बुढ़ापे से जवानी की ओर | Budhape se Javani ki Aur

Original price was: ₹300.00.Current price is: ₹255.00.

Book Details:
  • Author: Dr. Satyavrat Siddhantalankar
  • Language: Hindi
  • Pages: 288
  • Edition: 2023
  • Cover: Hard Cover
  • ISBN: 9788170772958
  • Weight: 440 Gms.
Description

बुढ़ापे से जवानी की ओर (Budhape se Javani ki Aur)
बुढ़ापे से जवानी की ओर पुस्तक के विषय में दो शब्द

यह पुस्तक एक ऐसी पुस्तक के आधार पर लिखी गई है जो हजारों रुपया खर्च कर देने पर भी दुर्लभ थी। आज से 350 वर्ष पहले फ्रांस में एक महिला हुई जिनका नाम था मदाम डि लेनक्लोस निनोन। वे 91 वर्ष की होकर मरीं। जब वे 72 वर्ष की थीं तब उनके चेहरे पर एक भी झुर्री नहीं पड़ी थी, गले में एक भी बल या झोल नहीं था। जब वे 85 वर्ष की हो गईं तब भी उनका स्वास्थ्य इतना उत्तम तथा चेहरा इतना यौवन-सम्पन्न था कि फ्रांस के बादशाह लुई 14वें ने कहा कि वे उनके राज्य का एक चमत्कार थीं।

वे 91 वर्ष तक कैसे युवा-सम बनी रहीं- इस संबंध में 1710 में फ्रांस के ग्रंथ-लेखक जीन सौवल ने एक पुस्तिका प्रकाशित की थी जिसमें उन प्रयोगों तथा व्यायामों का उल्लेख था जो उनके युवा-सम स्वास्थ्य का कारण थे। इन प्रयोगों को आधार बनाकर सैन फ्रांसिस्को के श्री सैनफोर्ड बेनेट ने 1889 में 50 वर्ष की आयु में अपने ऊपर परीक्षण किये।

श्री बेनेट के 72 वर्ष तथा 50 वर्ष की आयु के चित्रों को देखकर ऐसा लगता है कि 50 वर्ष की आयु में वे वृद्ध थे, 72 वर्ष की आयु में इन प्रयोगों के कारण वे युवा-सम हो गये। उन्होंने 1912 में एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम था- ‘Old Age-Its Causes and Prevention’ इस पुस्तक में उन्होंने मदाम निनोन के प्रयोगों तथा उनके आधार पर किये गये अपने परीक्षणों का विस्तृत वर्णन दिया था। यह पुस्तक भी अब अप्राप्य है- भारत में इसकी एक ही प्रति उपलब्ध थी।

जिसे प्राप्त कर उसके आधार पर हमने अपने इस ग्रंथ की रचना की है। हम इस पुस्तक में फ्रांस की मदाम निनोन, सैन फ्रांसिस्को के सैनफोर्ड बेनेट तथा इन प्रयोगों से लाभ उठानेवाली एक महिला के चित्र दे रहे हैं जिनसे स्पष्ट है कि इस पुस्तक में जो कुछ लिखा गया है उसे नियमपूर्वक क्रिया में परिणत किया जाय, तो मनुष्य वृद्धावस्था में युवावस्था का-सा सुखद स्वास्थ्य तथा चेहरा-मोहरा कायम रख सकता है-इसीलिए हमने इस पुस्तक का नाम रखा है- ‘बुढ़ापे से जवानी की ओर’।

आजकल यौवन बनाये रखने के लिये अंग्रेजी में अनेक पुस्तकें लिखी गई हैं जिनमें से गेलार्ड हाउसर की ‘Treasury of Secrets’ तथा मैक केन्ना की ‘Revitalize Yourself प्रसिद्ध हैं। इस पुस्तक में इन तथा अनेक पुस्तकों से भी उपयोगी सामग्री ली गई है।

इस विषय की पुस्तकों में जो कुछ लिखा है वह सब तो इस पुस्तक में सार रूप से आ ही गया है, इसके अतिरिक्त जिन प्रयोगों का इस पुस्तक में वर्णन है उनका वैज्ञानिक-विवेचन भी इसमें किया गया है। जब किसी प्रयोग का वैज्ञानिक आधार समझ में आ जाये, तब हम अन्य किसी प्रेरणा के बिना उसे करने में अपने-आप तत्पर हो जाते हैं- इसी कारण इसमें हर बात को वैज्ञानिक दृष्टि से समझाया गया है। दीर्घ जीवन का वैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन करने के साथ-साथ दीर्घ-जीवन की आसन, प्राणायाम, ब्रह्मचर्य आदि भारतीय पद्धतियों का विवरण भी हमने दिया है।

