भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़ Bhagat Singh Aur Unke Sathiyon Ke Dastavez
₹450.00
| AUTHOR: | Jagmohan Singh, Chaman Lal |
| SUBJECT: | Bhagat Singh Aur Unke Sathiyon Ke Dastavez | भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़ |
| CATEGORY: | History |
| LANGUAGE: | Hindi |
| EDITION: | 2024 |
| ISBN: | 9788126702275 |
| PAGES: | 380 |
| BINDING: | Paperback |
| WEIGHT: | 310 g. |
‘दस्तावेज़’ के तीसरे संस्करण की भूमिका
1986 में जब ‘भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़’ का प्रथम संस्करण राजकमल प्रकाशन से छपकर सामने आया तो पाठकों द्वारा इसके स्वागत की आशा और अपेक्षा तो थी, लेकिन इस पुस्तक के प्रति पाठकों का उत्साह निरन्तर बना रहेगा और दो वर्ष बाद 2011 में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत के अवसर पर इसका नया परिवर्द्धित रजत जयन्ती संस्करण सम्भव हो सकेगा, इसकी कल्पना नहीं की थी। 1986 में इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद भगत सिंह पर अनेक पुस्तकें, अनेक भाषाओं में सामने आई हैं।
विशेषतः भगत सिंह जन्मशताब्दी व उनकी शहादत के पिचहत्तर वर्ष पूरे होने पर 2006-2008 के बीच अनेक महत्त्वपूर्ण किताबें छपी हैं। 1986 में प्रथम संस्करण के प्रकाशन के समय भगत सिंह की जेल नोटबुक के अप्रकाशित रहने का गिला किया गया था, वह भी श्री भूपेन्द्र हूजा ने 1994 में जयपुर से नोटबुक का प्रथम प्रकाशन कर दूर कर दिया। अब तो यह नोटबुक अनेक भाषाओं व अनेक संस्करणों में उपलब्ध है, बिना श्री हूजा को श्रेय दिए। पंजाब और हरियाणा सरकारों के सूचना विभागों ने नोटबुक का पंजाबी व हिन्दी अनुवाद सहित बिना मूल्य प्रकाशन भी कर दिया है।
भगत सिंह पर चले दोनों मुकदमों-‘लाहौर षड्यन्त्र केस (सांडर्स हत्या केस)’ व ‘दिल्ली असेम्बली बम केस’ के अदालती निर्णय भी छप चुके हैं तथा पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट के कुछ समय मुख्य न्यायाधीश रहे, श्री भगवान दास के सौजन्य से पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय को लाहौर षड्यन्त्र केस की पूरी प्रोसीडिंग की प्रति भी मिल चुकी है तथा स. मालविंदरजीत सिंह क्डैच के सम्पादन में उसका कई खंडों में क्रमशः प्रकाशन भी हो रहा है। इस बीच इन पंक्तियों के लेखक ने ‘भविष्य’ और ‘अभ्युदय’ के 1931 में जब्तशुदा भगत सिंह अंकों की प्रतियाँ भी हासिल कर ली हैं, जिनमें भगत सिंह के चित्रों सहित दुर्लभ सामग्री संकलित है। इनका प्रकाशन भी शीघ्र होगा।
इस बीच भगत सिंह के प्रशंसकों के अभियान से देश में प्रथम ऐतिहासिक भगत सिंह अध्ययन पीठ की स्थापना भी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हो चुकी है।
हालाँकि इस पर अभी भगत सिंह या क्रान्तिकारियों पर अध्ययन की शुरुआत नहीं हुई है न ही अभी तक देश के किसी विश्वविद्यालय का नाम ही भगत सिंह पर रखा गया है। पंजाब में हाल ही में स्थापित केन्द्रीय विश्वविद्यालय का नाम शहीद भगत सिंह राष्ट्रीय विश्वविद्यालय रखने की माँग उठी है, देखना है कब इसमें सफलता मिलती है। 2004-2009 की केन्द्रीय सरकार ने वामदलों के प्रभाव में देश में सरकारी स्तर पर भगत सिंह जन्म शताब्दी व भगत सिंह की शहादत की पिचहत्तरवीं वर्षगांठ मनाई व पहली बार भारत सरकार के प्रकाशन विभाग व नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली से भी भगत सिंह पर महत्त्वपूर्ण पुस्तकें छापी गईं।
