ब्रह्मचर्य विज्ञान Brahmacharya Vigyan
₹200.00
- Author: Jagannarayandev Sharma
- Language: Hindi
- Publication: Aarsh Sahitya Prakashan
- Pages: 208
- Edition: 2024
- Cover: Paperback
- Weight: 245 Gms.
सम्पादकीय
ब्रह्मचर्य ही जीवन है, अब्रह्मचर्य मृत्यु है
प्राचीन भारतीय संस्कृति और जीवन पद्धति जिन व्यवस्थाओं पर टिकी हुई है उनमें ‘ ब्रह्मचर्य’ सर्वप्रथम और सब से महत्त्वपूर्ण आधार है। यह समझिए कि ब्रह्मचर्य वह नींव है जिस पर वैदिक संस्कृति का वैभवशाली महल स्थित है। और ब्रह्मचर्य वह प्राणशक्ति है जिस से स्वस्थ जीवन संचालित रहता है, स्वस्थ मन उत्प्रेरित होता है।
ब्रह्मचर्य ही जीवन है, शक्ति है
ब्रह्मचर्य व्यापक अर्थ में ब्रह्मचर्य नामक आश्रम का बोधक है, जिस आश्रम का पालन कर के बालक और बालिकाएँ विद्या तथा शरीर बल का संचय करते हैं। ब्रह्म का अर्थ ईश्वर, वेद और तेज हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम में इन्हीं गुणों का संचय किया जाता है और जीवन को समर्थ बनाया जाता है। विशेषार्थ में ब्रह्मचर्य का अर्थ है- वीर्य की रक्षा करके उसे जीवन की ओज धातु के रूप में परिणत करना। यही ओज धातु प्राणशक्ति, चेतना, आयु तेज और सक्रियता की जननी है। योगदर्शन में महर्षि पतंजलि ने पाँच यमों में ब्रह्मचर्य को स्वीकार कर के उसे योगसाधना का अंग माना है। ब्रह्मचर्य की सिद्धि का लाभ दर्शाते हुए वे लिखतें हैं-
ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥ २.३८ ॥
अर्थात् – ब्रह्मचर्य की सिद्धि कर लेने से वीर्य का लाभ होता है। वीर्य का अर्थ है-बल या तेज। वीर्य से शारीरिक तथा आत्मिक बल की वृद्धि होती है। ब्रह्मचर्य हीन व्यक्ति निस्तेज, निर्बल और कमजोर आत्मा का होता है।
वीर्य ही वह शक्ति है जिससे शरीर में बल का संचार होता है और आत्मिक बल का विकास होता है। वीर्यहीन व्यक्ति जहाँ अनेक शारीरिक रोगों से आक्रान्त रहता है वहीं इच्छाशक्ति के अभाव रूप मानसिक रोग से ग्रस्त रहता है। दुर्बल मानस का व्यक्ति मानसिक रोगों से पीड़ित रहता है। वह किसी भी प्रकार का दृढ़ निश्चय नहीं कर पाता। सबल मानस का व्यक्ति साधारण भयों से तो घबराता ही नहीं, वह मृत्यु जैसे महाभय को भी पराजित कर देता है। अथर्ववेद ने ब्रह्मचर्य के इस महत्त्व पर ओजस्वी वाणी में प्रकाश डाला है-
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत।
इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वराभरत् ॥ – अथर्ववेद ॥
अर्थात् – ‘ब्रह्मचर्य की साधना के बल से विद्वानों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की है। निश्चय ही परमात्मा ने ब्रह्मचर्य के द्वारा देवताओं के लिए दिव्य धन प्राप्त कराया है।’
संसार में कोई धन ऐसा नहीं है जिस से मृत्यु को वश में किया जा सके ओर जीवन को खरीदा जा सके। वह ब्रह्मचर्य रूपी अद्भुत धन ही है जिस से जीवन शक्ति को खरीदा जा सकता है, आयु को खरीदा जा सकता है, स्वास्थ्य को खरीदा जा सकता है अर्थात् इनमें वृद्धि की जा सकती है।
दुनिया में ऐसा अनमोल धन अन्य कोई नहीं है। इसीलिए वेद कहता है कि देवताओं-विद्वानों ने ब्रह्मचर्य के द्वारा मृत्यु को पराजित कर दिया, शीघ्र मृत्यु को निकट नहीं आने दिया। सचमुच जो वीर्य की रक्षा कर अपने जीवन को बढ़ाते हैं, आयु को बढ़ाते हैं, बल और तेज को बढ़ाते हैं, वे विद्वान् हैं और जो वीर्यनाश कर के जीवन का नाश करते हैं व अज्ञानी हैं, अविद्वान्, मूर्ख हैं।
ऐसे ही एक ब्रह्मचारी थे भीष्म पितामह। उन्होंने मृत्यु को भगा दिया, पराजित कर दिया। बाणों से घायल होकर शरशय्या पर पड़े थे, सारा शरीर क्षत-विक्षत, लहू-लुहान था। मौत उन्हें निगलने के लिए निकट मंडरा रही थी किन्तु उस आजन्म ब्रह्मचारी ने उसको फटकारते हुए कहा-जाओ, भाग जाओ, उत्तरायण से पहले प्राण नहीं छोडूंगा। जब सूर्य उत्तरायण में पहुँचा तब इच्छामृत्यु से प्राण त्यागे। इसे कहते हैं मृत्यु की पराजय और ब्रह्मचर्य की विजय !
