आर्यसमाज और शुद्धि आंदोलन Arya Samaj and the Shuddhi Aandolan
₹500.00
- Author: Dr. Vivek Arya
- Language: Hindi
- Publication: Bharatiya Hindu Shuddhi Sabha
- Pages: 530
- Edition: 2026
- Cover: Paperback
- Weight: 515 Gms.
स्वामी श्रद्धानन्द की अमर सूक्तियाँ
कांग्रेस के मंच से –
अमृतसर कांग्रेस के स्वागताध्यक्ष के पद से आपने अपने भाषण में कहा था कि ‘यदि जाति को स्वतन्त्र देखना चाहते हो, तो स्वयं सदाचार की मूर्ति बन कर अपनी सन्तान के सदाचार की बुनियाद रख दो। जब सदाचारी ब्रह्मचारी हों शिक्षक और कौमी हो शिक्षा पद्धति, तभी कौम की जरूरतों को पूरा करने वाले नौजवान निकलेंगे, नहीं तो इसी तरह आपकी सन्तान विदेशी विचारों और विदेशी सभ्यता की गुलाम बनी रहेंगी।’
दलितोद्धार –
अपने इसी भाषण में आपने कहा था कि ‘लन्दन नगर में भारत की रिफाम-स्कीम-कमेटी के सामने ईसाई मुक्ति फौज के बूथ टकर साहब ने कहा था कि भारत के साढ़े छः करोड़ अछूतों को विशेष अधिकार मिलने चाहियें और उसके लिये हेतु दिया था क्योंकि वे भारत में ब्रिटिश गवर्नमेंट रूपी जहाज के लंगर हैं। इन शब्दों पर गहरा विचार कीजिये और सोचिये कि किस प्रकार आपके साढ़े छः करोड़ भाई, आपके जिगर के टुकड़े, जिन्हें आपने काट कर फेंक दिया है, किस प्रकार भारत माता के साढ़े छः करोड़ पुत्र एक विदेशी गवर्नमेंट रूपी जहाज के लंगर बनते हैं।
मैं आप सब बहिनों और भाइयों से एक याचना करूँगा। इस पवित्र जातीय मन्दिर में बैठे हुये अपने हृदयों को मातृभूमि के प्रेमजल से शुद्ध करके प्रतिज्ञा करो कि आज से वे साढ़े छः करोड़ हमारे लिये अछूत नहीं रहे, बल्कि हमारे बहिन और भाई हैं। उनकी पुत्रियों और उनके पुत्र हमारी पाठशालाओं में पढ़ेंगे। उनके गृहस्थ नर-नारी हमारी सभाओं में सम्मिलित होंगे। हमारे स्वतन्त्रता प्राप्ति के युद्ध में वे हमारे कन्धे से कन्धा जोड़ेंगे और हम सब एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुये ही अपने जातीय उद्देश्य को पूरा करेंगे। हे देवियो और सज्जन पुरुषो ! मुझे आशीर्वाद दो कि परमेश्वर की दया से मेरा यह स्वप्न पूरा हो।’
आर्यसमाज से आशा –
कांग्रेस, हिन्दू महासभा और शुद्धि सभा से निराश होने के बाद आपने आर्यसमाज को लक्ष्य करते हुए लिखा कि ‘हिन्दू-संगठन के लिए गत ढाई वर्ष काम करते हुए मैंने अनुभव किया कि यदि आर्य-संस्कृति की रक्षा और उसके द्वारा हिन्दू समाज को अधःपतन से बचाना है, तो आर्यसमाज को अपनी त्रुटियाँ दूर करके इस सेवा के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा करनी पड़ेगी। जब तक अपनी बिखरी हुई शक्तियों को केन्द्रित करके आर्यसमाज की संस्था लगन से इस काम में नहीं लग जाती, तंब तक हिन्दू-समाज के अन्य सम्प्रदायों में भी जान नहीं पड़ सकती।’
भूमिका
आर्यसमाज और शुद्धि आंदोलन पुस्तक का लेखन ‘भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा’ की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने पर किया गया है। शुद्धि सभा की स्थापना 13 फरवरी 1923 को स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज की प्रेरणा से आगरा में हुई थी। अपने राजनीतिक जीवन से संन्यास लेने के पश्चात् स्वामी जी ने दलितोद्धार और शुद्धि के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया। आपने शुद्धि यज्ञ में अपना बलिदान देकर आर्यों को निर्भीक होकर शुद्धि यज्ञ में अपनी आहुति देने के लिए प्रेरित किया।
