ब्राह्मण की गौ Brahman Ki Gau
₹150.00
- Author: Acharya Abhaydev Vidyalankar
- Language: Hindi
- Pages: 372
- Edition: 2015
- Cover: Paperback
- ISBN: 9788170771387
- Weight: 410 Gms.
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ब्राह्मण की गो अर्थात ब्राह्मण की वाणी
पर्याप्त समय से अनुपलब्ध इस ग्रन्थ में सम्मिलित है-अथर्ववेद के ब्रह्मगवी सूक्त व ब्रह्मचर्य सूक्त की अत्यन्त रोचक व मार्मिक व्याख्या तथा वैदिक निबन्धों का संग्रह।
आचार्य अभयदेव विद्यालंकार (वैदिक विनय के लेखक)
प्रस्तावना
आप स्वाध्याय प्रेमी सज्जनों की सेवा में अथर्ववेद का यह ब्रह्मगवी सूक्त (पंचम काण्ड का अठारहवाँ सूक्त) स्वाध्याय के लिए समर्पित है। इस सूक्त में एक महाबली प्रजा-द्रोही राजा के मुकाबले में एक बेचारे ब्राह्मण की गरीब सी वाणी को दिखाया है जिसमें कि अन्त में इस ‘ब्राह्मण-वाणी’ की ही अनायास विजय होती है। ईश्वर शासित इस संसार में यह घटना कोई नई नहीं है। ऐसा सदा ही होता है। यह सनातन सत्य है। पर हम इसे देखते हुए भी नहीं देखते।
इस सत्य का दर्शन हमें कौन करवाये ? भारतवर्ष की रज-कण से उत्पन्न हुई हम सन्तानों में, जिनमें कि वैदिक सभ्यता चिरकाल तक कभी पूर्ण यौवन में विकसित रही है, यदि वेद का यह सुन्दर ओजस्वी सूक्त गीत इस सत्य को सुझाने में सहायक हो तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं है।
यह वैदिक सूक्त तो राजा-प्रजा दोनों के लिए है। इस सूक्त के सार्वभौम, सार्वदेशिक उपदेश को यदि दोनों (राजा और प्रजा) सुनें, स्वीकार करें तो निस्सन्देह दोनों का इसमें कल्याण होगा।
पर हम प्रजाजनों को तो इस सूक्त से अपने लिए उपदेश लेना ही चाहिए। इसमें सन्देह नहीं कि यदि हम इस सूक्त में सुझाई गई सचाई को स्वीकार कर लें तो मरे हुए, दबे हुए, बिलकुल हताश हुए हम भारतवासियों में नये प्राण का संचार हो जाए इसमें हमारे लिए आशा का, आत्मविश्वास का सन्देश है। यदि हम इसे सुन लें तो अन्याय की भयंकर चतुरंगिणी फौज से चारों तरफ घिरे हुए भी बेशक हम हों तो भी – ‘अद्य जीवानि मा श्वः’
‘अन्याय आज बेशक जीवित है, पर कल नहीं’ इस अटल श्रद्धा के कारण इस दशा में भी निर्भीक और निश्चिन्त होकर अपने मार्ग में चलते चले जाएँ। इस सूक्त के आठवें मन्त्र में जिस दिव्य अस्त्र का वर्णन है और जिसे नौवें मन्त्र में अमोघ अस्त्र कहा है, यदि हम सचमुच पूरे दिल से उस अस्त्र को ग्रहण कर लें तो हमें कौन दुनिया में नीचा रख सकता है? हम धनुष बाण (तोप-बन्दूक) को ही हथियार समझते हैं और इनके अभाव को देखकर दुःखी होते हैं, पर तब हमें पता लग जाय कि हमारा असली बल, हमारा असली शस्त्र सदा हमारे पास है। उसके सामने तोप-बन्दूक बिलकुल हेय हैं, ये बेकार पड़ी रह जाती हैं।
ईश्वर करे कि इस सूक्त का अध्ययन हम असहायों में हमारे असली बल को अनुभव करा दे, हमारे हाथों में हमारा सच्चा अमोघ अस्त्र पकड़ा दे।
-‘ अभय’
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