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सेनानी पुष्यमित्र Senani Pushyamitra (Fighter Pushyamitra)
₹260.00
| AUTHOR: | Satyaketu Vidyalankar (सत्यकेतु विद्यालंकार) |
| SUBJECT: | Senani Pushyamitra (Fighter Pushyamitra) | सेनानी पुष्यमित्र |
| CATEGORY: | History |
| LANGUAGE: | Hindi |
| EDITION: | 2023 |
| PAGES: | 327 |
| BINDING: | Hardcover |
| WEIGHT: | 272 g. |
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि सेनानी पुष्यमित्र
हमारी यह कथा उस समय प्रारम्भ होती है जब सम्राट् अशोक की मृत्यु हुए पन्द्रह वर्ष व्यतीत हो चुके थे, और पाटलिपुत्र के राजसिंहासन पर उनके पौत्र सम्राट् दशरथ विराजमान थे। चन्द्रगुप्त और बिन्दुसार जैसे प्रतापी मौर्य सम्राटों ने मगध के जिस विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी, वह अभी प्रायः अक्षुण्ण रूप में विद्यमान था, यद्यपि उसमें ह्रास के चिह्न प्रगट होने लग गए थे।
आचार्य चाणक्य ने कभी यह स्वप्न लिया था कि हिमालय से समुद्रपर्यन्त सहस्र योजन विस्तीर्ण जो आर्यभूमि है, वह एक चक्रवर्ती राज्य का क्षेत्र है और वह सब एक ही शासन में रहनी चाहिए। चाणक्य के शिष्य चन्द्रगुप्त ने इस स्वप्न को पूरा कर दिखाया था, और इसमें जो कमी रह गई थी उसे बिन्दुसार और अशोक ने पूरा कर दिया था।
यदि मौर्य सम्राट् चाहते, तो अपने विशाल साम्राज्य की अदम्य सैनिक शक्ति का उपयोग देशदेशान्तर को जीतने के लिए कर सकते थे। यदि वे यवनराज सिकन्दर के समान दिग्विजय के लिए प्रवृत्त होते, तो सम्पूर्ण पश्चिमी एशिया को जीतकर अपनी अधीनता में ला सकते थे। सीरिया, मित्र, मैसिडोन और बारूत्री के यवन राजाओं में यह शक्ति नहीं थी कि वे मोयों का सामना कर सकते। पर कलिग की विजय करते समय अशोक को यह अनुभूति हुई कि युद्ध में मनुष्यों का व्यर्थ संहार होता है, लाखों स्त्रियाँ विधवा हो जाती हैं और अनगिनत बच्चे अनाथ हो जाते हैं।
शस्त्र-शक्ति द्वारा जो विजय की जाती है वह स्थायी नहीं होती, उससे मनुष्यों में विद्वेष की ही वृद्धि होती है। इसी अनुभूति से अशोक ने शस्त्र-विजय के स्थान पर धर्म-विजय की नीति को अपनाया और यह यत्न किया कि मनुष्यों के मनों पर विजय प्राप्त की जाए। उस युग के राजा प्रायः युद्धों में व्यापृत रहा करते थे, शस्त्र-शक्ति का प्रयोग कर पड़ोसी राज्यों को परास्त कर देना वे गौरव की बात समझते थे, और अपनी प्रजा के हित व सुख पर वे जरा भी ध्यान नहीं देते थे। पश्चिमी एशिया के यवन राजाओं को तो आपस में लड़ने से ही अवकाश नहीं मिलता था।
इस दशा में अशोक के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि भारत की पश्चिमी सीमा पर जो अनेक यवन राज्य विद्यमान हैं, उनकी प्रजा के हित व सुख का साधन किया जाए और इस प्रकार उनके हृदयों को जीतकर एक नए ढंग का चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित किया जाए। इन यवन राज्यों के साथ भारत का राज-नीतिक सम्बन्ध पहले भी विद्यमान था। मौर्य सम्राटों के राजदूत यवन राजाओं के दरबारों में रहा करते थे, और यवनों के राजदूत पाटलिपुत्र की राजसभा में। अशोक ने इन यवन राज्यों में एक नए प्रकार के राजकर्मचारी नियुक्त किए, जिन्हें ‘धर्ममह। मात्य’ कहते थे।
धर्ममहामात्यों का कार्य यह था कि जनता के हित व कल्याण के साधन जुटाएँ, मनुष्यों और पशुओं की चिकित्सा के लिए चिकित्सालय खुलवाएँ, अनाथों और वृद्धों की रक्षा करें और प्राणिमात्र के सुख के लिए प्रयत्न करें। धर्ममहामात्यों का एक महत्त्व-पूर्ण कार्य यह भी था कि वे जनता को धर्म का वास्तविक अभिप्राय समझाएँ। अशोक का मत था कि दासों और मृत्यों के प्रति उचित बरताव करना, गुरुजनों का आदर करना, माता-पिता की सेवा करना, सबके प्रति वरुणा की भावना रखना, दान करना, संयम और सदाचारपूर्वक जीवन बिताना, अपने आचरण को पवित्र बनाना और वाणी पर संयम रखना ही सच्चा धर्म है।
