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प्रारम्भिक शब्द
संसार की अनेक प्राचीन सभ्यताएँ इस समय नष्ट हो चुकी हैं। सुमेरिया, असोरिया, बैबिलोनिया के तो अब केवल नाम ही शेष हैं। मिस्र के वर्तमान निवासियों का संस्कृति की दृष्टि से उन प्राचीन लोगों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं, जिन्होंने कि नील नदी की घाटी में गगनचुम्बी विशाल पिरामिडों का निर्माण किया था। प्राचीन ग्रीस और रोम में जो सभ्यताएँ विकसित हुई थीं, वे भी अब नष्ट हो चुकी हैं।
आाज प्राचीन ग्रीक व रोमन धर्मो का कोई अनुयायी नहीं है। पर भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति हजारों साल बीत जाने पर भी अब तक कायम है। भारत के बहुसंख्यक निवासियों का धर्म अब भी वैदिक है। उपनिषदों और गीता ने ज्ञान की जो धारा प्रवाहित की थी, वह आज भी अवाधित रूप से इस देश में बह रही है। बुद्ध और महावीर जैसे महात्मानों ने अहिंसा और प्राणिमात्र के प्रति मैत्री-भावना का जो उपदेश दिया था, वह आज तक भी इस देश में जीवित और जागृत है। इस बीसवीं सदी में भी इस देश की स्त्रियों का आदर्श सीता, सावित्री और पार्वती हैं।
अनेक विदेशी जातियों ने इस देश पर आक्रमण किए। यवन, शक, कुशाण, हूण, तुर्क, अफगान, मुगल और इंगलिश जातियों ने भारत में प्रवेश कर इसके अनेक भागों पर शासन किया। इन सब ने इस देश की संस्कृति को प्रभावित भी किया। पर इन से यहाँ की मूल सांस्कृतिक धारा नष्ट नहीं हुई।
जिस प्रकार अनेक छोटी-छोटी नदियाँ व नाले गंगा में मिलकर उसे अधिक समृद्ध करते जाते हैं, और स्वयं गंगा के ही अंग बन जाते हैं, वैसे ही विविध जातियों ने भारत में प्रवेश कर इस देश की संस्कृति को समृद्ध बनाने में सहायता की, और उनकी अपनी संस्कृतियाँ इस देश की उन्नत व समृद्ध संस्कृति में मिलकर अपनी पृथक् सत्ता खो बैठीं, और यहाँ की संस्कृति के साथ मिलकर एकाकार हो गयीं।
मुसलिम तथा यूरोपियन देशों की पाश्चात्य संस्कृतियों के साथ चिरकाल तक सम्पर्क में रहने के कारण इस देश की प्राचीन संस्कृति पर अनेक प्रकार के प्रभाव पड़े हैं, और ये अन्य संस्कृतियाँ इस देश के निवासियों के धर्म, कला, शिक्षा, रहन-सहन व विचारों आदि पर अपनी अमिट छाप छोड़ गयी हैं।
किसी देश की संस्कृति अपने को धर्म, दार्शनिक चिन्तन, कविता, संगीत, कला, शासन-प्रबन्ध आदि के रूप में अभिव्यक्त करती है। मनुष्य जिस ढंग से अपने धर्म का विकास करता है, दर्शन-शास्त्र के रूप में जो चिन्तन करता है, साहित्य, संगीत और कला का जिस प्रकार से सूजन करता है, और अपने सामूहिक जीवन को हितकर व सुखी बनाने के लिए जिन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संस्थाओं व प्रथाओं को विकसित करता है, उन सब का समावेश हम ‘संस्कृति’ में करते हैं।
इस पुस्तक में मैंने भारतीय इतिहास के इन्हीं अंगों का विशद रूप से विवेचन करने का प्रयत्न किया है। इसे लिखते हुए यद्यपि मैंने भारत के राजनीतिक इतिहास की उपेक्षा की है, पर विषय को स्पष्ट करने के लिये प्रसंगवश संक्षिप्त रूप से उसका उल्लेख भी कर दिया है।
सत्यकेतु विद्यालंकार

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