अन्धविश्वास निर्मूलन Andhvishwas Nirmulan
₹150.00
- Author: Madan Raheja
- Language: Hindi
- Pages: 171
- Edition: 2024
- Cover: Paperback
- ISBN: 9788170770467
- Weight: 212 Gms.
अन्धविश्वास निर्मूलन
भूमिका
मेरा उद्देश्य किसी की भी निन्दा करना नहीं है, प्रत्युत पाखण्ड का पर्दाफ़ाश करना अपना धर्म समझता हूँ। पाखण्ड का खण्डन होना ही चाहिए। मनुष्य वही है जो असत्य से समझौता नहीं करता; केवल सत्याचरण करता है। इस उद्देश्य को लेकर इस पुस्तक को सत्यार्थ प्रकाश हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ।
मनुष्य को इस संसार में आए 1,96,08,53,100 वर्ष हो गए हैं और सृष्टि के आरम्भ में ही ईश्वर ने सब मनुष्यों के कल्याणार्थ तथा अपवर्ग हेतु वेदों का ज्ञान प्रदान किया। तो भी मनुष्य को ठीक तरह से मनुष्य बनना नहीं आया। ईश्वर हमारा पिता है और हम सब आत्माएँ उसकी अमृत-संतानें हैं। सुपात्र, इस जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और रह जाते हैं साधारण मनुष्य। कारण क्या है कि हम अभी तक यहीं रह रहे हैं? कारण को ढूँढते जाएँगे तो हमारे अपने ही कर्म सामने आ खड़े होंगे।
परमपिता परमात्मा ने वेदों का अमृत तो पिला दिया, परन्तु अपनी ही अज्ञानता के कारण हमने उसे उलटा दिया है। परिणाम- हम वहीं के वहीं खड़े हैं। आत्मा स्वतंत्र सत्ता है, अतः अपनी मर्जी से जो चाहे कर्म कर सकता है। किसी की रोक-टोक नहीं है। अल्पज्ञ है-अज्ञानी है-स्वभाव से ही स्वार्थी मिज़ाज का है, इसी कारण जब सुकर्म करता है- निष्काम कर्म करता है तो सुख पाता है और जब कभी कुकर्म-पापकर्म करता है तो फलस्वरूप दुःख प्राप्त करता है। ईश्वर सर्वज्ञ है, सबका पिता है, सृष्टि का नियंता है, अतः अपनी संतानों का सदा भला ही चाहता है।
बच्चे ग़लती करते हैं तो माता-पिता उसे दंड देते हैं। समझाने से भी नहीं समझते तो कड़ी सज्जा देते हैं। माता-पिता किसी बदले की भावना से या वैर-द्वेष की भावना से बच्चों को दंड नहीं देते; केवल उनकी भलाई के लिए – उनके उत्थान के लिए ही देते हैं। बच्चे कैसे भी नालायक हों, फिर भी मन में उनके लिए प्रेम वैसा ही बना रहता है। खाना-पीना बराबर देते हैं, परन्तु उनकी स्वतंत्रता को कहीं न कहीं अंकुश लगा देते हैं- यह उनके लिए सबक है, शिक्षा है।
परमपिता परमात्मा सबका माता-पिता बंधु-सखा है। वह जीवात्मा का सबसे बड़ा मित्र है, अतः वह जीवात्मा के कर्मों का फल देता है। वह सर्वज्ञ है, हम अल्पज्ञ हैं, अतः सर्वज्ञ को ही अधिकार है कि वह अल्पज्ञों को सही मार्ग दर्शाए ।
(वेद मूल रूप में सद्-ज्ञान के स्रोत हैं। उपनिषदों में वेदों की ही व्याख्या सरल करके बताई गई है। दर्शनों में कुछ गूढ़ सिद्धान्तों का पता चलता है।)
