ब्रह्मचर्य दुःख निवारक दिव्य मणि (स्वामी रामस्वरूप योगाचार्य) | Brahmacharya Dukh Nivarak Divya Mani – by Swami Ramswaroop Yogacharya
₹300.00
- Author: Swami Ramswaroop Yogacharya
- Language: Hindi
- Pages: 171
- Edition: 2021
- Cover: Hard Cover
- ISBN: 9789380698434
- Weight: 350 Gms.
ब्रह्मचर्य दुःख निवारक दिव्य मणि (स्वामी रामस्वरूप योगाचार्य)
Brahmacharya Dukh Nivarak Divya Mani – by Swami Ramswaroop Yogacharya
भूमिका
“ब्रह्मचर्य-दुःख निवारक दिव्य मणि” नामक इस पुस्तक का प्रारम्भ, स्वाभाविक ही है कि ईश्वर स्तुति (गुणगान), उपासना एवं प्रार्थना से होना चाहिए। अतः मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ-
“ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव।
यद्भद्रं तन्न आसुव ।।
(यजु. ३०/३)
अर्थात् हे सर्वसमर्थ परमेश्वर ! हमारी समस्त बुराइयों को हमसे दूर कर दें और जो-जो अच्छाइयाँ हैं, वे हमें प्राप्त करा दें।
वेद भी कहता है कि सर्वप्रथम ईश्वर की सामर्थ्य से पृथ्वी पर अग्नि ऋषि के हृदय में ज्ञानकाण्ड से भरपूर ऋग्वेद के मन्त्र उत्पन्न हुए थे। ऋग्वेद का प्रथम ही मन्त्र है-
“अग्निमीव्ळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।
होतारं रत्नधातमम्।।”
अर्थात् जिज्ञासु कहता है कि मैं संसार की पुरियों का हित करने वाले, यज्ञ का ज्ञान देने वाले, संसार के पदार्थ एवं दिव्य गुणों को देने वाले, प्रत्येक ऋतु में पूजा के योग्य और सब प्रकार से हम सबको धन-रत्न आदि पदार्थ देने वाले ईश्वर को प्राप्त करने की इच्छा करता हूँ। मन्त्र में अग्नि शब्द “अग-अग्रिणि” धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है जो सत्ता सबसे पहले है अर्थात् सृष्टि से पहले स्वयंभू, जीता-जागता ईश्वर ही होता है।
अग्नि का दूसरा अर्थ है-‘अञ्चु गतिपूजनयोः’ अर्थात् जो सर्वप्रथम पूजनीय है। उस ईश्वर का नाम अग्नि है। अतः इस पुस्तक के प्रारम्भ में हम उस एक ईश्वर को बार-बार नमन करते हैं। वह हमें शक्ति दे कि जगत कल्याण के लिए उस कल्याणकारी ईश्वर की वाणी को ही प्रवचन/ पुस्तक के रूप में प्रसारित करते रहें।
यह तथ्य सर्वविदित है कि सब जगत का स्वामी केवल एक ही ईश्वर है। श्वेताश्वतरोपनिषद् ६/८ में कहा-
“न तस्य कार्य करणं च विद्यते
न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते
स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥”
अर्थात् उस एक ईश्वर के न तो कोई समान है और न ही कोई उस एक ईश्वर से अधिक हो सकता है। अथर्ववेद काण्ड १३, सूक्त ४ के मन्त्र १६-२१ का भाव है कि परमेश्वर एक ही है, उससे भिन्न दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवा, छटा, सातवाँ, आठवाँ, नौवाँ और दशमा कोई ईश्वर नहीं है।
यजुर्वेद मन्त्र २७/३६ ने भी स्पष्ट किया है-
“न त्वावाँऽअन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते।
अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे ।।”
अर्थात् उस एक ईश्वर के समान न कोई आज तक पैदा हुआ है और न भविष्य में कोई पैदा होगा।
इसी एक ईश्वर की हम सदा उपासना करें। वेद ने ईश्वर उपासना में मुख्य उपदेश ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना ही कहा है। प्राचीनकाल में जब बालक और बालिका उपनयन संस्कार एवं वेदारम्भ संस्कार के लिए गुरु के पास जाते थे तब आचार्य अथर्ववेद मन्त्र १/३५/१ के अनुसार उन्हें सर्वप्रथम ब्रह्मचर्य धारण करने की शिक्षा ही देते थे। ब्रह्मचर्य धारण करने से ही पुत्र-पुत्रियों में पराक्रम-शक्ति, मानसिक एवं शारीरिक ऊर्जा उत्पन्न होती है
जिसके फलस्वरूप वह बिना थके कठोर तप एंव परिश्रम करने में समर्थ होते हैं। आज की भौतिक चमक-दमक में, सिनेमा, टी.वी., फैशन, अश्लील संगीत आदि के वातावरण में जो विद्यार्थी, पुत्र-पुत्रियाँ, नर-नारी इन्द्रियों का रस लेने व भौतिकवाद की ओर खिंचे जा रहे हैं और ब्रह्मचर्य व्रत से हीन हो जाते हैं, वह स्वयं के पैरों पर कुल्हाड़ी मारकर मनुष्य का जन्म दुःखों से भरकर गरीबी, मानसिक तनाव, शारीरिक दुर्बलता, स्मरण शक्तिहीनता आदि अनेक बीमारियों, परेशानियों को प्राप्त होकर अल्पायु में ही मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं।
आशा है इस पुस्तक के अध्ययन से माता-पिता स्वयं गृहस्थ में तथा बेटे-बेटियों को ब्रह्मचर्य आश्रम में ब्रह्मचर्य की शिक्षा देकर, उन्हें दीर्घायु देते हुए, उनके जीवन में सब प्रकार के सुख भर देंगे।
मैं यहाँ यह कहना अवश्य चाहूँगा कि वेद-मन्दिर, योल में साध्वी ऋतम्भरा, प्रज्ञा व गीताञ्जलि कई वर्षों से स्थायी रूप से रहकर वेदाध्ययन, शास्त्र एवं अन्य धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन नित्य प्रातः व सायं अग्निहोत्र/यज्ञ तथा अष्टाङ्ग योग की साधना में रत हैं। और भी इन्होंने यहाँ शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी ग्रहण की है। फलस्वरूप वैदिक प्रवचन एवं भजन द्वारा धार्मिक समारोह, यज्ञानुष्ठान में प्रवचन एवं आध्यात्मिक भजन गाकर वेद-विद्या के प्रचार में अग्रसर हैं। इनके सहयोग से ही मैं आज तक वेद एवं योग-विद्या पर हिन्दी, अंग्रेजी भाषा में व अन्य भाषाओं में ४६ पुस्तकें लिख चुका हूँ।
इस पुस्तक “ब्रह्मचर्य-दुःख निवारक दिव्य मणि” के लिखने में भी इन्होंने दिन-रात अथक कठोर परिश्रम करके अपने जीवन में एक और निःस्वार्थ परोपकारिक शुभ कर्म जोड़ लिया है।
ईश्वर से प्रार्थना है और मेरा आशीर्वाद है कि वेद एवं योग की शिक्षा प्राप्त करने में ये पूर्णतः सफल हों और ईश्वर कृपा से इसी जीवन में उनका मानुष जन्म सफल हो। धन्यवाद ।
ओ३म् शांतिः शांतिः शांतिः।












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