धर्म के ये तत्त्व सब सम्प्रदायों में समान रूप से पाए जाते हैं। उनके विधि-विधानों, अनुष्ठानों और पूजा-पाठ की विधि में कितनी ही भिन्नता क्यों न हो, पर कौन-सा ऐसा सम्प्रदाय है जो धर्म के इन आधारभूत तत्त्वों को स्वीकार न करता हो ? फिर साम्प्रदायिक विद्वेष से क्या लाभ है ? सब सम्प्रदायों को एक-दूसरे का आदर करना चाहिए, और सबको परस्पर मिलकर रहना चाहिए। सम्राट् अशोक ने अपने साम्राज्य के सीमान्त प्रदेशों और विदेशों में सर्वत्र धर्ममहामात्य नामक राजकर्मचारी इसी प्रयोजन से नियुक्त किए थे कि वे जनता का ध्यान धर्म के मूल तत्त्वों की ओर आकृष्ट करें और प्राणिमात्र के हित-सुख का साधन करें।
यवन शासकों के अत्याचारों से पीड़ित और निरन्तर युद्धों से उद्विग्न जनता ने भारत के धर्ममहामात्यों का उत्साहपूर्वक स्वागत किया। यवन राज्यों की प्रजा राजनीतिक दृष्टि से यवन राजाओं के अधीन थी, पर अपने हित व सुख के लिए वह भारत के धर्ममहामात्यों की ओर देखती थी। वह अशोक को अपना हितचिन्तक और सुखसाधक मानती थी। परिमाण यह हुआ कि भारत का धर्म-साम्राज्य यवन देशों में सर्वत्र स्थापित हो गया और अशोक गर्व के साथ यह कह सका- ‘सब जगह लोग देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा के धर्मानुशासन का अनुसरण कर रहे हैं, और भविष्य में भी करेंगे । इस प्रकार सर्वत्र जो विजय स्थापित हुई है, वह वस्तुतः आनन्द देने बाली है।’
अशोक की मृत्यु के अनन्तर उसके उत्तराधिकारियों ने भी धर्म-विजय की नीति का अनुसरण किया। मौर्य सम्राटों द्वारा नियुक्त धर्म-महामात्यों का सहारा लेकर बौद्ध भिक्षु भी तथागत बुद्ध के अष्टांगिक आर्य-मार्ग का प्रचार करने के लिए विदेशों में गए और पश्चिम के यवन राज्यों के कितने ही नगरों में बौद्ध विहारों, स्तूपों और चैत्यों का निर्माण हुआ । अशोक द्वारा भारत का जो सांस्कृतिक साम्राज्य स्थापित किया गया था, वह वस्तुतः अनुपम था। सिकन्दर ने शस्त्र-यशक्ति का प्रयोग कर जिस साम्राज्य की नींव डाली थी, वह उसके जीवन काल में ही खण्ड-खण्ड होना प्रारम्भ हो गया था। पर अशोक ने जो धर्म-विजय की, वह सदियों तवः कायम रही।
यवनराज सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् उसका साम्राज्य अनेक खण्डों में विभक्त हो गया था। हिन्दूकुण से भूमध्यसागर तक के जो प्रदेश सिकन्दर ने अपने अधीन किए थे, उन पर उसके अन्यतम सेनापति सैल्युकस ने अपना शासन स्थापित कर लिया था। पर उसका साम्राज्य भी चिर-काल तक कायम नहीं रह सका था। वारुत्री और पार्थिया उसकी अधीनता से स्वतन्त्र हो गए थे, और वहाँ अन्य यवन राजवंश शासन करने लगे थे।
तीन-चौथाई सदी के लगभग तक बास्त्री का प्रदेश सैल्युकस द्वारा स्थापित साम्राज्य के अन्तर्गत रहा। पर बाद में वहाँ के प्रान्तीय शासक (क्षत्रप) दिवोदोत ने अपने को स्वतन्त्र घोपित कर दिया। वास्त्री का यह राज्य हिन्दूकुश पर्वतमाला से परे वंज्ञ नदी तक विस्तृत था। भारतीय इने वाल्हीक देश कहते थे। इसकी राजधानी का नाम भी वाल्हीक (बल्ख) ही था। आजकल यह प्रदेश एक मरुभूमि के समान है। पर उन दिनों यह अत्यन्त उपजाऊ और समृद्ध था। सिचाई के लिए वहाँ बहुत-सी नहरें विद्यमान थीं, जिनके कारण इस प्रदेश को ‘सहस्रभुज’ भी कहा जाता था।
भारतीय लोग वहाँ अच्छी बड़ी संख्या में बसे हुए थे, और वाल्हीक नगरी में उनकी एक पृथक् बस्ती थी, जो ‘नवराजगृह’ के नाम से प्रसिद्ध थी। मगध की पुरानी राजधानी का नाम भी राजगृह था। मगध के साहसी नागरिक जहाँ भी गए, नए राजगृह बसाते गए। वाल्हीक देश में भी एक राजगृह की सत्ता थी। नवराजगृह के दक्षिण में एक विशाल विहार था, जो मध्य एशिया में भारतीय संस्कृति और बौद्ध धर्म का केन्द्र था।
कोई आठ सौ वर्ष बाद सातवीं सदी के शुरू में जब चीनी य.-7. एन्त रंग विश्व की यात्रा के लिए निकला, तो वह बाल्हीक नगरीभी गया। वहाँ वह इसी विहार में ठहरा था। उसने लिखा है कि इस विहार में सैकड़ों भिक्षु और अर्हत निवास करते हैं। यहाँ एक विशाल बुद्धमूर्ति है, जो अनेक प्रकार के रत्नों और मणि-माणिक्यों से जटित है। ह्य एन्त्सांग ने इस विहार को ‘नवविहार’ नाम से लिखा है। हमें अपनी कथा का प्रारम्भ इस नवविहार से ही करना है।
| Weight | 272 g |
|---|---|
| Author | Satyaketu Vidyalankar |
| Language | Hindi |

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