सृष्टि के आरम्भ में तो सब ठीकठाक रहा, किन्तु जैसे-जैसे मतमतान्तर बढ़ते रहे, मनुष्य में स्वार्थता पनपती रही। स्वार्थपूर्ति के कारण कहें या अज्ञानता के कारण, मनुष्य ग़लतियों पर ग़लतियाँ करता चला गया। अपने-अपने ग्रुप (संगठन) बनाते रहे, अपने-अपने मत-मज़हब-पंथ बनाते रहे, नतीजा – दुःखों का आक्रमण अधिक होने लगा। उन मत-मज़हब-पंथों में जो स्वाध्यायशील थे, उन्होंने समाज-सुधार का काम प्रारम्भ कर दिया- इस प्रकार गुरु-शिष्य की परम्परा आरम्भ हो गई।
(गुरु-शिष्य परम्परा तो सृष्टि के आदिकाल से ही है, क्योंकि धर्मगुरु तो स्वयं परमपिता परमात्मा ही हैं; उनके शिष्य बने-अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ऋषि, जिन्होंने वेद का संदेश सब मनुष्यों को प्रदान किया।)
कालान्तर में गुरु-शिष्य परम्परा को नया रूप दिया इन दुकानदारों ने! थोड़े-से स्वाध्याय से बड़ी-बड़ी बातें करके साधारण लोगों को भटकाना शुरू हो गया- बदले में बिना हाथ-पैर चलाए रोटी, कपड़ा और मकान, बिना परिश्रम के प्राप्त होता रहा। देखादेखी में गुरुओं की दूकानें खुलती गईं। लोग भटकते चले गए। जो गुरु ने कहा वही सच समझ लिया और भ्रान्तियों ने जन्म ले लिया। अन्धविश्वास और अन्धश्रद्धा बढ़ती गई। यहाँ तक कि गुरुओं को ही ईश्वर समझकर पूजा होने लगी।
रोशनी की एक झलक ही अंधकार को मिटाने में सक्षम होती है। समय-समय पर साधु-संतों-महात्माओं ने प्रकाश के दीये का काम किया। राम और कृष्ण जैसे महापुरुषों ने अपने समय में समाज का इतना सुधार किया कि युगों बाद आज भी उनके नाम ‘भगवान’ के रूप में स्मरण किये जाते हैं।
19वीं सदी में एक सूर्य का उदय हुआ जिसने पाखंडों का खंडन करने हेतु एक ज्वलंत पताका फहराई और उसकी रोशनी में अनेक प्रकार की भ्रान्तियों का निवारण हो गया। वह धर्मध्वजी थे- महर्षि स्वामी दयानन्द जिन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की। सूर्य की भाँति महर्षि ने संसार को सत्य के प्रकाश द्वारा ज्योतिर्मय बना दिया। अफसोस कि दुराचारियों को यह मंजूर नहीं था, क्योंकि उनके कुकर्मों का भांडा फोड़ दिया गया था। परन्तु जाते-जाते भी स्वामी जी ने वेद-उपनिषद्-दर्शन आदि अनेक आर्ष ग्रंथों के प्रमाण सहित “सत्यार्थप्रकाश” नामक ग्रन्थ लिखकर संसार को भ्रम-भ्रान्तियों के गर्त से बचने का शाश्वत आलोक प्रदान किया।
बहुत सोच-समझकर हमने ‘अंधविश्वास-निर्मूलन’ पुस्तक लिखने का प्रयत्न किया है जिसमें केवल वेद की ही बातों का प्रमाण देकर समझाने की कोशिश की है कि किन-किन पाखंडों से बचना उचित है। दुःख-निवृत्ति के लिए जहाँ भी सहारा मिलता है, मनुष्य वहीं भागता है; परन्तु जब वहाँ भी वह बुद्धि का सहारा नहीं लेता तो परिणाम और भी भयंकर हो जाता है। विश्वास अंधविश्वास में बदल जाता है। श्रद्धा अंधश्रद्धा में परिवर्तित हो जाती है। यही कारण है संसार में दुःख फैलता जा रहा है। निराश होने की बात नहीं। इस पुस्तक के माध्यम से अनेक जीवन दोबारा सही मार्ग पर आ जाएँगे-ऐसी हमें आशा और विश्वास है। ईश्वर सबको सद्बुद्धि प्रदान करे!
– मदन रहेजा
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