एक-दो आसनों को छोड़कर अन्य पुस्तकों में जो पचासों आसन दिए जाते हैं, उनकी उपयोगिता, अगर कोई पहलवान बनना चाहे, या आसनों का ही प्रकांड पंडित होना चाहे, तब तो बात दूसरी है, परंतु अगर स्वस्थ जीवन बिताना हो, अनिवार्य-वृद्धावस्था में यौवन-सम जीना हो, तो सुखद जीवन के लिये जो कुछ हमें चाहिये वह सब इस पुस्तक में दे दिया गया है। जो लोग वृद्धावस्था में कदम रख चुके या रखने वाले हैं उन्हें दो-चार आसन जिनका इस पुस्तक में वर्णन है पर्याप्त हैं, उन्हें सब आसनों के चक्कर में पड़ने की जरूरत नहीं।

मृत्यु तो हर किसी को आती है, वृद्धावस्था का आना भी स्वाभाविक है, परंतु इसके बजाय कि बुढ़ापा एक भूत बनकर सिर पर आ चढ़े और हम-हाय बुढ़ापा, हाय बुढ़ापा का राग अलापने लगें, हम ऐसा जीवन कैसे बिता सकते हैं जिससे बुढ़ापे के आने पर भी बुढ़ापा न आया-सा प्रतीत हो, मनुष्य बूढ़ा होता हुआ भी युवा-सम जीवन व्यतीत करे- इस उपाय को सामने रख देना इस पुस्तक का मुख्य लक्ष्य है।

इस पुस्तक का अध्ययन वृद्ध व्यक्तियों के लिये जितना लाभप्रद है उससे ज्यादा उन व्यक्तियों के लिये उपयोगी है जो अभी वृद्धावस्था में नहीं पहुँचे। बीमार होकर दवा खाने की अपेक्षा बीमारी से पहले ही होशियार हो जाना बुद्धिमानी है।

पुस्तक में जिन प्रयोगों का उल्लेख किया गया है उनसे लेखक को लाभ पहुँचा है और उन्हीं प्रयोगों को नित्य-प्रति करने के कारण वह 79वें वर्ष में प्रवेश करने पर भी अपने को सर्वथा स्वस्थ पाता है। अगर इन प्रयोगों के आधारभूत सिद्धान्तों को समझ लिया जाये, तो प्रत्येक व्यक्ति अपनी सुविधानुसार इनमें हेर-फेर भी कर सकता है, उसे हर प्रकार के उलट-पलट आसनों को करने की जरूरत नहीं रहती।

इस पुस्तक की यह भी विशेषता है कि इसमें वृद्धावस्था की अनेक शारीरिक-समस्याओं के लिए होम्योपैथिक उपचार का भी निर्देश दिया गया है।

– डॉ. सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार

Reviews (0)

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “बुढ़ापे से जवानी की ओर | Budhape se Javani ki Aur”

Your email address will not be published. Required fields are marked *


About Dr. Satyavrat Siddhantalankar
प्रो० सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार (Dr. Satyavrat Siddhantalankar) ने लगभग 40 विशाल ग्रन्थों की रचना की। ये पुस्तकें शिक्षा, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, सामाजिक चिन्तन, उपनिषद, संस्कार, वैदिक विचार, गीता, होम्योपैथी आदि विविध विषयों पर आधारित हैं। कुछ ग्रन्थ हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध हैं। एक बार मोरारजी देसाई ने उनकी पुस्तकों को देखकर आश्चर्यपूर्वक कहा था-'क्या आपने एक पुस्तकालय ही लिख डाला है?' उनका जन्म 5 मार्च 1898 को लुधियाना में हुआ। मात्र 7 वर्ष की आयु में उनका प्रवेश गुरुकुल काङ्गड़ी में हुआ। उन्होंने वहीं से 'सिद्धान्तालंकार' की उपाधि विशिष्ट श्रेणी में प्राप्त की और आगे चलकर उसी संस्थान में प्राध्यापक तथा कुलपति बने। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती चंद्रावती भी एक शिक्षाविद थीं। दोनों ही स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय रहे और कारावास का कष्ट सहा। दोनों को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया तथा अपने लेखन कार्य के लिए अनेक सम्मानों से अलंकृत किया गया। उनका दीर्घ कार्यकाल उच्च उपलब्धियों से परिपूर्ण रहा।
Shipping & Delivery