लेकिन इन सब गतिविधियों को कार्यरूप देने में दो पुस्तकों का योगदान सर्वाधिक है, प्रथम, आधुनिक भारत के प्रतिष्ठित इतिहासकार प्रो. बिपिन चन्द्र की भूमिका के साथ सातवें दशक में ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ का पुनः प्रकाशन और दूसरे राजकमल प्रकाशन द्वारा 1986 में ‘दस्तावेज़’ का यद्यपि भारत के विश्वविद्यालयों के इतिहास विभागों के प्रतिष्ठित प्रोफेसरों को भगत सिंह को एक महत्त्वपूर्ण चिन्तक क्रान्तिकारी का दर्जा देने के लिए उसके दस्तावेज़ों के अंग्रेज़ी भाषा में प्रकाशन का इन्तजार है।
हमारे विश्वविद्यालयों के विज्ञान व समाज विज्ञान विभागों में जहाँ तक कि प्रगतिशील या मार्क्सवादी कहलाने वाले विद्वानों में भी अब तक ‘अंग्रेजी’ पाठ को ही ‘आधार’ तथा ‘प्रमाणिक’ सामग्री मानने की गुलाम मानसिकता अभी तक बरकरार है, वरना कोई कारण नहीं था कि 1986 में भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़ के प्रकाशन के बाद विश्वविद्यालयों में भगत सिंह चिन्तन पर व्यापक शोध न करवाई जाती। विडम्बना यह कि लखनऊ या मेरठ-आगरा आदि विश्वविद्यालयों में भगत सिंह पर पी-एच.डी. के लिए शोध हिन्दी भाषा में सम्पन्न हुई, लेकिन हिन्दी में प्रकाशित दस्तावेज़ों में विश्वविद्यालयों को मुख्य धारा की भाषा अंग्रेजी में शोध के काबिल नहीं समझा गया।
अब चूँकि अंग्रेजी भाषा में भी भगत सिंह के अनेक दस्तावेज़ों का प्रकाशन उपलब्ध है, अतः विदेशी विश्वविद्यालयों में भी भगत सिंह पर अनेक स्तरों पर शोध होने लगा है। हाल के वर्षों में क्रिस्टोफर पिन्नी, मैकलीन कामा (आस्ट्रेलिया) नीती नायर (अमेरिका) आदि ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। विडम्बना यहाँ भी यह होगी कि जैसे रविन्द्रनाथ टैगोर को ‘नोबेल पुरस्कार’ मिलने के बाद ही भारत में अपेक्षित सम्मान मिला। भगत सिंह के चिन्तक रूप का भारतीय विश्वविद्यालयों के इलीट विद्वानों द्वारा सम्मान भी विदेशी विश्वविद्यालयों द्वारा प्रदत्त सम्मान के बाद ही दिया जाएगा।
लेकिन यहाँ यह रेखांकित करना भी जरूरी है कि मुम्बई विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग ने मार्च, 2007 में तीन दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी भगत सिंह चिन्तन पर केन्द्रित की, शायद इस स्तर की यह पहली संगोष्ठी थी। बाद में आई.सी.एच.आर. ने भी चंडीगढ़ में तीन दिन की ऐसी ही संगोष्ठी आयोजित की। अनेक विश्वविद्यालयों में भी एक एक या दो दो दिन की संगोष्ठियाँ हुईं। प्रोफेसर विपिन चन्द्र के बाद पहली बार प्रोफेसर सव्यासाची भट्टाचार्य, प्रोफेसर जे.एस. ग्रेवाल, प्रोफेसर वी.एन. दत्ता, प्रोफेसर हिमाद्री बनर्जी आदि प्रतिष्ठित इतिहासकारों ने भगत सिंह चिंतन को समझने का प्रयास इस दौर में किया।
हालांकि इनमें से कुछ को यह संदेह ही बना रहा की भगत सिंह जैसे एफ.ए. पास व्यक्ति को इतनी अच्छी अंग्रेजी कैसे आती थी। कुछ ने तो इन्हें जवाहरलाल नेहरू रचित या आसफ अली द्वारा रचित कहने तक का कुलाबा भिड़ाया। अब जबकि भगत सिंह की अपनी प्रतिलिपि में ‘जेल नोटबुक तथा पत्रादि’ सबके सामने हैं तो कइयों को उनकी अंग्रेजी भाषा पर क्षमता को लेकर मुँह में उँगली गड़ानी पड़ती है।
भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़ के इस नए संस्करण में शहीद महावीर सिंह का एक हाल में मिला पत्र भी शामिल किया जा रहा है, जो उन्होंने बेल्लारी जेल से अपने घर लिखा था। दस्तावेज़ के पिछले संस्करण में महावीर सिंह का अंडमान जेल से भेजा पत्र शामिल है। भगत सिंह के ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक संघ’ के कार्यकर्ताओं में शहीद महावीर सिंह की चर्चा अपेक्षा से कम हुई है।
इस संगठन के तीन सर्वाधिक प्रसिद्ध शहीद भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु हुए, जो 23 मार्च, 1931 को फाँसी पर चढ़कर अमर हो गए। लगभग इतनी ही या इससे थोड़ी कम चर्चा संघ के सेना विभाग के सेनापति चन्द्रशेखर आजाद की 27 फरवरी, 1931 को इलाहाबाद में पुलिस मुठभेड़ में मिली शहादत से हुई।