ऋषि दयानन्द भी आदित्य ब्रह्मचारी थे। विद्वान् थे, सदाचारी थे। लोकोपकार करते हुए अज्ञानी लोगों ने सत्रह बार विष दिया जिससे वह मृत्यु के मुख में चला जाये। किन्तु ब्रह्मचर्य के बल से हर बार मृत्यु को भगा दिया। जब जीवन का आधार यह शरीर ही विष से फूट-फूटकर छलनी हो गया तो स्वेच्छा से दीपावली के दिन प्राण त्यागे। इसलिए वेद सन्देश दे रहा है कि यदि मृत्यु को वश में कर के चिर जीवन चाहते हो तो ब्रह्मचर्य का पालन करो, ब्रह्मचर्य का पालन करो। इस प्रकार वेदों से ही हमें ब्रह्मचर्य के महत्त्व का वर्णन मिलता है। इसकी पुष्टि महर्षि मनु भी करते हैं-
सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान् नरः ।
श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ – मनु० ४.१५८ ॥ अर्थात् – जो मनुष्य सदाचार का पालन करने वाला है और ब्रह्मचर्य पर सच्ची श्रद्धा रखता है तथा ईर्ष्या-द्वेष से रहित है, वह अन्य शुभ गुणों से रहित होते हुए भी कम से कम सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है। इस प्रकार आयु का आधार सदाचार है, और सदाचार का आधार ब्रह्मचर्य।
इस प्रकार स्मृतियों का भी सन्देश है कि हे मनुष्य ! यदि तू दीर्घ आयु चाहता है तो ब्रह्मचर्य का पालन कर। स्वस्थ चिर जीवन चाहता है तो ब्रह्मचर्य का पालन कर क्योंकि ब्रह्मचर्य ही जीवन है।
वीर्यनाश मुत्यु है : वैज्ञानिक प्रमाण
संस्कृत साहित में पदे-पदे ब्रह्मचर्य पालन का सन्देश दिया है और वीर्यनाश से सावधान किया है। वैदिक तथा लौकिक संस्कृत साहित्य में ऐसी अनेक उक्तियाँ मिलती हैं। ‘यत् शुक्रं तत् ब्रह्म’ जो वीर्य है वही तेज है, ‘ब्रह्मचर्यं परं बलम्’- ब्रह्मचर्य ही उत्तम बल का आधार है, ‘ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम्’- ब्रह्मचर्य सर्वोत्तम तप है, ‘मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात्’ वीर्य के एक-एक बिन्दु का क्षय मृत्यु की ओर ले जाता है और एक-एक बिन्दु का धारण जीवन की ओर। इन सार वाक्यों या चेतावनियों में ब्रह्मचर्य के महत्त्व का सार निहित है, उसका मूल्य वर्णित है।
आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान की खोजों ने इन सार वाक्यों को सच्चाई के धरातल पर ला खड़ा किया है। वीर्यनाश के साथ मृत्यु का सम्बन्ध कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में है, इस का ज्ञान और परीक्षण क्षुद्र कीट-पतंगों से प्राप्त होता है।
पाश्चात्य कीटविज्ञानी विजमन तथा गेटे ने कीटों पर शोध कर के यह बतलाया है कि कुछ कीट प्रजनन क्रिया करने के उपरान्त अर्थात् उनके वीर्य-कीटाणु के नष्ट होने के बाद वे मर जाते हैं। नर मकड़ा सम्भोग के बाद मर जाता है। शहद की मक्खियाँ और तितलियों में भी यही दुष्परिणाम पाया जाता है। ऐसे और भी अनेक कीट प्रजातियाँ है जिनमें सम्भोग का परिणाम मृत्यु होता है। बड़े पक्षियों, पशुओं और मनुष्यों में यह परिणाम तत्काल तो नहीं होता किन्तु कीटों की मृत्यु इस बात की ओर संकेत अवश्य करती है कि वीर्यनाश का सम्बन्ध कहीं न कहीं मृत्यु से जुड़ा हुआ है और यह परिणाम कभी देर-सबेर, तो कभी तत्काल, सभी प्राणियों को भुगतना पड़ता है।
