बड़ों की बड़ी बातें
Badon ki Badi Baten

70.00

Book Details:
  • Author: Rajendra 'Jigyasu'
  • Language: Hindi
  • Pages: 144
  • Edition: 2012
  • Cover: Paperback
  • ISBN: 9789170771269
  • Weight: 168 Gms.
Description

बड़ों की बड़ी बातें
प्राक्कथन

संसार में कहानी सुनाकर सीख देने की परम्परा बहुत पुरानी है। सब देशों में कहानी साहित्य सदा लोकप्रिय रहा है। भारतीय कहानी साहित्य का विश्व साहित्य में एक विशेष स्थान है। पंचतन्त्र व हितोपदेश की संसार के कहानी साहित्य में एक अलग प्रकार की अपनी ही पहचान है।

कहानियों के मुख्य रूप से दो प्रकार देखने को मिलते हैं। 1. ऐतिहासिक घटनायें, 2. कल्पित कहानियाँ अथवा दृष्टान्त।

हमारे देश में दोनों प्रकार के कहानी साहित्य का प्रचलन रहा है। रामायण, महाभारत के ऐतिहासिक पात्रों की कहानियाँ तो हमारे धर्माचार्य व कथावाचक सुनाते ही आ रहे हैं। बच्चों को संस्कारित करने के लिए पंचतन्त्र की कहानियाँ भी लोकप्रिय रही हैं व रहेंगी। महात्मा बुद्ध के उपदेशों (धम्मपद) के दृष्टान्त भी हृदयस्पर्शी हैं।

उन्नीसवीं शताब्दी में आर्यसमाज के साधु महात्माओं व उपदेशकों में स्वामी दर्शनानन्द जी महाराज का दृष्टान्त-सागर (कहानी संग्रह) एक लम्बे समय तक लोकप्रिय रहा। आर्यसमाज के प्रसिद्ध विद्वान् श्री पं० बिहारीलाल जी शास्त्री ने इसी उद्देश्य से एक पुस्तक लिखी।

आर्यसमाज के यशस्वी नेता व संन्यासी स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी के दृष्टान्तों की विधा ही नई थी। वे प्रायः ऐतिहासिक सच्ची घटनायें (Anecdotes) दृष्टान्त के रूप में सुनाया करते थे। वे ऐसी घटनाओं का एक अटूट भण्डार थे परन्तु उनको संग्रहीत न किया गया।

ऐसे ही आर्यसमाज के प्रसिद्ध संन्यासी महात्मा आनन्द स्वामी जी महाराज की दृष्टान्त देने की शैली बड़ी रोचक होती थी। उनकी पुस्तकों में वर्णित दृष्टान्त संग्रहीत करके गोविन्दराम हासानन्द ने एक नई पुस्तक प्रकाशित की है। यह भी लोकप्रिय है।

आर्यसमाज के बहुत से भजनोपदेशक व कथावाचक हँसने हँसाने के दृष्टान्त कहानियों के रसिया होने लगे तो श्री पं० रामचन्द्र जी देहलवी व पं० गंगाप्रसाद जी उपाध्याय सरीखे विचारकों को यह प्रवृत्ति बहुत अखरने लगी। वे इसे एक मानसिक रोग मानते थे। कल्पित कहानी कहीं जाट की सुनाई जाती तो कहीं चक्की वाली माई की कहानी हम सुनते रहे। कोई लालाजी की कहानी परोस देता तो कोई मौलवी जी की। आर्यसमाज के गौरवपूर्ण व रक्तरंजित इतिहास की कहानियाँ दृष्टान्त रूप में कम ही सुनने को मिलतीं।

इस प्रवाह को बदलने का प्रयास मैंने किया। मैंने आर्यसमाज को दृष्टान्त देने की एक नई विधा दी। मुझे इस विधा की प्रेरणा एक अमरीकन लेखक की एक पुस्तक से मिली थी।

यह पुस्तक आर्यसमाजी विद्वान् व पत्रकार श्री सन्तराम जी अजमानी ने मुझे इसी प्रयोजन से दिखाई थी। मैंने उस पर एक विहंगम दृष्टि डालते ही आर्य जाति की भावी पीढ़ियों के नव-निर्माण व प्रेरणा देने के लिए आर्यसमाज के इतिहास के ज्ञात व अज्ञात सेवकों की प्रेरणाप्रद कहानियों को संग्रहीत करके नई विधा से साहित्य सृजन का तत्काल निश्चय कर लिया।

