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भूमिका
एशिया का आधुनिक इतिहास
अठारहवीं सदी में यूरोप के साम्राज्यवादी देशों ने एशिया में अपने आधिपत्य का विस्तार प्रारम्भ किया था। उन्नीसवीं सदी के अन्त तक एशिया के प्रायः सभी देग किसी न किसी रूप में यूरोप के प्रभाव व प्रभुत्व में आ गये थे। पर एशिया पर यूरोप का यह प्रभुत्व देर तक कायम नहीं रहा। बीसवीं सदी में एशिया के प्रायः सभी देशों में राष्ट्रीय स्वतन्त्रता और लोकतन्त्रवाद के आन्दोलन विकसित होने प्रारम्भहो गये, और अब वह समय आ चुका है जबकि एशिया पाश्चात्य साम्राज्यवाद के चंगुल से मुक्त होकर उन्नति के मार्ग पर तेजी के साथ अग्रसर हो रहा है।
एशिया में जो यह भारी परिवर्तन आया है, उसी का इतिहास इस ग्रन्थ में मैंने संक्षिप्त रूप में लिखने का प्रयत्न किया है। उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ काल में एशिया के विविध देशों की क्या दशा थी, उन्नति की दौड़ में यूरोप के मुकाबिले में वे किस प्रकार पीछे रह गये थे
पाश्चात्य देशों ने उन्हें किस प्रकार अपने साम्राज्य-वाद का शिकार बनाया, यूरोप और अमेरिका के सम्पर्क में आ कर किस प्रकार एशिया में नवजीवन का प्रारम्भ हुआ, किस प्रकार इन देशों में राष्ट्रीय म्वाधीनता, लोक-तन्त्रवाद और समाजवाद के विविध आन्दोलनों का सूत्रपात हुआ, और किस प्रकार ये देश स्वतन्त्र होकर राष्ट्रीय उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हुए- इन्हीं बातों को प्रति-पादित करना इस ग्रन्थ का प्रयोजन है। क्योंकि भारत भी एशिया का अन्यतम देश है, और भारत का अन्य देशों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतः भारतीय पाठकों के लिये एशिया के इतिहास की जानकारी प्राप्त करना बहुत उपयोगी है।
महाभारत के अनुसार इतिहास एक ऐसे प्रदीप (दीपक) के समान है, जो मोह (Prejudice) रूपी अन्धकार का विनाश कर सब तथ्यों व घटनाओं को उनके यथार्थ रूप में प्रकट करता है। इसमें सन्देह नहीं, कि इतिहास-लेखकों को यही लक्ष्य अपने सम्मुख रखना चाहिये। ऐतिहासिक का यही कार्य है, कि वह घटनाओं को उनके यथार्थ रूप में अभिव्यक्त करे, अपने व्यक्तिगत विचारों व सम्मतियों को वह इतिहास लिखते हुए सामने न लाए, और तथ्यों तथा घटनाओं के यथार्थ रूप से निरूपण द्वारा वह पाठकों को यह अवसर दे कि वे स्वयं अपनी सम्मति बना सकें।
ऐतिहासिक के लिए यह आदर्श निःसन्देह अत्यन्त उच्च है, पर इसे क्रियान्वित कर सकना सुगम नहीं है। विशेषतया, श्राधुनिक इतिहास को लिखते हुए इतिहास लेखक के लिये यह सुगम नहीं होता, कि वह अपने विचारों व मन्तव्यों को पूर्णतया भुलाकर घटनाओं के यथार्थ रूप को प्रस्तुत कर सके । वर्तमान युग विचारधाराओं और सिद्धान्तों के संघर्ष का युग है। व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा पूँजीवाद पर आश्रित लौकतन्त्रवाद और समाजवाद के पारस्परिक संघर्ष के कारण ऐतिहासिक के लिये निष्पक्ष होकर घटनाओं का यथार्थरूप से निरूपण कर सकना और भी अधिक कठिन हो गया है।
