🎉 Free shipping on orders above ₹1500. 🎉
प्रस्तावना
भारत के इतिहास में सातवीं से बारहवीं सदी तक के काल को ‘पूर्व-मध्य युग’ कहा जाता है। इसे ही ‘गुप्तवंशोत्तर युग’ भी कहते हैं। मौर्य-युग और गुप्त-युग के समान इस काल का नाम जो किसी राजवंश के नाम पर नहीं पड़ा, इसका कारण यह है, कि इस युग में कोई ऐसा राजवंश नहीं हुआ, जिसके राजा भारत के बड़े भाग को अपने अधीन कर किसी सुविस्तृत साम्राज्य की स्थापना कर सकने में समर्थ हुए हों। हूणों के आक्रमणों के कारण छठी सदी में विशाल गुप्त साम्राज्य खण्ड-खण्ड हो गया था, और उसके भग्नावशेषों पर अनेक छोटे-बड़े राज्य स्थापित हो गये थे।
इनके राजा परस्पर संघर्ष में व्यापृत रहते थे, और अपने शासन क्षेत्र का विस्तार करने का प्रयत्न करते रहते थे। इन राज्यों में अनेक ऐसे प्रतापी राजा हुए, जिन्होंने दूर-दूर तक विजय-यात्राएं कर अन्य राजाओं को पराभूत किया, पर उनकी दिग्विजयों के कारण किसी स्थायी साम्राज्य की नींव नहीं पड़ सकी। पाल वंश का राजा धर्मपाल (७७०-८१० ईस्वी), गुर्जर प्रतिहार वंश का राजा मिहिर भोज (८३६-८८५ ईस्वी) और राष्ट्रकूट राजा गोविन्द तृतीय (७६४-८१४ ईस्वी) सुदूर प्रदेशों में विजय-यात्राएं कर भारत के अच्छे बड़े भाग को अपनी अधीनता में लाने में समर्थ हुए थे।
पर ये प्रतापी दिग्विजयी राजा चन्द्रगुप्त मौर्य और समुद्रगुप्त के समान कोई ऐसा साम्राज्य स्थापित नहीं कर सके, जो डेढ़-दो सदी तक कायम रहा हो और जिस द्वारा भारत की राजशक्ति किसी एक केन्द्र में केन्द्रित हो गई हो। पाश्चात्य संसार में भी इस काल में राजनीतिक एकता का अभाव था। पूर्व में ईरान की खाड़ी से लगा कर पश्चिम में ब्रिटेन तक विस्तृत जिस विशाल साम्राज्य की स्थापना रोमन लोगों ने की थी, पांचवीं-छठी सदियों में हूण जातियों के आक्रमणों के कारण वह भी खण्ड-खण्ड हो गया था, और यूरोप में भी बहुत-से छोटे-बड़े राज्य स्थापित हो गये थे।
रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् पाश्चात्य जगत् में भी मध्य-युग का प्रारम्भ हुआ, जिसकी एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी, कि उस काल में वहाँ राजनीतिक एकता का अभाव रहा, और विविध राजाओं के निरन्तर युद्धों के कारण एक प्रकार की अराजकता की स्थिति बनी रही। इस युग की प्रधान राजनीतिक संस्था सामन्त पद्धति थी। यूरोप के समान भारत में भी इस काल में महाराजाधिराज की अधीनता में बहुत-से छोटे-बड़े सामन्त राजा होते थे, जो अपने-अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से शासन करते थे। इन सामन्त राज ओं की अपनी सेना होती थी, और अपना पृथक् राजकोश होता था।
यदि महाराजाधिराज निर्बल हो, तो सामन्त राजा उसकी अधीनता का जुआ उतार फेंककर स्वतन्त्र हो जाते थे, और पड़ौस के राज्यों को जीतकर स्वयं महाराजाधिराज की स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करने लगते थे ।