आर्य युवक समाज अबोहर ने ‘प्रेरणा कलश’, ‘प्रेरणा कुटी’ व ‘अतीत के झरोखे से’ मेरी तीन पुस्तकें प्रकाशित कीं। छपते ही इनकी धूम मच गई। श्री पं० विश्वमित्र जी हिसार व स्वर्गीय पं० कर्मवीर जी ने भी इनके प्रकाशन की प्रबल प्रेरणा दी थी।

इनके पश्चात् मेरी लेखमाला ‘तड़प वाले तड़पाती जिनकी कहानी’ की छपते समय ही धूम मच गई। फिर मैंने दो खण्डों में इन्हें प्रकाशित करवाया। इनकी लोकप्रियता का अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि मेरे व्याख्यान से पूर्व मेरे परिचय के लिए ‘तड़प वाले तड़पाती जिनकी कहानी’ पुस्तक-माला के लेखक जिज्ञासु जी कहा जाने लगा।

इस विधा के साहित्य सृजन से मैंने बहुत सी किंववदन्तियों व गप्पों का निराकरण करके आर्यसमाज के स्फूर्तिदायक रक्तरंजित इतिहास की प्रामाणिक घटनाओं को सुरक्षित कर दिया है। इसके लिए मैं अनेक पुराने आर्य महापुरुषों का ऋणी हूँ जिनके समय-समय पर मैंने साक्षात्कार लिये यथा पं० भगवदत जी, आचार्य उदयवीर जी, स्वामी सर्वानन्द जी, स्वामी सत्यप्रकाश जी, पं० युधिष्ठिर जी मीमांसक आदि।

परन्तु, मैं दो महापुरुषों का विशेष रूप से ऋणी हूँ।

आर्यसमाज के इतिहास का जितना ज्ञान इनको था उतना किसी और को न था और न है। एक थे पं० विष्णुदत्त जी वकील ।

आर्यसमाज के एक यशस्वी नेता व भारत प्रसिद्ध विधि विशेषज्ञ (Jurist) दीवान बद्रीदास इन पण्डित जी को इतिहासज्ञ नहीं इतिहासमय कहा करते थे। दूसरी विभूति थे पूज्य स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज। इन दोनों के इतिहास विषयक लेखों को पढ़े बिना कोई भी व्यक्ति आर्यसमाज के इतिहास से न्याय कर ही नहीं सकता। मैंने इनके सैकड़ों लेखों को पढ़कर आर्यसमाज के इतिहास विषयक साहित्य का सृजन किया है।

‘बड़ों की बड़ी बातें’ मेरी लेखमाला छपी तो इसे और आगे चलाने की ज़ोरदार मांग आई। मैंने तभी निर्णय ले लिया कि इसी नाम से एक पुस्तक-माला तैयार करूंगा। इसका पहला पुष्प आपके हाथों में है। मुझे अत्यन्त हर्ष है कि मेरे एक प्ररेणास्रोत आर्य जाति के एक मूर्धन्य विद्वान् श्री पं० युधिष्ठिर जी मीमांसक की जन्म शताब्दी तथा पटियाला राजद्रोह शताब्दी पर आर्यजगत् के एक शिरोमणि प्रकाशक प्रिय अजय कुमार आर्य इसको प्रकाशित कर रहे हैं। इस करणीय कार्य के लिए आप आर्यमात्र की बधाई के पात्र हैं। मेरी खोज व मेरे परिश्रम का प्रबुद्ध पाठक मूल्याङ्कन करेंगे। ऐसी मुझे आशा है। मैंने घटनाओं को कालक्रम से रखने का प्रयास तो किया है परन्तु, कुछ विवशता। मैंने कुछ सामग्री राष्ट्र के राजनैतिक इतिहास से भी दी है।

ऋषि मिशन का एक सेवक
राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

Reviews (0)

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “बड़ों की बड़ी बातें
Badon ki Badi Baten”

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Shipping & Delivery