वर्णोच्चारणशिक्षा
Varna Uchcharan Shiksha

20.00

AUTHOR: Swami Dayanand Saraswati
SUBJECT: Varna Uchcharan Shiksha | वर्णोच्चारणशिक्षा
CATEGORY: Swami Dayanand Granth
LANGUAGE: Hindi
EDITION: 2024
PAGES: 22
BINDING: Paperback
WEIGHT: 35 g.
Description

वर्णोच्चारणशिक्षा

भूमिका

मुझको इस पुस्तक का प्रकाश करना आवश्यक विदित इसलिये हुआ है कि आजकल देवनागरी वर्णों के उच्चारण में बहुधा जो-जो गड़बड़ हुई है द्र० उस उसको छोड़ कर यथायोग्य वर्णों का उच्चारण मनुष्य करें। जैसे ज्ञा, इसमें ज++आ, ये तीन अक्षर मिले हैं, इनका उच्चारण भी जकार ञकार और आकार ही का होना चाहिये, किन्त और महाराष्ट्र ‌द्वान, गुजराती लोग ग्याँन और पञ्चगौड़ ग्यान ऐसा ऐसा न हो कि जैसे दाक्षिणात्य लोग अर्थात् द्राविड, तैलङ्ग, कारणाटक अशुद्ध उच्चारण अन्ध परम्परा से वेदादिशास्त्रों के पाठ में भी करते हैं। ऐसे ही पञ्चगौड़ प्रायः ष के स्थान में स का और कोई-कोई ख का और य के स्थान में ज उच्चारण करते हैं। वैसे ही बङ्गाली लोग ष और स के स्थान में भी श का उच्चारण किया करते हैं। यह अन्ध-परम्परा नष्ट होकर शुद्धोच्चारण की परम्परा होनी योग्य है।

और जैसे पाणिनिकृत शिक्षा में तिरसठ अक्षर वर्णमाला में माने हैं, उनकी गणना पूरी करने के लिए कई एक लोगों ने ‘कुं, खु, गुं, घुं’ इन चार को यम मान के तिरसठ अक्षर पूरे किये हैं। भला यहाँ विचारना चाहिये कि जब पूर्वोक्त यम हैं तो ‘चुं, छु, जुं, झुं, टुं, उं’ इत्यादि यम क्यों न हों। और जो कोई कहे कि ‘पलिक्क्नी, चख्ख्नतु, जग्मिः, जघ्नुः’ इत्यादि में ‘क, ख, ग, घ्’ ये वर्ण यम कहाते और प्रातिशाख्य में भी प्रसिद्ध हैं, तो क्या इस बात को वे नहीं जानते कि वे वर्णान्तर कभी नहीं हो सकते, क्योंकि वे तो कवर्ग में पढ़े ही हैं।

तथा अपाणिनीय शिक्षा को पाणिनिकृत मान के पाठ किया करते और उसको वेदाङ्ग में गिनते हैं, क्या वे इतना भी नहीं जानते कि ‘अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि पाणिनीयं मतं यथा’। अर्थ- मैं जैसा पाणिनि मुनि की शिक्षा का मत है, वैसी शिक्षा करूँगा। इसमें स्पष्ट विदित होता है कि यह ग्रन्थ पाणिनि मुनि का बनाया नहीं, किन्तु किसी दूसरे ने बनाया है। ऐसे-ऐसे भ्रमों की निवृत्ति के लिए बड़े परिश्रम से पाणिनिमुनिकृत शिक्षा का पुस्तक प्राप्त कर उन सूत्रों की सुगम भाषा में व्याख्या करके वर्णोच्चारणविद्या की शुद्ध प्रसिद्धि करता हूँ, कि मनुष्यों को थोड़े ही परिश्रम से वर्णोच्चारणविद्या की प्राप्ति शीघ्र हो जावे।

इस ग्रन्थ में जो-जो बड़े अक्षरों में पाठ है, वह-वह पाणिनिमुनिकृत और मध्यम अक्षरों में अष्टाध्यायी और महाभाष्य का पाठ और जो-जो छोटे-छोटे अक्षरों में छपा है द्र० – वह मेरा बनाया है, ऐसा सर्वत्र समझना चाहिये।

॥ इति भूमिका समाप्त ॥

– दयानन्द सरस्वती (काशी)

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