पान्न वंश का प्रतापी राजा धर्मपाल एक ऐसा ही महाराजाधिराज या सम्राट् था, जिसने उत्तरी भारत के बहुत-से राजाओं को जीतकर अपने अधीन कर लिया था। पर उसकी विजयों के कारण इन राजाओं की पृथक् सत्ता का अन्त नहीं हो गया था। अपने-अपने राज्यों में ये स्वतन्त्र रूप से शासन करते रहे, पर साथ ही धर्मपाल को अपना प्रभु व अधिपति भी स्वीकार करते रहे। नवीं सदी के उत्तरार्ध में जब पाल राजवंश की शक्ति में शिथिलता आ गई, तो ये सामन्त राजा पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हो गये। सामन्तपद्धति के कारण मध्ययुग में राजलक्ष्मी किसी एक वंश में स्थिर नहीं रह सकी।
पर इससे यह नहीं समझना चाहिये, कि इस काल में भारत की राजशक्ति में कोई विशेष निर्बलता आ गई थी। सातवीं सदी के उत्तरार्ध में अरबों ने भारत पर आक्रमण प्रारम्भ कर दिये थे। सिन्ध के कुछ प्रदेशों को उन्होंने अपने अधीन भी कर लिया था। पर वे सिन्ध से आगे बढ़कर भारत में अपनी सत्ता का विस्तार कर सकने में असमर्थ रहे। अरबों की जिन सेनाओं ने पूर्वी रोमन साम्राज्य और उत्तरी अफ्रीका को जीतकर यूरोप में स्पेन की भी विजय कर ली थी, और पशिया तथा मध्य ऐशिया के राज्य भी जिनके सामने नहीं टिक सके थे, वे भारत को जीत सकने में असमर्थ रहीं।
गुर्जर प्रतिहारों ने उन्हें सिन्ध से आगे नहीं बढ़ने दिया। आठवीं-नवीं सदियों में अरब सेनाओं ने गुजरात, काठियावाड़ तथा उत्तर-पश्चिमी भारत की विजय के लिये जो भी प्रयत्न किये, वे पूर्णतया असफल रहे। दसवीं सदी के अन्त में गजनी के तुकों ने भारत पर आक्रमण प्रारम्भ कर दिये थे, और तुर्क सुलतान महमूद गजनवी विजय-यात्राएं करता हुआ भारत में बहुत दूर तक चला आया था।
पर काठियावाड़, कन्नौज, कांगड़ा आदि के जिन स्थानों के मन्दिरों को ध्वंस करने तथा जहाँ से अपार सम्पत्ति लूट में प्राप्त करने में वह सफल हुआ था, उन्हें वह अपने आधिपत्य में ले आने तथा अपने साम्राज्य में सम्मिलित करने में वह समर्थ नहीं हो सका था। आधी से भी अधिक समय तक निरन्तर युद्धों के बावजूद तुकं आक्रान्ता केवल पश्चिमी पंजाब तक के प्रदेशों को ही अपनी अधीनता में ला सके थे। पूर्व-मध्य युग में भी भारत की राजशक्ति शिथिल नहीं हुई थी, यह सर्वथा स्पष्ट है। किसी एक सुविशाल साम्राज्य के अभाव में भी भारत के विविध राजा अरब और तुर्क आक्रान्ताओं से अपने राज्यों की रक्षा करने में समर्थ रहे थे।
यूरोप के इतिहास में मध्य युग को अन्धकार का काल कहा जाता है। यह सही भी है, क्योंकि उस समय यूरोप के देशों में न ज्ञान-विज्ञान और दार्शनिक चिन्तन के क्षेत्र में कोई विशेष उन्नति हुई और न ही यूरोप के धर्मों तथा संस्कृति का अन्य देशों में प्रसार हुआ। पर यह बात भारत के मध्य युग के सम्बन्ध में नहीं कही जा सकती। पूर्व-मध्य युग का काव्य-साहित्य अत्यन्त समृद्ध था। भवभूति, भारवि, माघ, भट्टि, बाणभट्ट, सोमदेव आदि कितने ही साहित्यकार इस युग में हुए। प्राकृत और पालि भाषाओं में भी इस काल में अनेक उत्कृष्ट साहित्यिक ग्रन्थों की रचना हुई।
हिन्दी आदि आधुनिक लोक भाषाओं में भी इस युग में साहित्य का सृजन प्रारम्भ हुआ। बौद्ध धर्म के विरुद्ध प्रतिक्रिया होकर जिस पौराणिक वैदिक धर्म का पुनरुत्थान हुआ था, उसके विविध सम्प्रदायों के मन्तव्यों को मुदृढ़ आधार प्रदान करने के लिये इस काल में अनेक दार्शनिकों ने गम्भीर एवं तर्क-पूर्ण ग्रन्थों की रचना की। वाचस्पति मिश्र, उदयनाचार्य, कुमारिलभट्ट, मण्डनमिश्र, शंकराचार्य, रामानुज और मध्वाचार्य आदि कितने ही दार्शनिक मध्य-युग में हुए, जिनके सिद्धान्तों एवं मन्तव्यों को संसार के दार्शनिक चिन्तन में अत्यन्त उच्च स्थान प्राप्त है।
