भैषज्य रत्नावली आयुर्वेद का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसकी रचना गोविंददास सेन ने की थी। यह ग्रंथ मुख्य रूप से आयुर्वेदिक चिकित्सा और औषधियों पर आधारित है तथा इसमें विभिन्न रोगों के उपचार के लिए औषधीय संयोजनों का विस्तृत वर्णन किया गया है।
डॉ. अम्बिकादत्त शास्त्री एक प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य थे, जिन्होंने आयुर्वेदिक ग्रंथों का संपादन और व्याख्या की थी। उन्होंने भैषज्य रत्नावली का हिंदी अनुवाद और संपादन भी किया, जिससे यह ग्रंथ पाठकों और चिकित्सकों के लिए अधिक सुलभ हो गया। उनके द्वारा किया गया कार्य आयुर्वेदिक ज्ञान को संरक्षित और प्रचारित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
यह ग्रंथ आयुर्वेद में बहुत व्यापक और महत्वपूर्ण है, और इसमें विभिन्न रोगों के लिए विशिष्ट चिकित्सा विधियाँ दी गई हैं।
भैषज्य रत्नावली में विभिन्न रोगों के लिए आयुर्वेदिक उपचारों का उल्लेख है, जैसे:
- ज्वर चिकीसा (बुखार का उपचार)
- कास (खांसी)
- श्वास (दमा/अस्थमा)
- अर्श (बवासीर)
- कुष्ठ रोग (त्वचा रोग)
- अग्निमांद्य (पाचन शक्ति की कमजोरी)
- प्रमेह (मधुमेह और मूत्र संबंधी रोग)
भैषज्य रत्नावली ग्रंथ में प्रमुख रूप से निम्नलिखित विषय शामिल हैं:
1. ज्वर चिकित्सा (बुखार का उपचार)
विभिन्न प्रकार के बुखार
सन्निपात ज्वर, विषम ज्वर, और मलेरिया के लिए औषधीय योग
2. कास (खांसी) एवं श्वास रोग (अस्थमा) चिकित्सा
पुरानी खांसी, दमा, ब्रोंकाइटिस के लिए आयुर्वेदिक उपचार
3. अर्श (बवासीर) चिकित्सा
रक्तार्श (खूनी बवासीर) और शुष्क अर्श (बिना खून वाली बवासीर) के लिए औषधियां
4. कुष्ठ रोग (त्वचा विकार) चिकित्सा
सफेद दाग, सोरायसिस, और अन्य चर्म रोगों के लिए हर्बल उपचार
5. अग्निमांद्य (पाचन संबंधी रोग) चिकित्सा
मंदाग्नि (कमजोर पाचन), अपच, और कब्ज का इलाज
6. प्रमेह (मधुमेह एवं मूत्र रोग) चिकित्सा
मधुमेह में उपयोगी जड़ी-बूटियां के विभिन्न योग
7. वीर्यवृद्धि एवं वाजीकरण चिकित्सा
पुरुषों की शक्ति एवं स्तंभन शक्ति बढ़ाने के लिए औषधीय योग
8. स्त्री एवं प्रसूति रोग चिकित्सा
मासिक धर्म की अनियमितता, प्रसवोत्तर देखभाल
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