कोई व्यक्ति सदा ही जीते
Koi Vyakti Sada Hee Jite

“क्या ऐसा हो सकता है, कि कोई व्यक्ति सदा ही जीते?
कभी हारे ही नहीं?
किसी से भी न हारे?
कहीं भी न हारे?”
“जी हां। ऐसा हो सकता है, कि वह सदा ही जीते, सदा ही विजय का आनंद मनाए। कभी उसे हार का मुंह देखना न पड़े।” “परन्तु यह तभी हो सकता है, जब वह पूरी तरह से ईश्वर को समर्पित हो।”
“वह जो भी सोचे, जो भी बोले, जो भी आचरण व्यवहार करे, यदि वह ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल हो, तो वह सदा सब क्षेत्रों में जीतेगा। कभी भी कहीं भी नहीं हारेगा।”
“क्योंकि ईश्वर स्वयं ऐसा है, जो कभी भी कहीं भी किसी से भी नहीं हारता। जो ईश्वर की शरण लेगा, वह भी वैसा ही हो जाएगा।”
ऐसी योग्यता कैसे बनेगी ?
कि वह हर काम ईश्वर को समर्पित होकर करे। ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल करे। “ऐसी योग्यता वेदों को पढ़ने से, सम्पूर्ण वेद भाष्य का अध्ययन करने से ,वैदिक दर्शन शास्त्रों को पढ़ने से, विशेष रूप से न्याय दर्शन में अत्यधिक परिश्रम करने से, और उन बातों पर आचरण करने से बन सकती है।” “क्योंकि सोचने विचारने बोलने की जो गलतियां हैं, वे सभी 54 प्रकार की गलतियां, न्याय दर्शन में महर्षि गौतम जी ने बताई हैं।”
“सत्य और असत्य का निर्णय करने की पद्धति जो न्याय दर्शन में बताई है, वह संसार में किसी पुस्तक में नहीं है।” “अतः न्याय दर्शन या न्याय विद्या को किसी योग्य विद्वान गुरुजी से पढ़ सीख कर, फिर व्यक्ति उन से बचे, तो वह सब जगह जीतेगा। कभी कहीं नहीं हारेगा। वेदों के अनुकूल आचरण करेगा। ईश्वर की आज्ञा का पालन करेगा, और सदा विजय का आनंद मनाएगा।”