शरीर विज्ञानियों का कहना है कि शरीर-विज्ञान की दृष्टि से वीर्यनाश या सम्भोग के समय शरीर को दो हानिकारक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है-एक, सम्पूर्ण शरीर और मन में तनाव, दूसरा, संचित वीर्य धातु का हास और उससे उत्पन्न कमजोरी, थकान आदि। इन्हीं का परिणाम प्राणियों को कई बार बेहोशी, उल्टी, चक्कर, मृत्यु के रूप में भुगतना पड़ता है।
पाश्चात्य वैज्ञानिक हैवलॉक एलिस लिखते हैं- ‘वीर्यनाश में ज्ञान तन्तुओं का जो तनाव होता है और उससे शरीर को जो धक्का पहुँचता है, वह इतना भयंकर होता है कि उस के बाद अनुभव होने वाले दुष्परिणामों का होना सर्वथा स्वाभाविक है।
पशुओं में यहाँ तक देखने में आया है कि प्रथम सम्भोग के बाद बड़े-बड़े सांड और घोड़े बेहोश होकर गिर जाते हैं, घोड़ियाँ गिर कर मृत्यु को प्राप्त हो जाती हैं, सूआर संज्ञाहीन हो जाते है।….. नवयुवकों में प्रथम समागम के उपरान्त बेहोशी, कै आदि की शिकायत होती है, कई बार मिरगी आ जाती है, रुधिर के दबाव को न सह सकने के कारण कई लोगों के दिमाग की नसें फट जाती हैं, अर्धांग भी हो जाता है।’
– एरोटिक सिम्बोलिज्म, पृ०१६८ ।
इन प्रतिक्रियाओं से यह परिणाम सामने आता है कि वीर्यनाश की प्रक्रिया शारीरिक स्वास्थ्य अथव मानसिक स्वास्थ्य के ह्रास और बलहीनता से जुड़ी हुई है, जीवन के ह्रास से जुड़ी हुई है। यह प्रक्रिया किन्हीं प्राणियों में तत्काल होती है, किन्हीं में धीमे-धीमे ।
वीर्यनाश से शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य की हानि का अन्योन्य सम्बन्ध हमारा शरीर विज्ञान भी बताता है। जितना वीर्यनाश होता है उतनी ही शारीरिक और मानसिक शिथिलता बढ़ती जाती है और शरीर में रोग, बुढ़ापा आदि से जितनी शिथिलता आती जाती है उतनी ही वीर्य-निर्माण की प्रक्रिया अल्प होती जाती है और समागम की इच्छा भी समाप्त होती जाती है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि किसी न किसी स्तर पर वीर्यनाश और शिथिलता या ह्रास परस्पर जुड़े हुए हैं। इसीलिए प्राचीन भारतीय चिन्तकों ने यह सूक्ति उद्घोषित की है-
ब्रह्मचर्य ही जीवन है, वीर्यनाश मृत्यु है।
इस पुस्तक का प्रकाशन मैंने आज की पीढ़ी के लोगों, विशेषतः नवयुवकों को अपने-पुराने जीवनदायक सन्देश देने के लिए किया है। पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध ने हमारे मनों में अनेक भ्रम पैदा कर के हमारी युवक पीढ़ी को भोगी-विलासी बना दिया है। उस के दुष्परिणाम तन-मन सम्बन्धी रोगों की वृद्धि के रूप में सामने आ रहे हैं। मैं समझता हूँ कि पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर फैलते भौतिकवाद और भोगवाद को देखते हुए ब्रह्मचर्य सम्बन्धी साहित्य की आज की पीढ़ियों को महती आवश्यकता है।
यदि पाठक इस पुस्तक को पढ़कर अपने तन-मन-जीवन की रक्षा करने का निश्चय करेंगे तो मैं इस प्रकाशन का सफल समझेंगा।
माता-पिताओं से भी मेरा निवेदन है कि वे इस पुस्तक को स्वयं पढ़ें जिस से वे अपने बच्चों को ब्रह्मचर्य के महत्त्व को समझा सकें और अपने बच्चों को पढ़ायें जिससे उनके ब्रह्मचर्य के प्रति आस्था के संस्कार बन सकें। आज चारों ओर जो ब्रह्मचर्य विनाशक वातावरण और संस्कार पनप रहे हैं, उनके जाल से ये पुस्तकें ही युवक-युवतियों की रक्षा कर सकती हैं।
– आचार्य सत्यानन्द ‘नैष्ठिक’
सम्पादक
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