गत महायुद्ध (१६३६-४५) के अवसर पर कुछ समय के लिये जापान ने दक्षिण-पूर्वी एशिया के बड़े भाग पर अपना प्रमुत्व स्थापित कर लिया था। इस घटना का वृत्तान्त यूरोप के साम्राज्यवादी देशों के ऐतिहासिक इस ढंग से लिखते हैं, जैसे कि जापान इस क्षेत्र की जनता के स्वाधीन जीवन का अन्त कर उन्हें अपना दास एवं वशवर्ती बनाने के लिये प्रयत्नशील था । जिन लोगों को जापान के उत्कर्ष के कारण पाश्चात्य साम्राज्यवाद से छुटकारा प्राप्त करने का अवसर मिला, वे इस घटना के सम्बन्ध में दूसरा ही दृष्टिकोण रखते हैं।
उत्तरी कोरिया की दृष्टि में दक्षिणी कोरिया के राज्य की पृथक् सत्ता लोकमत के प्रतिकूल है, और दक्षिणी कोरिया के लोग उत्तरी कोरिया के कम्युनिस्ट शासन को चीन के हस्तक्षेप का परिणाम मानते हैं। इस दशा में निष्पक्ष ऐतिहासिक का कार्य और भी अधिक कठिन हो जाता है। मैंने यत्न किया है, कि इस ग्रन्थ में प्रत्येक तथ्य तथा घटना का प्रतिपादन निष्पक्ष रूप से करूं, और अपने विचारों व मन्तव्यों को कहीं प्रकट न होने दूं।
एशिया महाद्वीप अत्यन्त विशाल है, और उसमें बहुत-से देशों की सत्ता है। उसके इतिहास को एक ग्रन्थ में लिख सकना सुगम नहीं है। अभी अंग्रेजी में भी ऐसी पुस्तकें नहीं है, जिनमें एशिया के सब देशों का इतिहास उस ढंग से एक साथ लिखा गया हो, जैसे कि यूरोप के इतिहास को लिखा जाता है। इस कारण मेरा कार्य और भी अधिक कठिन हो गया है।
पर मुझे आशा है, कि मेरे इस ग्रन्थ द्वारा पाठकों को एशिया के आधुनिक इतिहास के सम्बन्ध में समुचित जानकारी प्राप्त करने का अवतर मिलेगा। इस ग्रन्थ में मैंने प्रधानतया पूर्वी एशिया (चीन, जापान, कोरिया और फिलिप्पीन), दक्षिण-पूर्वी एशिया (विएतनाम, कम्बोडिया, लाओस, इन्डोनीसिया, मलायीसिया, थाईलैण्ड और बरमा) और पश्चिमी एशिया (ईरान, ईराक, सीरिया, लेबेनान, तुर्की, पैलेस्टाइन, जोर्डन, अफगानिस्तान, अरव प्रायद्वीप के विविध राज्य और ईरान की खाड़ी के समुद्र तट पर स्थित शेख राज्य) के आधुनिक इतिहास का प्रतिपादन किया है।
क्योंकि ईजिप्ट भी एक अरब राज्य है, और इस समय एशिया के कुछ भाग को साथ लेकर वह युनाइटेड अरब राज्य का भी निर्माण कर चुका है, अतः उसका इतिहास भी इस ग्रन्थ में दे दिया गया है। भारत और पाकिस्तान का एशिया के आधुनिक इति-हास में बहुत महत्त्व है, पर उनका इतिहास मैंने जानबूझकर इस ग्रन्थ में नहीं दिया है।
इस ग्रन्थ के प्रायः सभी पाठक इन देशों के इतिहास से भलीभाँति परिचित होंगे ही। गत वर्षों में एशिया के विविध देशों में अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए है। अग्रगामी लम्बी छलांग और सांस्कृतिक क्रान्ति के कारण चीन के समाजवाद (कम्यु-निज्म) ने एक नया रूप प्राप्त कर लिया है, जो रूस के कम्युनिज्न से भिन्न है।
विएत-नाम के युद्ध का अब अन्त हो गया है, कम्युनिस्ट चीन ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की सदस्यता प्राप्त कर ली हैं, और अमेरिका जैसा पूंजीवादी देश उसके साथ मैत्रीसम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील है। पाकिस्तान का अंग-भंग होकर अब बांगलादेश नाम से एक नया राज्य स्थापित हो गया है। एशिया के इतिहाश के इन तथा अन्य सब नवीन परिवर्तनों पर इस ग्रन्थ के नये संस्करण में विशद रूप से प्रकाश डाला गया है।
मुझे आशा है, कि पाठक इस ग्रन्थ को उपयोगी पायेंगे ।
सत्यकेतु विद्यालंकार

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