शुद्धि यज्ञ में कई दर्जन कार्यकर्ताओं का बलिदान हुआ। सैकड़ों को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक हानि उठानी पड़ी। स्वामी दयानन्द के सिपाहियों ने अनेकों कष्ट सहकर अनेक शताब्दियों से बिछुड़ चुके भाइयों को स्वधर्मी बनाया। यह प्रेरणा उन्हें वेदों के महान् विद्वान् एवं हिन्दू जाति रक्षक स्वामी दयानन्द से प्राप्त हुई। स्वामी जी ने एक कुशल चिकित्सक के समान दीर्घ काल तक संसार की श्रेष्ठतम आर्य (हिन्दू) जाति के पतन के कारणों का नजदीकी से विश्लेषण किया।
इस पतन के निराकरण की अचूक औषधि को ‘वेद विद्या’ के पुनः प्रचार के रूप में बताया। ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा देकर पुनरुद्धार का जनजागरण किया। रूढ़िवादी हिन्दू समाज ने शताब्दियों से विधर्मी हो चुके भाइयों की वापसी के हर दरवाजे बंद कर दिए थे। आपने आर्य जाति पर महान् उपकार करते हुए उन बंद पड़े दरवाजों को खोल कर शुद्धि विधान को पुनः प्रचलित किया।
जिससे हिन्दुओं की घटती जनसंख्या पर रोक लगे। स्वामी जी से प्रेरणा पाकर आर्यसमाज ने अपने हाथों में लिया और लगभग आधी शताब्दी तक उसे विधर्मियों के साथ साथ अपने ही स्वधर्मी भाइयों का कटु विरोध सहन करना पड़ा। स्वामी दयानन्द के समर्पित सिपाही हँसते हँसते इस विरोध को सहते रहे और कर्तव्य पथ पर अडिग रहे।
इस पुस्तक में मैंने उन महान् आत्माओं के बलिदान, तप और त्याग की गाथा को संकलित करने का प्रयास किया है। एक शताब्दी से अधिक के कार्य एक पुस्तक में समेटना संभव ही नहीं है। यह सारी सामग्री व्यवस्थित रूप से एक स्थान पर कहीं भी उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इसका संकलन करना एक बड़ी चुनौती थी। इस पुस्तक को मैंने केवल 6 माह में लिखा है पर इसकी सामग्री का स्रोत्र मेरे जीवन के गत 25 वर्षों में किये गए हज़ारों पुस्तकों का स्वाध्याय है। मुझे यह लिखते हुए गर्व महसूस हो रहा है कि यह पुस्तक मेरे स्वाध्याय रूपी यज्ञ का एक सुखद और संतोषजनक फल है।
जिससे वर्तमान ही नहीं आने वाली पीढ़ियां भी प्रेरणा लेंगी। हिन्दू समाज इस पुस्तक से प्रेरणा लेकर शुद्धि कार्य को आगे बढ़ाएं। यह हिन्दू जाति के अस्तित्व के लिए और आने वाली पीढ़ी के भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। शुद्धि से हिन्दू समाज के अस्तित्व को चुनौती देने वाली सभी समस्याओं का समाधान है जैसे गौ रक्षा, लव जिहाद, अवैध शरणार्थी, अल्पसंख्यक होता हिन्दू, यूनिफोर्म सिविल कोड, जनसंख्या नियंत्रण, आत्मनिर्भर और शक्तिशाली सरकार, धार्मिक स्वतंत्रता, ईसाई धर्मान्तरण, शरिया बनाम संविधान आदि। इसलिए हर हिन्दू को अपने जीवन में कम से कम पाँच व्यक्तियों को शुद्धि करने कराने का संकल्प लेना चाहिए। यही इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य है।
डॉ. विवेक आर्य
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