चिकित्साशास्त्र, ज्योतिष और गणित सदृश विज्ञानों में भी इस काल में पर्याप्त उन्नति हुई। वाग्भट, माधव और चक्रपाणि जैसे चिकित्साशास्त्री तथा ब्रह्मगुप्त, भट्टोत्पल और भास्कराचार्य जैसे ज्योतिषी एवं गणितज्ञ इसी काल में हुए। इन वैज्ञानिकों ने आयुर्वेद तथा ज्योतिष सदृश विज्ञानों में नये सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया। संगीत, भवन निर्माण, मूर्तिकला आदि पर अनेक नये ग्रन्थ इस युग में लिखे गये। जहाँ तक साहित्य, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान आदि के क्षेत्रों में प्रगति का सम्बन्ध है भारत के इतिहास के पूर्व-मध्य काल को यूरोप के मध्य युग के समान अन्धकार का काल कहा जाना कदापि संगति नहीं है।
कला की दृष्टि से भी पूर्व-मध्य युग बहुत उन्नत था। एल्लोरा के अनेक गुहाभवन, खजुराहो के मन्दिर, उड़ीसा में भुवनेश्वर आदि के मन्दिर और दक्षिणापथ तथा सुदूर दक्षिण के वे बहुत-से मन्दिर, जिन पर भारत को गवं हो सकता है, इसी युग की कृतियां हैं।
भारतीय धर्म तथा संस्कृति का जो प्रचार पूर्व-मध्य युग में पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के विभिन्न देशों में हुबा और नालन्दा के विक्रमशिला के महाविहारों से जिस प्रकार बौद्ध स्पविर एवं आचार्य तिब्बत तथा चीन आदि देशों में धर्म की स्थापना एवं प्रचार के लिए गये, वह भारत के लिए अत्यन्त गौरव तथा गर्व की बात है। सातवीं से बारहवीं सदी तक के काल में भारत को वस्तुतः विश्व के गुरु की स्थिति प्राप्त थी, क्योंकि अन्य देशों के विद्वान् ज्ञान और धर्म की अपनी पिपासा को शान्त करने के लिये इसी देश में आया करते थे।
पर पूर्व-मध्य युग में ही चे तत्त्व भी भारत में उत्पन्न व विकसित होने प्रारम्भ हो गये थे, जिनके कारण इस देश के समाज तया धर्म में ह्रास के चिह्न प्रगट होने लगे और जब तुर्क-अफगानों के रूप में ऐसे आक्रान्ताओं ने भारत पर चढ़ाइयां शुरू कीं जिनके धर्म में नई जीवनी शक्ति एवं स्फूर्ति थी, तो इस देश की जनता उनके सम्मुख नहीं टिक सकी।
पर ये मुसलिम आक्रान्ता जो भारत के धर्म तथा संस्कृति को उस ढंग से नष्ट नहीं कर सके, जैसे कि उन्होंने इजिप्ट, एशिया माइनर, पशिया तथा मध्य एशिया आदि में किया था, उसका कारण यही था कि पूर्व-मध्य युग में भारत के धर्म तथा संस्कृति आदि में नव-जीवन का संचार होता रहा था और भारत में अभी पर्याप्त जीवनीशक्ति विद्यमान थी।
इस ग्रन्थ में मैंने भारतीय इतिहास के इसी पूर्व-मध्य युग का सरल तथा सुपाठ्य रूप से इतिवृत्त लिखने का प्रयत्न किया है। इस युग का राजनीतिक इतिहास मुख्यतया शिलालेखों और ताम्रपत्रों पर आधारित है। अभिलेखों में विविध राजाओं का वृत्तान्त किस ढंग से लिखा गया है, इसका परिचय देने के लिये इस ग्रन्थ में शिलालेखों तथा ताम्रपत्रों से कुछ उद्धरण भी दे दिये गये हैं, जो केवल निदर्शन रूप से ही हैं। मुझे आशा है, कि पाठक मेरे इस ग्रन्थ को उपयोगी पायेंगे और इस द्वारा वे भारतीय इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण युग का कुछ परिचय प्राप्त कर सकेंगे।
-सत्यकेतु विद्यालंकार

Reviews
There are no reviews yet.