13 सितम्बर, 1929 लाहौर जेल में 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद जतिन दास की शहादत ने भी देश की जनता को हिला दिया था, लेकिन 30 मई, 1928 को लाहौर में रावी तट पर बम परीक्षण के समय विस्फोट से हुई भगवती चरण वोहरा (दुर्गा भाभी के पति) की शहादत की अपेक्षित चर्चा नहीं हुई, न ही महावीर सिंह को 17 मई, 1933 को अंडमान जेल में भूख हड़ताल से हुई शहादत की ही। 9 मई, 1983 को महावीर सिंह ने घर के लिए अपना अन्तिम पत्र लिखा, 12 मई, 1933 को भूख हड़ताल शुरू की।
जेल अधिकारियों की जबरदस्ती की यातनाओं से वे 17 मई, 1933 को जब शहीद हुए तो उनकी लाश जेल के पीछे से समुद्र में फेंक दी गई। शहादत के कई दिन बाद उनकी शहादत के बारे में एक छोटी सी खबर यू.पी. के किसी अखबार में छपी तो एटा जिले के महावीर सिंह के परिवार को शहादत की खबर मिली। महावीर सिंह की शहादत भारत के क्रान्तिकारी स्वतन्त्रता संग्राम का एक दुखन्त अध्याय है। महावीर सिंह के जयपुर स्थित भतीजे यतीन्द्र सिंह राठौर ने अब उनके दस्तावेज़ों को एक सी.डी. में संकलित कर लिया है। उम्मीद है इनका प्रकाशन भी शीघ्र होगा या दस्तावेज़ के सम्भावित 2011 के रजत जयन्ती संस्करण में इन्हें शामिल किया जा सकेगा।
महावीर सिंह के इस नए पत्र से एक दिलचस्प बात सामने आती है, वह है भगत सिंह के प्रभाव से सभी क्रान्तिकारियों में अध्ययन की विकसित रुचि की। महावीर सिंह के पत्र में ‘क्राई फार जस्टिस’ पुस्तक भिजवाने के लिए लिखा है। अप्टन सिंक्लेयर की यह गद्य पुस्तक लगभग हर क्रान्तिकारी को प्रिय थी, जिसका जिक्र भगत सिंह की अध्ययन वृत्ति के सिलसिले में प्रिंसिपल छबील दास, राजा राम शास्त्री, शिव वर्मा व मथुरा दास थापर (सुखदेव के भाई) आदि सभी ने किया।
यदि 2011 में दस्तावेज़ की रजत जयन्ती के संस्करण की योजना फलीभूत हुई तो उसमें अब तक प्राप्त भगत सिंह व उनके साथियों तथा उन सब जगहों के दुर्लभचित्र भी शामिल होंगे जो इन पंक्तियों के लेखक ने लाहौर व अन्य अनेक जगहों से अपने व्यक्तिगत प्रयासों व कुछ दोस्तों की मदद से संकलित किए हैं। इस संस्करण में भगत सिंह व उनके साथियों के कुछ नए दस्तावेज़ भी शामिल किए जा सकेंगे।
फिलहाल ‘दस्तावेज़’ के इस तीसरे संस्करण के प्रकाशन के अवसर पर खुशी और सन्तोष के इजहार के साथ यह कहना जरूरी है कि हिन्दुस्तान की मौजूदा सूरतेहाल के मद्देनजर भगत सिंह के दस्तावेज़ों का गम्भीरता से अध्ययन, मनन व उन पर चिन्तन बेहद ज़रूरी और इस सूरतेहाल को बदलने के लिए रोशनी वहीं से हासिल होगी। खासतौर पर फ़िरकापरस्ती के विकराल रूप का सामना करने के लिए ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’, ‘साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ और ‘धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम’ का अध्ययन जरूरी है।
दलित उत्पीड़न की समस्या को समझने के लिए ‘अछूत समस्या’ का अध्ययन उपयोगी है। हिन्दुस्तानी समाज में आमूल परिवर्तन के लिए ‘युवा कार्यकर्ताओं के नाम पत्र’ का अध्ययन बेहद ज़रूरी व उपयोगी है। फाँसी से डेढ़ महीने पहले लिखे हुए पत्र में भगत सिंह में मार्क्स की सैद्धान्तिक स्पष्टता और लेनिन और माओ की व्यावहारिक कुशलता का अक्स नज़र आता है।
हिन्दुस्तान में समाजवादी इंक़लाब का सफर भगत सिंह के बहुत थोड़े अर्से के सैद्धान्तिक व व्यावहारिक चिन्तन को, हिन्दुस्तानी जनता के प्रति उनकी निर्भीक, निस्वार्थ प्रतिबद्धता व लगन को, आत्मसात किए बगैर आगे नहीं बढ़ सकता। देश के तमाम देशभक्तों तथा संसदीय व गैर-संसदीय दोनों रास्तों पर चलने वाले वामपंथियों के पास आगे बढ़ने के लिए भगत सिंह चिन्तन को आत्मसात करने के सिवा और कोई विकल्प नहीं है।
– चमन लाल
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