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दक्षिण पूर्वी और दक्षिणी एशिया में भारतीय संस्कृति Dakshin Purvi aur Dakshini Asia mein Bharatiya Sanskriti
₹560.00
| AUTHOR: | Satyaketu Vidyalankar (सत्यकेतु विद्यालंकार) |
| SUBJECT: | Dakshin Purvi aur Dakshini Asia mein Bharatiya Sanskriti | दक्षिण पूर्वी और दक्षिणी एशिया में भारतीय संस्कृति |
| CATEGORY: | History |
| LANGUAGE: | Hindi |
| EDITION: | 2024 |
| PAGES: | 312 |
| BINDING: | Hardcover |
| WEIGHT: | 457 g. |
प्रस्तावना
जहाँ तक धर्म, भाषा और संस्कृति का सम्बन्ध है, अब से कुछ सदी पहले तक दक्षिण-पूर्वी और दक्षिणी एशिया के प्रायः सभी देश भारत के उसी प्रकार से अंग थे, जैसे कि सौराष्ट्र, बंग, कलिङ्ग और पाण्डय आदि थे। इन्डोनीसिया, मलायीसिया, कम्बोडिया, विएत-नाम और सियाम आदि में भारतीयों ने अपने अनेक उपनिवेश स्थापित किये थे और वहाँ के पूर्व-निवासियों को अपने धर्म में दीक्षित कर भारतीय संस्कृति के रंग में रंग लिया था।
इन देशों के राजाबों के नाम प्रायः भारतीय थे, अपने राज्य के कार्यों के लिये वे प्रधानतया संस्कृत भाषा का प्रयोग करते थे, और अपने शिलालेखों को ब्राह्मी तथा अन्य भारतीय लिपियों में उत्कीर्ण कराते थे। संस्कृत के सैकड़ों शिलालेख इन देशों से उपलब्ध हुए हैं। इन देशों के प्रायः सभी निवासी शैव, वैष्णव आदि भारतीय धर्मों के अनुयायी थे, और वहाँ बहुत-से ऐसे मठ और आश्रम विद्यमान थे जिनमें वैदिक, पौराणिक तथा बौद्ध साहित्य का पठन-पाठन हुआ करता था।
कितने ही मन्दिर, विहार, चैत्य, स्तूप आदि भी इन देशों के राजाओं तथा सम्भ्रान्त लोगों द्वारा बनवाये गये थे, जिनमें शिव, विष्णु, ब्रह्मा, गणेश, बुद्ध, बोधिसत्त्व आदि की मूर्तियाँ प्रतिष्ठापित थीं। इन मन्दिरों व स्तूपों आदि के भग्नावशेष बड़ी संख्या में आज भी इन देशों में विद्यमान हैं। कुछ मन्दिर तो अब तक भी सुरक्षित दशा में हैं। दक्षिण-पूर्वी एशिया का इन्डोनीसिया देश पहले हालैण्ड के अधीन था, और इन्डोचायना (कम्बोडिया, लाओस और विएत-नाम) फ्रांस के।
इस दशा में इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास की खोज का कार्य मुख्यतया डच और फ्रेञ्च विद्वानों द्वारा किया गया, और उसका परिचय प्राप्त करने के लिये इन्हीं देशों की पुस्तकों पर निर्भर रहना पड़ता है। ये पुस्तकें अंग्रेजी में न होकर डच और फ्रेंच भाषाओं में हैं। यही कारण है, जो हमारे भारतीय पाठकों को अपने देश के धर्म तथा संस्कृति के अन्य देशों में प्रसार के इस गौरवमय इतिहास के सम्बन्ध में समुचित जानकारी नहीं हो सकी है। गत वर्षों में इस सम्बन्ध में अंग्रेजी में कुछ पुस्तकें प्रकाशित हुई है, पर हिन्दी में अभी इस विषय के साहित्य की बहुत कमी है।
मैंने यत्न किया है, कि दक्षिण-पूर्वी और दक्षिणी एशिया के प्रदेशों में भारतीय संस्कृति के प्रसार का वृत्तान्त सरल एवं सुपाठ्य रूप में प्रस्तुत करूं। मुझे आशा है, पाठक इस पुस्तक को उपयोगी पायेगे और इस द्वारा भारत के साँस्कृतिक इतिहास के एक गौरव-पूर्ण एवं विस्मृत अध्याय के विषय में कुछ जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।
-सत्यकेतु विद्यालंकार
| Weight | 457 g |
|---|---|
| Author | Satyaketu Vidyalankar |
| Language | Hindi |

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