्य के प्रबुद्ध चिकित्सक ही इसमें निहित ज्ञान से लाभान्वित हो पाते थे। कालक्रम से आयुर्वेद-शिक्षा में हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा का प्रचलन प्रारम्भ हुआ। जो वैज्ञानिक संस्कृत भाषा में विज्ञ नहीं हैं, उन्हें इस ग्रंथ के अनुशीलन में कठिनाई प्रतीत होती थी । अतः इसकी हिन्दी व्याख्या तथा द्रव्यों के वैज्ञानिक नामों, प्रयोगों आदि का उल्लेख हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा में करना आवश्यक हो गया था, जिससे चिकित्साशास्त्र में सन्नद्ध शोधछात्रों, वैज्ञानिकों एवं अध्यापकों को अपने कार्य में सरलता हो सके ।
निघण्टुओं को ‘वैदिक कोष’ या निरुक्त भी कहा गया है। आयुर्वेद में अभिव्यक्त औषधियों के पर्याय और गुणों का जो वर्णन करे, उसे भी निघण्ट कहा जाता है। जिस प्रकार कूप से इच्छित जल की प्राप्ति कर पिपासु लोग आवश्यकतानुसार जल ग्रहण कर तृप्त होते हैं, उसी प्रकार निघण्ट रूपी कूप से चिकित्सक वर्ग द्रव्यों के ज्ञान से लाभान्वित हों यही धन्वन्तरिनिघण्टु का प्रयोजन है।
आयुर्वेदीय द्रव्यों का वर्गीकरण, पर्यायों के माध्यम से उनका परिचय तथा गुणधर्मों के उल्लेख की वैज्ञानिकता इस ग्रंथ की अपनी मौलिकता है। इस साहित्य के सम्पादक प्राचीन ज्ञान को आधुनिक सम्बन्धित ज्ञान से जोड़ने में सफल हुए हैं।
Reviews
There are no reviews yet.